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कुंडली में छिपा होता हैं पितृदोष
Updated Sat, 09 Sep 2017 10:55 PM IST
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देवरिया। गृहस्थ आश्रम में प्रवेश का प्रथम ध्येय ही संतानोत्पत्ति करना है, लेकिन वर्तमान समय में संतान बाधा एक विकट समस्या का रूप धारण करती जा रही है। शास्त्रों के अनुसार पितरों के अतृप्त होने से पितृदोष उत्पन्न होता है और ये पितर नाराज होकर कुल की वृद्धि अर्थात संतान उत्पत्ति में बाधक सिद्ध होते हैं।
ज्योतिषाचार्य विवेक उपाध्याय बताते हैं कि आचार्य पराशर ने आठ प्रकार के शाप का वर्णन किया है। ये सर्प शाप, पितृ शाप, मातृ शाप, भ्रातृ शाप, मातुल शाप, ब्रह्म शाप, भार्या शाप, प्रेत शाप हैं। इन सभी शापों से मनुष्य को संतान क्षय का कष्ट भोगना पड़ता है। इसमें से पितृ, मातृ और प्रेत शाप पितृदोष की श्रेणी में आते हैं। प्रेत शाप के अंतर्गत वह पितर आते हैं जिनका कर्म लोप हो गया हो या उनके मृत्यु के उपरांत कुल की ओर से श्राद्ध आदि कर्मों को नहीं किया गया हो और अकाल मृत्यु के कारण वे प्रेत योनि में भटक रहे हों। संतान से वंचित मनुष्य हरिवंश पुराण श्रवण, संतान गोपाल मंत्र जाप, अभिलाषाष्टक पाठ, वंश वृद्धि कवच पाठ, संतान सुंदरी मंत्र जाप आदि कर संतान जनित अभीष्ट फल को प्राप्त कर सकते हैं।
कुंडली से जाने पितृदोष
पितृशाप
-----
0 तुला राशि का सूर्य शनि के नवांश में होकर पुत्र भाव में बैठा हो और आगे-पीछे यानि चार-छह भाव में क्रूर ग्रह बैठे हों तो पितृशाप होगा।
0 सूर्य पुत्रेश होकर त्रिकोण नौ, पांच में पापग्रह से युक्त हो या उनके बीच हो या देखा जाता हो।
0 बृहस्पति सिंह राशि में हो और पुत्रेश सूर्य के साथ हो तथा पंचम लग्न में पापग्रह की स्थिति हो।
0 दशमेष पंचम में एवं पुत्रेश दशम में हो और पंचम लग्न में पापग्रह हो।
0 षष्ठेष पुत्र भाव में, दशमेष षष्ठ में व पुत्रकारक ग्रह राहु के साथ हो।
मातृशाप
0 पुत्रेश छह, आठ, 12 में हो, लग्नेश नीच में और चंद्रमा पापग्रह से युत हो।
0 पुत्रेशचंद्र और शनि, मंगल, राहु युत होकर भाग्य या पुत्र भाव में हो।
0 चतुर्थेश मंगल, शनि, राहु से युत हो, लग्न पंचम में चंद्र, सूर्य की युति हो।
0 अष्ठमेश पंचम में, पुत्रेश अष्टम में, चतुर्थेश तथा चंद्रमा छह, आठ, 12 में हो।
0 अष्टम गुरू मंगल राहु हो एवं पंचम में शनि चंद्रमा की स्थिति हो।
प्रेतशाप
0 शनि सूर्य पंचम में हो और सप्तमस्थ क्षीण चंद्रमा एवं प्रथम द्वादश में राहु गुरू हो।
0 पुत्रेश शनि अष्टम में लग्न में मंगल और पुत्रप्रद ग्रह अष्टमस्थ हो।
0 लग्न में पापग्रह द्वादश सूर्य मंगल और शनि, बुध पंचम तथा पुत्रेश अष्टम में हो।
0 लग्न में राहु पंचम में शनि एवं गुरू अष्टम में हो।
0 पुत्रेश व पुत्रकारक ग्रह नीचगत हो व नीचस्थ ग्रहों से देखे जाते हों।
उपाय
पितृदोष से बचने के उपाय
0 पितरों की प्रसन्नता के लिए श्रद्धापूर्वक गया आदि श्राद्ध का ब्राह्मणों को भोजन कराएं।
0 स्वकुल की कन्या या किसी भी कन्या का कन्यादान करें। साथ ही गोदान भी करें।
0 प्रत्येक महीने की अमावस्या तिथि को पितरों के निमित्त श्राद्ध कर ब्राह्मण को भोजन व वस्त्रादि दान करें।
0 पितृपक्ष में तर्पण के साथ-साथ पितरों की तिथि पर पार्वण श्राद्ध अवश्य करें।
