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कई बार खदानों में काम करने वाले मजदूरों की मौत हो चुकी
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भरतकूप क्षेत्र के पहाड़ों की ओर पत्थरों का ढुलान करते वाहन। संवाद
- फोटो : CHITRAKOOT
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भरतकूप (चित्रकूट)। सोमवार को हादसे में हुई मौत मजदूर की मौत के पीछे का सही कारण स्पष्ट न हो पाया हो। पुलिस मामले को सुलझाने में लगी है। वहीं भरतकूप क्षेत्र में पहाड़ों की खदानों में काम करने वाले मजदूरों की मौत कई बार हो चुकी है। कई गंभीर रूप से घायल भी हुए है। अधिकांश घटनाओं को ठेकेदार पीड़ित परिजन व अधिकारियों से साठगांठ कर मामले को दबा देते हैं। कई बार अधिकारियों पर भी जांच के नाम पर खानापूर्ति करने के आरोप लगते हैं।
भरतकूप के पहाड़ी क्षेत्र में ग्रेनाइट पत्थर पाया जाता है। इस पत्थर की गिट्टियों की मांग अधिक है। क्षेत्र के भौरा, बजनी, व गोड़ा, कोरोरी आदि की खदानों में काम करने के लिए बड़ी संख्या में मजदूर लगे रहते है। इसके साथ ही मशीनों से भी पत्थर तोड़े जाते है। पत्थर की तोड़ान के समय सुरक्षा के नियमों की अनदेखी करने से अक्सर दुुर्घटनाएं होती रहती है। जिससे मजदूरों की मौत हो जाती है। अभी तक दस से अधिक मजदूरों की मौत हो चुकी है। दो महीने पहले पोकलैंड मशीन में काम करने वाले बिहार के चालक की भी मौत हो चुकी है। इसी तरह से पिछले साल रौलीकल्याणपुर गांव के मजदूर की मौत हो गई थी। अन्य कई घटनाओं में मप्र क्षेत्र के रहने वाले मजदूरों की मौत भी हुई है।
बाहरी मजदूरों से कराया जाता कार्य
चित्रकूट। स्थानीय मजदूरों से काम न कराकर जिले की सीमा से सटे मजदूरों को काम मे लगाया जाता है। ताकि यदि कोई घटना हो तो मजदूर के परिजन आवाज उठा सके। बाहर से आने वाले मजदूरों की बस्तियां भी भरतकूप क्षेत्र में पहाड़ों के नीचे बस गई है। जहां अधिकतर परिवार समस्याओं से जूझ रहे है।
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भरतकूप कस्बे में कई बस्ती इस समय मजदूरों की बसी हुई है। जहां बिजली, पानी, जमीन की समस्याओं को लेकर कई बार मजदूर अपनी आवाज उठा चुके है। जिसमें एक बस्ती के मजदूरों का कहना है कि उनको मकान बनाने के लिए जमीन एक क्रेशर मालिक ने दिया था। अब उसके न रहने पर उनके परिवार के सदस्य उस स्थान को खाली करने का दबाव बनाए रहते है।
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भरतकूप के पहाड़ी क्षेत्र में ग्रेनाइट पत्थर पाया जाता है। इस पत्थर की गिट्टियों की मांग अधिक है। क्षेत्र के भौरा, बजनी, व गोड़ा, कोरोरी आदि की खदानों में काम करने के लिए बड़ी संख्या में मजदूर लगे रहते है। इसके साथ ही मशीनों से भी पत्थर तोड़े जाते है। पत्थर की तोड़ान के समय सुरक्षा के नियमों की अनदेखी करने से अक्सर दुुर्घटनाएं होती रहती है। जिससे मजदूरों की मौत हो जाती है। अभी तक दस से अधिक मजदूरों की मौत हो चुकी है। दो महीने पहले पोकलैंड मशीन में काम करने वाले बिहार के चालक की भी मौत हो चुकी है। इसी तरह से पिछले साल रौलीकल्याणपुर गांव के मजदूर की मौत हो गई थी। अन्य कई घटनाओं में मप्र क्षेत्र के रहने वाले मजदूरों की मौत भी हुई है।
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बाहरी मजदूरों से कराया जाता कार्य
चित्रकूट। स्थानीय मजदूरों से काम न कराकर जिले की सीमा से सटे मजदूरों को काम मे लगाया जाता है। ताकि यदि कोई घटना हो तो मजदूर के परिजन आवाज उठा सके। बाहर से आने वाले मजदूरों की बस्तियां भी भरतकूप क्षेत्र में पहाड़ों के नीचे बस गई है। जहां अधिकतर परिवार समस्याओं से जूझ रहे है।
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भरतकूप कस्बे में कई बस्ती इस समय मजदूरों की बसी हुई है। जहां बिजली, पानी, जमीन की समस्याओं को लेकर कई बार मजदूर अपनी आवाज उठा चुके है। जिसमें एक बस्ती के मजदूरों का कहना है कि उनको मकान बनाने के लिए जमीन एक क्रेशर मालिक ने दिया था। अब उसके न रहने पर उनके परिवार के सदस्य उस स्थान को खाली करने का दबाव बनाए रहते है।

भरतकूप क्षेत्र के खनन होने से खोखले हो रहे पहाड़। संवाद- फोटो : CHITRAKOOT