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एक रुपये की पर्ची पर पांच सौ की दवाएं लिख रहे डॉक्टर
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एक रुपये की पर्ची पर पांच सौ की दवाएं लिख रहे डॉक्टर
देवरिया। सरकारी अस्पताल में बाहर से दवा खरीदने पर रोक लगाने के लिए शासन की ओर से समय-समय पर कोशिश की जाती है, लेकिन कुछ डॉक्टर इसका भी तोड़ निकाल लेते हैं। महर्षि देवरहा बाबा मेडिकल कॉलेज से संबद्ध् जिला अस्पताल में कुछ डॉक्टरों ने नया तरीका ईजाद करते हुए मरीजों की पर्ची पर पांच से छह दवाएं लिख दे रहे हैं, जिसमें महज दो दवा ही जिला अस्पताल में मौजूद होती है। बाकी दवाओं के लिए मरीजों को मेडिकल स्टोर का सहारा लेने पड़ रहा है। सभी प्रकार की जांच की सुविधा न होने से कुछ जांच संख्या बढ़ा दी जा रही है। बाहर से जांच कराने में लोगों को मोटी रकम खर्च करनी पड़ रही है।
जिला अस्पताल में हर रोज औसतन एक हजार मरीजों का आना होता है। दूर दराज से आए मरीजों को पहले पर्ची के लिए मशक्कत करनी पड़ती है। घंटों इंतजार करने के बाद उन्हें एक रुपये की पर्ची मिलती है। यहां से डॉक्टर के पास पहुंचने पर महज चंद मिनटों में कई तरह की दवाएं लिख दी जाती हैं। अधिकांश मरीजों की पर्ची पर दवाओं की संख्या पांच से अधिक होती है। साथ ही जिन दवाओं को पर्ची पर लिखा जाता है, उनकी अलग से एक पर्ची बना कर दी जाती है। यहीं से खेल की शुरूआत होती है। जब छोटी पर्ची लेकर मरीज अस्पताल के दवा घर पर पहुंचता है तो काउंटर से दो दवाओं को देने के बाद सीधे बाहर का रास्ता दिखा दिया जाता है। यहां तक मरीजों से कह दिया जाता है कि कचहरी के पास बड़ी दुकान से दवा खरीदना। इसके लिए दवा की दुकान का नाम भी बता दिया जाता है। जब मरीज इन दुकानों पर पहुंचता है तो उस दवा की कीमत पांच सौ रुपये के पार होती है। इसमें कई ऐसी दवाएं होती हैं, जो निजी दुकानों पर ही मिलती हैं।
जंगल तरैनी गांव निवासी धर्मेद्र गिरि के हाथ में दर्द था। उनकी पर्ची पर पांच दवा लिखी गई थी, जिनमें से तीन दवाएं मिलीं। दो दवा नहीं मिल पाई। उसके बाद वह बस स्टेशन के पास पहुंचे और दुकान से दवा खरीदकर फिर से डॉक्टर को दिखाने पहुंचे। मरीज ने बताया कि 580 रुपये की दवा खरीदकर लाया हूं। गड़ेर निवासी श्रीनिवास के कमर में दर्द था। घंटों लाइन में लगने के बाद डॉक्टर ने पांच दवाओं की पर्ची थमा दी, जिसमें कैल्सियम और आयरन की गोली अस्पताल से मिल गई, लेकिन आठ सौ रुपये की दवाएं बाहर ही खरीदनी पड़ी। एकौना से आए रामप्रकाश ने बताया कि सुबह करीब छह बजे घर से निकला हूं। एक घंटे लाइन में खड़ा होने के बाद नंबर आया और डॉक्टर ने छह दवाएं लिखीं। इसमें से केवल पैरासिटामाल मिला है। बाकी पांच दवाओं को बाहर से खरीदना पड़ा है। उसके लिए 670 रुपये खर्च करने पड़े। किसान रामप्रकाश ने बताया कि जितनी दवा और किराए में रकम खर्च हुई, उतने में गेहूं की फसल कटवा लिए होते। हरनौठा गांव निवासी गुंजा और रिया ने बताया कि डॉक्टर ने पर्ची पर चार दवाएं लिखी हैं, लेकिन इसमें एक दवा ही मिली है। मरीज को एक कर्मचारी ने बताया कि चर्म रोग की दवा कम आती है, जो आती वह, अच्छी नहीं होती है।
