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बर्खास्त होंगे जिले के छह फर्जी शिक्षक
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देवरिया। सिद्धार्थनगर के बाद अब देवरिया के भी छह शिक्षकों पर बर्खास्तगी की तलवार लटक गई है। फर्जी प्रमाण पत्रों पर नौकरी कर रहे इन शिक्षकों के अभिलेखों के सत्यापन के बाद शासन ने इनकी नियुक्ति निरस्त करते हुए वेतन की रिकवरी और केस दर्ज कराने के निर्देश दिए हैं। सभी की तैनाती वर्ष 2010 में हुई थी। हालांकि विभागीय अफसर अभी भी इनके सरपरस्त बने हुए हैं। दस दिन पूर्व जारी आदेश अब तक अपने पास न पहुंचने का हवाला देकर कार्रवाई से कतरा रहे हैं। जिले के विभिन्न परिषदीय स्कूलों में तैनात 11 शिक्षकों के फर्जी दस्तावेज के आधार पर नौकरी करने की शिकायत वर्ष 2014 में राज्यपाल से की गई थी। आरोप था कि यह शिक्षक राजनीतिक रसूख के बल पर दूसरों के प्रमाण पत्र या फर्जी दस्तावेजों के आधार पर नौकरी हासिल कर लिए हैं। शिक्षकों के प्रभाव और असहयोग के चलते वर्षों से जांच अटकी रही। शासन ने एडी बेसिक को दोबारा नए सिरे से जांच के निर्देश दिए थे। जांच के पहले चरण में छह शिक्षकों के प्रमाण पत्र फर्जी पाए गए हैं, जबकि पांच के प्रमाण पत्रों का सत्यापन पूरा नहीं हो पाया है। इसकी रिपोर्ट 12 मार्च को एडी बेसिक ने शासन को प्रेषित की थी। इसका संज्ञान लेते हुए शासन के विशेष सचिव देव प्रताप सिंह ने छह शिक्षकों की नियुक्ति निरस्त करते हुए उन्हें दिए गए वेतन भुगतान की वसूली करने और धोखाधड़ी का केस दर्ज कराने के निर्देश दिए हैं। अन्य पांच शिक्षकों के अभिलेखों का सत्यापन पूरा होने तक वेतन भुगतान पर रोक लगाने को भी कहा गया है। अहम बात यह है कि विशेष सचिव का यह आदेश 25 अप्रैल को पत्रांक संख्या 316/68-5-2019 से जारी हुआ है, मगर दस दिनों बाद भी अफसर इसे प्राप्त नहीं होने की दलील दे रहे हैं। प्रभारी बीएसए ओमप्रकाश यादव का कहना था कि पत्र फिलहाल मेरे पास तक नहीं पहुंचा है। शासन के आदेशों के तहत कार्रवाई की जाएगी। उधर, एडी बेसिक डॉ. एसपी त्रिपाठी ने बताया कि आदेश की मौखिक जानकारी मिली है, मगर खुद हैरान हैं कि अब तक पत्र क्यों नहीं मिला। कई बार इसे ढूंढवा चुका हूं। सभी आरोपी काफी प्रभावशाली हैं। वैसे बीएसए के पास पत्र जरूर पहुंचा होगा। जल्द ही पत्र का पता कराकर कार्रवाई की जाएगी।
पांच साल से चल रही थी जांच
वर्ष 2014 में राज्यपाल से मामले की पहली शिकायत हुई थी। शासन ने मामले को गंभीरता से लेते हुए एडी बेसिक को जांच सौंपी। एडी बेसिक ने कई बार इन शिक्षकों को प्रमाण पत्रों के सत्यापन के लिए नोटिस जारी किया, मगर वह उपस्थित ही नहीं हुए। अपनी योग्यता साबित करने की बजाए वह जांच अधिकारी पर ही दबाव बनवाने लगे। आजिज होकर जांच अधिकारी तत्कालीन एडी बेसिक डॉ. विनोद शर्मा ने बेसिक शिक्षा सचिव को पत्र लिखकर पूरे मामले की जानकारी दी। शासन स्तर से पैनल गठित कर जांच कराने की सिफारिश की थी। उन्होंने पत्र में स्पष्ट कहा था कि बार-बार सत्यापन से कतराना शिक्षकों के प्रमाण पत्रों के संदिग्ध होने की पुष्टि करता है। वर्ष 2016 में तत्कालीन बीएसए मनोज मिश्र ने जांच में असहयोग के चलते इन शिक्षकों को सेवा समाप्ति से पूर्व अंतिम नोटिस जारी की थी। इसके बाद से ही मामला ठंडे बस्ते में चला गया था। भाजपा सरकार में मामला फिर खुला तो जांच की प्रक्रिया आगे बढ़ी।
बीएसए को भी नोटिस, मांगा जवाब
