मवेशी पालना घाटे का सौदा
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चित्रकूट। पहले खेती में कुछ कमी रह जाए तो दूध बेचकर परिवार चला लेते थे लेकिन अब तो सूखे के कारण मवेशी पालना भी परिवार पालने जैसा कठिन हो गया है। चारा-भूसा व पानी न मिलने से दुधारू मवेशियों को भी बांधना घाटे का सौदा बनता जा रहा है। यह दर्द है सूखे से कराह रहे बुंदेलखंड के चित्रकूट जनपद के उन किसानों का जो मवेशी पालक भी हैं। कभी एक-दो गाय-भैंस रखकर किसान कुछ दूध बेचकर भी परिवार चलता लेकिन सूखे ने इस धंधे पर भी नजर लगा दी है। महंगा भूसा और पानी की कमी के कारण मवेशी पालकों को दूध भी कम मिलने लगा। जिससे धंधा बंदी की कगार पर है।
मानिकपुर क्षेत्र के चुरेह केशरूआ के रामदयाल व मऊ क्षेत्र के पूरबपताई के सच्चिदानंद ने बताया कि दस साल से मवेशी पालकर दूध बेचते हैं। कभी खेती में कम पैदावार हुई तो दूध बेचकर बच्चों का पेट भर लेते थे लेकिन अब तो मवेशियों का ही पेट भरना मुश्किल है। जब मवेशी का पेट नहीं भरेगा तो दूध कहां से होगा। रामनगर ब्लॉक के छींबो निवासी चुनकावन और सदर ब्लॉक के चितरागोकुलपुर की मंटो देवी ने बताया कि पहले पांच रुपये किलो भूसा खरीदते थे अब आठ और नौ रुपये प्रति किलो मिलता है। वह भी बमुश्किल लाइन लगाने पर। एक बाल्टी पानी घर के लिए दूर से लाते हैं तो मवेशियों के लिए पानी लाना बेहद मुश्किल हो रहा है। तालाब कुएं सूख रहे हैं। ऐसे में जब तक दूध देते हैं मवेशी तब तक उन्हें बांधते हैं वरना छोड़ देते हैं।
इन दिनों कुछ गांवों में मवेशियों के पैरों में सर्रा रोग फैल रहा है। पैर में सूजन आने के बाद शरीर गरम हो जाता है। मवेशी भोजन पानी छोड़ देता है। बसिला के किसान सुमन सविता और जानकी प्रसाद ने बताया कि पशु चिकित्सकों को सूचना दी गई लेकिन कोई नहीं आया। जबकि मवेशियों को चिकित्सालय तक पहुंचाना मुश्किल होता है। प्रभारी पशु चिकित्साधिकारी डॉ. एचएस बबेले ने बताया कि सूखे के कारण मवेशियों पर प्रभाव तो पड़ा है। भरपूर भोजन व पानी नहीं मिल रहा है। इसके बावजूद विभाग को जहां से भी सूचना मिलती है तो कर्मचारी भेजकर इलाज कराया जा रहा है। सूखे से निपटने के लिए हर ब्लॉकवार प्रति पात्र किसान को 25 किलो भूसा वितरण किया गया है। जरूरत पड़ने पर दोबारा भूसा दिया जा रहा है।