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जहां अंग्रेज देते थे देशभक्तों को फांसी
Chitrakoot
Updated Tue, 12 Aug 2014 05:30 AM IST
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चित्रकूट। मानिकपुर में अंग्रेजों के जमाने का थाना बदहाल हालत में हैं। जिले के इक्का- दुक्का शहीदों की यादों के इस तरह के खजाने को लेकर शासन और प्रशासन की उदासीनता लोगों को परेशान करती है। पुराने लोग बताते हैं कि यहां पर देशभक्तों को अंग्रेज फांसी देते थे।
ब्लाक संसाधन केंद्र के पीछे खंडहरों में बिखरे अवशेष हमारे देशभक्तों की बहादुरी के किस्से बताते हैं। पुराना मानिकपुर के बुजुर्गों से इसका जिक्र छेड़ने पर वे धुंधली यादों में खो जाते हैं। 90 वर्षीय अयोध्या प्रसाद बताते हैं कि वह जमाना निरंकुशता था। हालांकि मानिकपुर के इस थाने के निरंकुश थानेदार जिसका नाम बृजमोहन था, पर तब के जमींदार अंकुश रखते थे। उन्होंने बताया कि थानेदार पेड़ से लटकाकर देशभक्तों को फांसी देता था और इसको रजिस्टर में दर्ज भी नहीं करता था। जब इसकी जानकारी जमींदार को होती थी तो वहां बवाल भी हो जाता था। माताबदल बताते हैं कि तब अंग्रेजों की सरपरस्ती में थानेदार और सिपाही पास के तालाब में नहाने आने वाली महिलाओं से भी अभद्रता करते थे। जमींदार को पता चला तो उसने थानेदार को जमकर मारापीटा और शायद इसके बाद यहां से थाना दूसरी जगह स्थानांतरित भी कर दिया गया। रख रखाव के अभाव में चोर खिड़की दरवाजों ले गए और कीमती सामान और दस्तावेज भी गायब हो गए।
(इनसेट)
गजट में भी है इसका जिक्र
सरकारी गजट में इसका जिक्र है। प्राचीन इतिहास के छात्र अनुज हनुमत द्विवेदी ने बताया कि बांदा से जानकारी पर उनको 1906 से 1909 के बीच का वह नक्शा मिला, जिसमें जमीन के 684 नंबर पर यह स्थान मानिकपुर थाने के रूप में दर्ज है। उन्होंने बताया कि वह इस संबंध में जिलाधिकारी से भी मिले थे और उन्होंने इस जगह की प्रमाणिकता पता करने और संरक्षित कराने का भरोसा भी दिया था।
ब्लाक संसाधन केंद्र के पीछे खंडहरों में बिखरे अवशेष हमारे देशभक्तों की बहादुरी के किस्से बताते हैं। पुराना मानिकपुर के बुजुर्गों से इसका जिक्र छेड़ने पर वे धुंधली यादों में खो जाते हैं। 90 वर्षीय अयोध्या प्रसाद बताते हैं कि वह जमाना निरंकुशता था। हालांकि मानिकपुर के इस थाने के निरंकुश थानेदार जिसका नाम बृजमोहन था, पर तब के जमींदार अंकुश रखते थे। उन्होंने बताया कि थानेदार पेड़ से लटकाकर देशभक्तों को फांसी देता था और इसको रजिस्टर में दर्ज भी नहीं करता था। जब इसकी जानकारी जमींदार को होती थी तो वहां बवाल भी हो जाता था। माताबदल बताते हैं कि तब अंग्रेजों की सरपरस्ती में थानेदार और सिपाही पास के तालाब में नहाने आने वाली महिलाओं से भी अभद्रता करते थे। जमींदार को पता चला तो उसने थानेदार को जमकर मारापीटा और शायद इसके बाद यहां से थाना दूसरी जगह स्थानांतरित भी कर दिया गया। रख रखाव के अभाव में चोर खिड़की दरवाजों ले गए और कीमती सामान और दस्तावेज भी गायब हो गए।
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(इनसेट)
गजट में भी है इसका जिक्र
सरकारी गजट में इसका जिक्र है। प्राचीन इतिहास के छात्र अनुज हनुमत द्विवेदी ने बताया कि बांदा से जानकारी पर उनको 1906 से 1909 के बीच का वह नक्शा मिला, जिसमें जमीन के 684 नंबर पर यह स्थान मानिकपुर थाने के रूप में दर्ज है। उन्होंने बताया कि वह इस संबंध में जिलाधिकारी से भी मिले थे और उन्होंने इस जगह की प्रमाणिकता पता करने और संरक्षित कराने का भरोसा भी दिया था।
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