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Deoria News: पशुपालन में आमदनी कम, खर्च ज्यादा...खरीद-फरोख्त की आसान कमाई ने तस्करी बढ़ाई

Thu, 20 Nov 2025 12:32 AM IST
Gorakhpur Bureau गोरखपुर ब्यूरो
Updated Thu, 20 Nov 2025 12:32 AM IST
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Low income, high expenses in animal husbandry, easy income from buying and selling has increased smuggling.
देवरिया। महज तीन दशक पहले तक दियारा में पशुओं की जो संख्या दिखती थी अब वह मामूली रह गई है। गांव पशुविहीन हो रहे हैं। बड़े घरों के दरवाजे पर नाद तो हैं लेकिन उन पर उगी घास घटते पशुपालन की तस्दीक करती नजर आती है। यह परिवर्तन साल 2000 के बाद आया है। दरअसल, दुग्ध उत्पादों की उचित कीमत नहीं मिलने से इस व्यवसाय में घाटा होता देख कुछ पशुपालक खरीद-फरोख्त के धंधे में उतर गए।
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उधर, भागलपुर और कपरवार घाट पुल के रास्ते आजमगढ़ से तस्कर देवरिया जिले की सीमा होते हुए बिहार जाकर पशु बेचने लगे थे। धंधेबाजों ने दियारा में पशुओं की खरीद-फरोख्त करने वालों को अपने गैंग में शामिल कर लिया। पुलिस और सफेदपोशों को भी महीने में तय रकम मिलने लगी। नतीजा यह हुआ कि वर्ष 2010 आते-आते पशु तस्करी का संगठित गिरोह बन गया।
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दुग्ध उत्पादन समिति से जुड़े लोगों ने बताया कि देवरिया जिले में दूध की खपत करीब 50 हजार लीटर थी। इसी को देखते हुए पराग कंपनी का दुग्ध अवशीतन केंद्र गोरखपुर रोड पर एआरटीओ कार्यालय के पास शुरू हुआ, जिसे बाद में उसरा बाजार इंडस्ट्रियल एरिया में शिफ्ट कर दिया गया। यहां दूध को ठंडा कर गोरखपुर की डेयरी में भेजा जाता था। जिला योजना से 98 लाख रुपये खर्च कर इसका विस्तार किया गया। करीब छ: महीने तक इस प्लांट से दूध की पैकिंग का भी काम हुआ लेकिन अचानक गोरखपुर में पराग डेयरी की हालत खस्ता होने लगी, जिसका असर देवरिया के सेंटर पर भी पड़ा।
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00पशुपालकों का बकाया बढ़ा तो बेचने लगे पशु



जिले में 86 दुग्ध विकास समितियां ग्रामीण काम कर रहीं थीं। गोरखपुर की डेयरी बदहाल हुई तो इन समितियों पर कर्ज बढ़ने लगा। पशुपालकों को पैसा नहीं मिल रहा था। उधर, पशुओं के लिए चारे-दाने का भी प्रबंध खुद के खर्च से करना पड़ रहा था। ऐसे में कुछ पशुपालकों ने दूसरा व्यवसाय शुरू कर दिया। अभी भी पशुपालकों का 50 लाख रुपये से अधिक का बकाया पराग पर है।

00पशुपालक से बन गए धंधेबाज



रुद्रपुर क्षेत्र के किसान रामनक्षत्र सिंह बताते हैं कि, वर्ष 2000 के बाद इलाके में पड़ोसी जिले आजमगढ़, मऊ, गाजीपुर आदि के व्यापारी पशु खरीदने आने लगे। वे कमजोर और बेकार गाय-भैंसों को खरीदकर ले जाते थे और अच्छी रकम देते थे। इसमें स्थानीय पशुपालकों को भी शामिल कर लिया। स्थानीय पशुपालकों को केवल सौदा तय कराने पर ही दो से तीन हजार रुपये देते थे। अब यही स्थानीय लोग पशु बेचकर पूरे दिन इलाके में बिक रहे पशुओं की तलाश करने लगे। इसके बाद तेजी से पशुओं की संख्या घटती गई।

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पशुपालक बोले

पशुपालन के बढ़ते खर्च ने इसे घाटे का सौदा बना दिया है। इस वक्त भूसा 800-1000 रुपये प्रति क्विंटल है। पशु आहार 2400 रुपये प्रति क्विंटल है। खेती में गोवंश का काम नहीं है। इसीलिए लोग पशुपालन छोड़कर दूसरे व्यवसाय अपना रहे हैं। लोग पैकेट वाले दूध, दही, घी को आसानी से खरीदते हैं, पशुपालक से खरीदे दूध में तमाम कमियां गिनाते हैं, इसलिए भी युवा पीढ़ी का मोहभंग हो गया है।




- राधेश्याम यादव, पशुपालक, ग्राम पंचायत देवसिया
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कुछ साल पहले डेयरी की गाड़ी आती थी, जिससे दूध का उचित मूल्य मिल जाता था। ग्रामीण इलाके में अब दूध का अच्छा मूल्य नहीं मिलता। अगर दूध अधिक हो गया तो उसकी खपत कैसे होगी यह भी बड़ा सवाल था। इसलिए अब अपनी जरूरत के अनुसार दो-तीन पशु रखे जाते हैं। पहले लोग पशुओं को कसाई के हाथों नहीं बेचते थे, जबकि अब पैसाें के लिए किसी के भी हाथों बेच दे रहे हैं।

- गुमती गौड़, पशु पालक ग्राम छित्तूपुर
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