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जांच ऐसी लिख रहे कि बाहर से कराने की है मजबूरी
देवरिया। मईल थाना क्षेत्र के देवसिया निवासी मनीष कुमार ने बताया कि दो बार से अस्पताल आ रहा हूं। विदेश जाने के लिए कंपनी ने कई जांच तरह की कराने के लिए कहा है। डॉक्टर के पास गया तो उन्होंने जांच लिख दी, लेकिन पैथालोजी में पता चला कि यह जांच नहीं होती है। इसके कारण मजबूरी में बाहर से जांच कराने जाना पड़ रहा है। देसही देवरिया निवासी अजुंम निशा ने बताया कि गठिया रोग है। जांच की सुविधा न होने से डॉक्टर ने एक पैथालोजी सेंटर का कार्ड थमा दिया है। जहां से जांच करने के बाद दिखाने आई हूं। जांच के लिए पंद्रह सौ रुपये खर्च करने पड़े हैं। इलाज के लिए आने पर दवा और जांच के नाम 18 सौ रुपये खर्च हो गए हैं।
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अस्पताल में डॉक्टर, मरीज को जो दवा लिखते हैं, वह काउंटर से दी जाती हैं। जो दवा उपलब्ध नहीं होती है, उसे अस्पताल परिसर स्थित जन औषधि केंद्र से मरीज ले सकता है। पैथालोजी में अधिकांश जांचें होती हैं। आने वाले दिनों में कुछ स्पेशवीक जांच शुरू हो जाएगी, जो न्यूनतम मूल्य पर होगी। बाहर दवाएं नहीं लिखी जाती हैं। बावजूद सभी को निर्देश दिया जाएगा।
- डॉ. एचके मिश्रा, प्रभारी चिकित्सा अधीक्षक
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देवरिया। सरकारी अस्पताल में बाहर से दवा खरीदने पर रोक लगाने के लिए शासन की ओर से समय-समय पर कोशिश की जाती है, लेकिन कुछ डॉक्टर इसका भी तोड़ निकाल लेते हैं। महर्षि देवरहा बाबा मेडिकल कॉलेज से संबद्ध् जिला अस्पताल में कुछ डॉक्टरों ने नया तरीका ईजाद करते हुए मरीजों की पर्ची पर पांच से छह दवाएं लिख दे रहे हैं, जिसमें महज दो दवा ही जिला अस्पताल में मौजूद होती है। बाकी दवाओं के लिए मरीजों को मेडिकल स्टोर का सहारा लेने पड़ रहा है। सभी प्रकार की जांच की सुविधा न होने से कुछ जांच संख्या बढ़ा दी जा रही है। बाहर से जांच कराने में लोगों को मोटी रकम खर्च करनी पड़ रही है।
जिला अस्पताल में हर रोज औसतन एक हजार मरीजों का आना होता है। दूर दराज से आए मरीजों को पहले पर्ची के लिए मशक्कत करनी पड़ती है। घंटों इंतजार करने के बाद उन्हें एक रुपये की पर्ची मिलती है। यहां से डॉक्टर के पास पहुंचने पर महज चंद मिनटों में कई तरह की दवाएं लिख दी जाती हैं। अधिकांश मरीजों की पर्ची पर दवाओं की संख्या पांच से अधिक होती है। साथ ही जिन दवाओं को पर्ची पर लिखा जाता है, उनकी अलग से एक पर्ची बना कर दी जाती है। यहीं से खेल की शुरूआत होती है। जब छोटी पर्ची लेकर मरीज अस्पताल के दवा घर पर पहुंचता है तो काउंटर से दो दवाओं को देने के बाद सीधे बाहर का रास्ता दिखा दिया जाता है। यहां तक मरीजों से कह दिया जाता है कि कचहरी के पास बड़ी दुकान से दवा खरीदना। इसके लिए दवा की दुकान का नाम भी बता दिया जाता है। जब मरीज इन दुकानों पर पहुंचता है तो उस दवा की कीमत पांच सौ रुपये के पार होती है। इसमें कई ऐसी दवाएं होती हैं, जो निजी दुकानों पर ही मिलती हैं।
