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Chitrakoot News: अमवा में मिले हजारों साल पुराने दुर्लभ प्रागैतिहासिक शैल चित्र
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अमवा में मिले दुर्लभ शैल चित्र।
- फोटो : संवाद
चित्रकूट। मानिकपुर तहसील के अमवा गांव के जंगल में प्रागैतिहासिक शैल चित्र मिले हैं। शैलचित्रों को इतिहासकार डाॅ. संग्राम सिंह और उनकी टीम ने खोजा है। उन्होंने बताया कि इलाके के शैल चित्रों के बारे में प्रोफेसर डीएच गार्डन ने अपनी पुस्तक में जिक्र किया है।
डाॅ. संग्राम सिंह ने बताया कि कल्याण गढ़ से लगभग आठ किमी दूर अमवा ग्रामसभा में धारकुंडी आश्रम के पास जंगल में जुगनी हाई का पथरी दाई स्थल है। इस जगह पर पांच शिलाखंडों में प्रागैतिहासिक युगीन शैल चित्रों के प्रमाण मिले हैं। उन्होंने बताया कि विंध्य क्षेत्र में सर्वप्रथम प्रागैतिहासिक शैल चित्रों की खोज का श्रेय आर्चीवाल्ड और जान ककवर्ण को जाता है। प्रोफेसर डीएच गार्डन ने प्रीहिस्टोरिक बैकग्राउंड ऑफ इंडियन कल्चर नामक पुस्तक में प्रागैतिहासिक युगीन शैल चित्रों के बारे में लिखा है। अमवा से मिले प्रागैतिहासिक शैलचित्र अब भी सुरक्षित हैं।
डाॅ. सिंह ने बताया कि प्रागैतिहासिक शैल चित्र हेमेटाइट प्रकार के हैं, जो गेरुआ रंग के हैं। अधिकांश खुले शिलाखंड के नीचे हैं और ऊपर से छतरी नुमा सुरक्षित बड़ी चट्टान हैं। ये धूप और पानी से सुरक्षित हैं। सघन जंगल में होने के कारण लोग यहां तक नहीं पहुंच पाते हैं। चित्रों में ज्यादातर जंगली पशुओं का अंकन दृष्टिगोचर होता है।
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बताया कि बड़ी शिला में एक साथ लगभग 50 जंगली पशुओं तथा मानव चित्रों के साथ उनके क्रिया कलापों का निरुपण प्रतीत होता है। अनुसंधान दल में एकेएस विश्वविद्यालय के बीएड विभाग के विभागाध्यक्ष प्रो. बीडी सिंह, असिस्टेंट प्रोफेसर राजकीय महाविद्यालय कालूपुर पाही डॉ. यशवंत सिंह भी शामिल हैं।
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डाॅ. संग्राम सिंह ने बताया कि कल्याण गढ़ से लगभग आठ किमी दूर अमवा ग्रामसभा में धारकुंडी आश्रम के पास जंगल में जुगनी हाई का पथरी दाई स्थल है। इस जगह पर पांच शिलाखंडों में प्रागैतिहासिक युगीन शैल चित्रों के प्रमाण मिले हैं। उन्होंने बताया कि विंध्य क्षेत्र में सर्वप्रथम प्रागैतिहासिक शैल चित्रों की खोज का श्रेय आर्चीवाल्ड और जान ककवर्ण को जाता है। प्रोफेसर डीएच गार्डन ने प्रीहिस्टोरिक बैकग्राउंड ऑफ इंडियन कल्चर नामक पुस्तक में प्रागैतिहासिक युगीन शैल चित्रों के बारे में लिखा है। अमवा से मिले प्रागैतिहासिक शैलचित्र अब भी सुरक्षित हैं।
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डाॅ. सिंह ने बताया कि प्रागैतिहासिक शैल चित्र हेमेटाइट प्रकार के हैं, जो गेरुआ रंग के हैं। अधिकांश खुले शिलाखंड के नीचे हैं और ऊपर से छतरी नुमा सुरक्षित बड़ी चट्टान हैं। ये धूप और पानी से सुरक्षित हैं। सघन जंगल में होने के कारण लोग यहां तक नहीं पहुंच पाते हैं। चित्रों में ज्यादातर जंगली पशुओं का अंकन दृष्टिगोचर होता है।
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बताया कि बड़ी शिला में एक साथ लगभग 50 जंगली पशुओं तथा मानव चित्रों के साथ उनके क्रिया कलापों का निरुपण प्रतीत होता है। अनुसंधान दल में एकेएस विश्वविद्यालय के बीएड विभाग के विभागाध्यक्ष प्रो. बीडी सिंह, असिस्टेंट प्रोफेसर राजकीय महाविद्यालय कालूपुर पाही डॉ. यशवंत सिंह भी शामिल हैं।