0 संतान से वंचित मनुष्य समुद्र स्नान कर दुग्धपान करते हुए लक्ष्य गायत्री का जप करें। ग्रह शांति और ग्रहदान कर ब्राह्मण को भोजन करावे।
0 नवरात्रि काल में शुद्र की कन्या का पूजन करने से पुत्र की प्राप्ति अवश्य होती है।
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ज्योतिषाचार्य विवेक उपाध्याय बताते हैं कि आचार्य पराशर ने आठ प्रकार के शाप का वर्णन किया है। ये सर्प शाप, पितृ शाप, मातृ शाप, भ्रातृ शाप, मातुल शाप, ब्रह्म शाप, भार्या शाप, प्रेत शाप हैं। इन सभी शापों से मनुष्य को संतान क्षय का कष्ट भोगना पड़ता है। इसमें से पितृ, मातृ और प्रेत शाप पितृदोष की श्रेणी में आते हैं। प्रेत शाप के अंतर्गत वह पितर आते हैं जिनका कर्म लोप हो गया हो या उनके मृत्यु के उपरांत कुल की ओर से श्राद्ध आदि कर्मों को नहीं किया गया हो और अकाल मृत्यु के कारण वे प्रेत योनि में भटक रहे हों। संतान से वंचित मनुष्य हरिवंश पुराण श्रवण, संतान गोपाल मंत्र जाप, अभिलाषाष्टक पाठ, वंश वृद्धि कवच पाठ, संतान सुंदरी मंत्र जाप आदि कर संतान जनित अभीष्ट फल को प्राप्त कर सकते हैं।
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कुंडली से जाने पितृदोष
पितृशाप
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0 तुला राशि का सूर्य शनि के नवांश में होकर पुत्र भाव में बैठा हो और आगे-पीछे यानि चार-छह भाव में क्रूर ग्रह बैठे हों तो पितृशाप होगा।
0 सूर्य पुत्रेश होकर त्रिकोण नौ, पांच में पापग्रह से युक्त हो या उनके बीच हो या देखा जाता हो।
0 बृहस्पति सिंह राशि में हो और पुत्रेश सूर्य के साथ हो तथा पंचम लग्न में पापग्रह की स्थिति हो।
0 दशमेष पंचम में एवं पुत्रेश दशम में हो और पंचम लग्न में पापग्रह हो।
0 षष्ठेष पुत्र भाव में, दशमेष षष्ठ में व पुत्रकारक ग्रह राहु के साथ हो।
मातृशाप
0 पुत्रेश छह, आठ, 12 में हो, लग्नेश नीच में और चंद्रमा पापग्रह से युत हो।
0 पुत्रेशचंद्र और शनि, मंगल, राहु युत होकर भाग्य या पुत्र भाव में हो।
0 चतुर्थेश मंगल, शनि, राहु से युत हो, लग्न पंचम में चंद्र, सूर्य की युति हो।
0 अष्ठमेश पंचम में, पुत्रेश अष्टम में, चतुर्थेश तथा चंद्रमा छह, आठ, 12 में हो।
0 अष्टम गुरू मंगल राहु हो एवं पंचम में शनि चंद्रमा की स्थिति हो।
प्रेतशाप
0 शनि सूर्य पंचम में हो और सप्तमस्थ क्षीण चंद्रमा एवं प्रथम द्वादश में राहु गुरू हो।
0 पुत्रेश शनि अष्टम में लग्न में मंगल और पुत्रप्रद ग्रह अष्टमस्थ हो।
0 लग्न में पापग्रह द्वादश सूर्य मंगल और शनि, बुध पंचम तथा पुत्रेश अष्टम में हो।
0 लग्न में राहु पंचम में शनि एवं गुरू अष्टम में हो।
0 पुत्रेश व पुत्रकारक ग्रह नीचगत हो व नीचस्थ ग्रहों से देखे जाते हों।
उपाय
पितृदोष से बचने के उपाय
0 पितरों की प्रसन्नता के लिए श्रद्धापूर्वक गया आदि श्राद्ध का ब्राह्मणों को भोजन कराएं।
0 स्वकुल की कन्या या किसी भी कन्या का कन्यादान करें। साथ ही गोदान भी करें।
0 प्रत्येक महीने की अमावस्या तिथि को पितरों के निमित्त श्राद्ध कर ब्राह्मण को भोजन व वस्त्रादि दान करें।
0 पितृपक्ष में तर्पण के साथ-साथ पितरों की तिथि पर पार्वण श्राद्ध अवश्य करें।
0 संतान से वंचित मनुष्य समुद्र स्नान कर दुग्धपान करते हुए लक्ष्य गायत्री का जप करें। ग्रह शांति और ग्रहदान कर ब्राह्मण को भोजन करावे।
0 नवरात्रि काल में शुद्र की कन्या का पूजन करने से पुत्र की प्राप्ति अवश्य होती है।