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जंगल तरैनी गांव निवासी धर्मेद्र गिरि के हाथ में दर्द था। उनकी पर्ची पर पांच दवा लिखी गई थी, जिनमें से तीन दवाएं मिलीं। दो दवा नहीं मिल पाई। उसके बाद वह बस स्टेशन के पास पहुंचे और दुकान से दवा खरीदकर फिर से डॉक्टर को दिखाने पहुंचे। मरीज ने बताया कि 580 रुपये की दवा खरीदकर लाया हूं। गड़ेर निवासी श्रीनिवास के कमर में दर्द था। घंटों लाइन में लगने के बाद डॉक्टर ने पांच दवाओं की पर्ची थमा दी, जिसमें कैल्सियम और आयरन की गोली अस्पताल से मिल गई, लेकिन आठ सौ रुपये की दवाएं बाहर ही खरीदनी पड़ी। एकौना से आए रामप्रकाश ने बताया कि सुबह करीब छह बजे घर से निकला हूं। एक घंटे लाइन में खड़ा होने के बाद नंबर आया और डॉक्टर ने छह दवाएं लिखीं। इसमें से केवल पैरासिटामाल मिला है। बाकी पांच दवाओं को बाहर से खरीदना पड़ा है। उसके लिए 670 रुपये खर्च करने पड़े। किसान रामप्रकाश ने बताया कि जितनी दवा और किराए में रकम खर्च हुई, उतने में गेहूं की फसल कटवा लिए होते। हरनौठा गांव निवासी गुंजा और रिया ने बताया कि डॉक्टर ने पर्ची पर चार दवाएं लिखी हैं, लेकिन इसमें एक दवा ही मिली है। मरीज को एक कर्मचारी ने बताया कि चर्म रोग की दवा कम आती है, जो आती वह, अच्छी नहीं होती है।
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जांच ऐसी लिख रहे कि बाहर से कराने की है मजबूरी
देवरिया। मईल थाना क्षेत्र के देवसिया निवासी मनीष कुमार ने बताया कि दो बार से अस्पताल आ रहा हूं। विदेश जाने के लिए कंपनी ने कई जांच तरह की कराने के लिए कहा है। डॉक्टर के पास गया तो उन्होंने जांच लिख दी, लेकिन पैथालोजी में पता चला कि यह जांच नहीं होती है। इसके कारण मजबूरी में बाहर से जांच कराने जाना पड़ रहा है। देसही देवरिया निवासी अजुंम निशा ने बताया कि गठिया रोग है। जांच की सुविधा न होने से डॉक्टर ने एक पैथालोजी सेंटर का कार्ड थमा दिया है। जहां से जांच करने के बाद दिखाने आई हूं। जांच के लिए पंद्रह सौ रुपये खर्च करने पड़े हैं। इलाज के लिए आने पर दवा और जांच के नाम 18 सौ रुपये खर्च हो गए हैं।
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अस्पताल में डॉक्टर, मरीज को जो दवा लिखते हैं, वह काउंटर से दी जाती हैं। जो दवा उपलब्ध नहीं होती है, उसे अस्पताल परिसर स्थित जन औषधि केंद्र से मरीज ले सकता है। पैथालोजी में अधिकांश जांचें होती हैं। आने वाले दिनों में कुछ स्पेशवीक जांच शुरू हो जाएगी, जो न्यूनतम मूल्य पर होगी। बाहर दवाएं नहीं लिखी जाती हैं। बावजूद सभी को निर्देश दिया जाएगा।
- डॉ. एचके मिश्रा, प्रभारी चिकित्सा अधीक्षक