फर्जी दस्तावेजों पर नौकरी कर रहे शिक्षकों को प्रश्रय देने में स्थानीय अफसरों की भी मिलीभगत रही है। राजनीतिक रसूख वाले शिक्षकों पर कार्रवाई से बचने के लिए स्थानीय अफसर मामले को दबाने में नहीं हिचकते थे। यही कारण है कि शासन ने बीएसए माधवजी तिवारी को भी कारण बताओ नोटिस दिया है। उन पर आरोप है कि जांच में अपेक्षित सहयोग नहीं किया गया और न ही आवश्यक कागजात व मूल पत्रावली जांचकर्ता को उपलब्ध कराया गया। इससे मामले में उनकी संलिप्तता भी संभावित हो रही है। विशेष सचिव ने पत्र के जरिए बीएसए से पूछा है कि जांच में असहयोग को फर्जी तरीके से नियुक्त शिक्षकों के साथ संलिप्तता मानते हुए आपके विरुद्ध आपराधिक कार्रवाई क्यों न की जाए। बीएसए को पत्र प्राप्ति के दस दिनों के भीतर जवाब देने की हिदायत है।
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एक ही जाति के हैं सभी शिक्षक
जिन शिक्षकों के दस्तावेज को फर्जी पाया गया है और जिनके प्रमाण पत्रों पर संदेह है, वह सभी एक ही जाति के हैं। इनमें से कुछ पूर्ववर्ती सपा सरकार में पार्टी के बड़े पदाधिकारी के करीबी व परिवार के सदस्य भी हैं। उनके प्रभाव के चलते ही वर्षों तक जांच पूरी नहीं हो पाई। हर बार फाइल दबा दी जाती है। दस दिन बाद भी आदेश नहीं पहुंचने के पीछे भी यही कारण बताए जा रहे हैं। बताते हैं कि स्थानीय अफसर भी उन्हें अपने कार्यकाल में सुरक्षित रखने के प्रति आश्वस्त कर चुके हैं।
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पांच साल से चल रही थी जांच
वर्ष 2014 में राज्यपाल से मामले की पहली शिकायत हुई थी। शासन ने मामले को गंभीरता से लेते हुए एडी बेसिक को जांच सौंपी। एडी बेसिक ने कई बार इन शिक्षकों को प्रमाण पत्रों के सत्यापन के लिए नोटिस जारी किया, मगर वह उपस्थित ही नहीं हुए। अपनी योग्यता साबित करने की बजाए वह जांच अधिकारी पर ही दबाव बनवाने लगे। आजिज होकर जांच अधिकारी तत्कालीन एडी बेसिक डॉ. विनोद शर्मा ने बेसिक शिक्षा सचिव को पत्र लिखकर पूरे मामले की जानकारी दी। शासन स्तर से पैनल गठित कर जांच कराने की सिफारिश की थी। उन्होंने पत्र में स्पष्ट कहा था कि बार-बार सत्यापन से कतराना शिक्षकों के प्रमाण पत्रों के संदिग्ध होने की पुष्टि करता है। वर्ष 2016 में तत्कालीन बीएसए मनोज मिश्र ने जांच में असहयोग के चलते इन शिक्षकों को सेवा समाप्ति से पूर्व अंतिम नोटिस जारी की थी। इसके बाद से ही मामला ठंडे बस्ते में चला गया था। भाजपा सरकार में मामला फिर खुला तो जांच की प्रक्रिया आगे बढ़ी।
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बीएसए को भी नोटिस, मांगा जवाब
फर्जी दस्तावेजों पर नौकरी कर रहे शिक्षकों को प्रश्रय देने में स्थानीय अफसरों की भी मिलीभगत रही है। राजनीतिक रसूख वाले शिक्षकों पर कार्रवाई से बचने के लिए स्थानीय अफसर मामले को दबाने में नहीं हिचकते थे। यही कारण है कि शासन ने बीएसए माधवजी तिवारी को भी कारण बताओ नोटिस दिया है। उन पर आरोप है कि जांच में अपेक्षित सहयोग नहीं किया गया और न ही आवश्यक कागजात व मूल पत्रावली जांचकर्ता को उपलब्ध कराया गया। इससे मामले में उनकी संलिप्तता भी संभावित हो रही है। विशेष सचिव ने पत्र के जरिए बीएसए से पूछा है कि जांच में असहयोग को फर्जी तरीके से नियुक्त शिक्षकों के साथ संलिप्तता मानते हुए आपके विरुद्ध आपराधिक कार्रवाई क्यों न की जाए। बीएसए को पत्र प्राप्ति के दस दिनों के भीतर जवाब देने की हिदायत है।
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एक ही जाति के हैं सभी शिक्षक
जिन शिक्षकों के दस्तावेज को फर्जी पाया गया है और जिनके प्रमाण पत्रों पर संदेह है, वह सभी एक ही जाति के हैं। इनमें से कुछ पूर्ववर्ती सपा सरकार में पार्टी के बड़े पदाधिकारी के करीबी व परिवार के सदस्य भी हैं। उनके प्रभाव के चलते ही वर्षों तक जांच पूरी नहीं हो पाई। हर बार फाइल दबा दी जाती है। दस दिन बाद भी आदेश नहीं पहुंचने के पीछे भी यही कारण बताए जा रहे हैं। बताते हैं कि स्थानीय अफसर भी उन्हें अपने कार्यकाल में सुरक्षित रखने के प्रति आश्वस्त कर चुके हैं।