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Deoria News: चार लोगों ने रखी दुर्गा पूजा की नींव, 58 साल से निभ रही परंपरा
Mon, 19 Oct 2026 01:09 AM IST
गोरखपुर ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, देवरिया
संवाद न्यूज एजेंसी, देवरिया
Updated Mon, 19 Oct 2026 01:09 AM IST
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संवाद न्यूज एजेंसी पड़री बाजार। कोलकाता में दुर्गा पूजा देखने गए चार लोगों ने लौटकर पड़री बाजार में ऐसी परंपरा शुरू की, जो आज भी लोगों की आस्था और आकर्षण का केंद्र बनी हुई है। वर्ष 1968 में पहली बार दुर्गा मूर्ति स्थापित कर मेले की शुरुआत की गई थी।
करीब 58 वर्षों से चली आ रही इस परंपरा में हर साल पांच दिवसीय दशहरा मेले का आयोजन होता है। इसमें दूर-दराज के क्षेत्रों से बड़ी संख्या में श्रद्धालु और दर्शक पहुंचते हैं।
सलेमपुर विकास खंड क्षेत्र के पड़री बाजार निवासी रघुनाथ साहू, त्रिलोकी पांडेय, शंभू पांडेय और कुबेरनाथ पांडेय वर्ष 1967 में दुर्गा पूजा देखने कोलकाता गए थे। वहां की पूजा परंपरा से प्रभावित होकर उन्होंने अगले वर्ष बाजार में दुर्गा मूर्ति स्थापित कराई।
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नवरात्र में सप्तमी के दिन मूर्ति स्थापना के साथ मेले की शुरुआत हुई। धीरे-धीरे लोगों की भागीदारी बढ़ी और आयोजन का विस्तार होता गया। अब बाजार में कई स्थानों पर दुर्गा मूर्तियां स्थापित की जाती हैं।
मेला सुरक्षा दल के अध्यक्ष अनिल पांडेय ने बताया कि मेले में सांस्कृतिक मनोरंजन के लिए रामलीला का आयोजन भी होता है। इसमें बिहार के दरभंगा और आरा समेत विभिन्न स्थानों से कलाकार पहुंचकर अपनी प्रस्तुति देते हैं। वर्षों से चली आ रही यह परंपरा आज भी बरकरार है।
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करीब 58 वर्षों से चली आ रही इस परंपरा में हर साल पांच दिवसीय दशहरा मेले का आयोजन होता है। इसमें दूर-दराज के क्षेत्रों से बड़ी संख्या में श्रद्धालु और दर्शक पहुंचते हैं।
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सलेमपुर विकास खंड क्षेत्र के पड़री बाजार निवासी रघुनाथ साहू, त्रिलोकी पांडेय, शंभू पांडेय और कुबेरनाथ पांडेय वर्ष 1967 में दुर्गा पूजा देखने कोलकाता गए थे। वहां की पूजा परंपरा से प्रभावित होकर उन्होंने अगले वर्ष बाजार में दुर्गा मूर्ति स्थापित कराई।
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नवरात्र में सप्तमी के दिन मूर्ति स्थापना के साथ मेले की शुरुआत हुई। धीरे-धीरे लोगों की भागीदारी बढ़ी और आयोजन का विस्तार होता गया। अब बाजार में कई स्थानों पर दुर्गा मूर्तियां स्थापित की जाती हैं।
मेला सुरक्षा दल के अध्यक्ष अनिल पांडेय ने बताया कि मेले में सांस्कृतिक मनोरंजन के लिए रामलीला का आयोजन भी होता है। इसमें बिहार के दरभंगा और आरा समेत विभिन्न स्थानों से कलाकार पहुंचकर अपनी प्रस्तुति देते हैं। वर्षों से चली आ रही यह परंपरा आज भी बरकरार है।