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प्रसूता कराहती रही कर दिया डिस्चार्ज
Updated Wed, 11 Jul 2018 12:04 AM IST
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प्रसूता कराहती रही कर दिया डिस्चार्ज
अमर उजाला ब्यूरो
चित्रकूट। मंगलवार जिला अस्पताल में भौंरी गांव की गर्भवती महिला का प्रसव के बाद नवजात का पूरा इलाज डाक्टरों ने नहीं किया। जबरन उसे घर जाने को मजबूर किया। वार्ड से डिस्चार्ज कर गांव जाने को कहा इसके बाद स्ट्रेचर तक नहीं दिया। प्रसूता अपनी मां व अन्य परिजनों का कंधा पकड़कर किसी तरह बाहर तक पहुंची।
जिला अस्पताल के जच्चा बच्चा वार्ड में रैपुरा थानाक्षेत्र के भौंरी निवासी शिवानी पत्नी आनंद को सात जुलाई को भर्ती किया गया था। महिला की ससुराल भगवतपुर इलाहाबाद है लेकिन इस समय वह मायके में थी। उसने बताया कि पहले दर्द होने पर किसी तरह उसे भर्ती किया गया। डाक्टर व स्टाफ उसे रेफर कर रहे थे लेकिन बार-बार कहने पर भर्ती किया गया। 9 जुलाई को उसने बालक को जना। इसके बाद से लगातार स्टाफ व डाक्टर उससे गांव जाने को कहते रहे। उसका और नवजात का जरूरी इलाज भी करने में आनाकानी की गई। दस जुलाई को उसके बालक की हालत बिगड़ी तो उसे आक्सीजन पर रखा गया। कुछ देर बाद फिर उसे गांव जाने के लिए डिस्चार्ज लेटर थमा दिया गया।
प्रसूता व उसके परिजनों ने बताया कि मौके पर आशा भी नहीं थी वह गांव गई थी। जब स्टाफ से कहा गया कि दोपहर बाद डिस्चार्ज कर देना लेकिन कोई नहीं माना। दर्द होने पर बिना स्ट्रेचर के उसे गेट तक लाया गया। दर्द बढ़ने पर वह नवजात के साथ वहीं जमीन पर लेट गई। एंबुलेंस की भी व्यवस्था नहीं मिली। जिसके लिए स्टाफ ने कहा कि 102 पर फोन कर बुलाओ यहां से कोई मदद नहीं मिलेगी। दो घंटे बाद आई आशा ने फिर एंबुलेंस बुलाकर उन्हें गांव तक पहुंचाया।
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अमर उजाला ब्यूरो
चित्रकूट। मंगलवार जिला अस्पताल में भौंरी गांव की गर्भवती महिला का प्रसव के बाद नवजात का पूरा इलाज डाक्टरों ने नहीं किया। जबरन उसे घर जाने को मजबूर किया। वार्ड से डिस्चार्ज कर गांव जाने को कहा इसके बाद स्ट्रेचर तक नहीं दिया। प्रसूता अपनी मां व अन्य परिजनों का कंधा पकड़कर किसी तरह बाहर तक पहुंची।
जिला अस्पताल के जच्चा बच्चा वार्ड में रैपुरा थानाक्षेत्र के भौंरी निवासी शिवानी पत्नी आनंद को सात जुलाई को भर्ती किया गया था। महिला की ससुराल भगवतपुर इलाहाबाद है लेकिन इस समय वह मायके में थी। उसने बताया कि पहले दर्द होने पर किसी तरह उसे भर्ती किया गया। डाक्टर व स्टाफ उसे रेफर कर रहे थे लेकिन बार-बार कहने पर भर्ती किया गया। 9 जुलाई को उसने बालक को जना। इसके बाद से लगातार स्टाफ व डाक्टर उससे गांव जाने को कहते रहे। उसका और नवजात का जरूरी इलाज भी करने में आनाकानी की गई। दस जुलाई को उसके बालक की हालत बिगड़ी तो उसे आक्सीजन पर रखा गया। कुछ देर बाद फिर उसे गांव जाने के लिए डिस्चार्ज लेटर थमा दिया गया।
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प्रसूता व उसके परिजनों ने बताया कि मौके पर आशा भी नहीं थी वह गांव गई थी। जब स्टाफ से कहा गया कि दोपहर बाद डिस्चार्ज कर देना लेकिन कोई नहीं माना। दर्द होने पर बिना स्ट्रेचर के उसे गेट तक लाया गया। दर्द बढ़ने पर वह नवजात के साथ वहीं जमीन पर लेट गई। एंबुलेंस की भी व्यवस्था नहीं मिली। जिसके लिए स्टाफ ने कहा कि 102 पर फोन कर बुलाओ यहां से कोई मदद नहीं मिलेगी। दो घंटे बाद आई आशा ने फिर एंबुलेंस बुलाकर उन्हें गांव तक पहुंचाया।
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