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बदल गए हैं होली मिलन समारोह के मायने और ढंग
ब्यूरो, अमर उजाला चंदौली
Updated Sun, 27 Mar 2016 01:27 AM IST
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उमंग, उत्साह और प्रेम, सौहार्द व मिलन का प्रतीक होली का त्योहार बीत गया और अब होली मिलन समारोहों की धूम है। कहीं किसी वर्ग विशेष तो कहीं जाति और व्यवसाय विशेष वर्ग के लिए होली मिलन समारोह का आयोजन किया जा रहा है। ये सिलसिला अभी दस दिन तक चलने वाला है। लेकिन पिछले कुछ समय से होली मिलन की धूम और ढंग में काफी बदलाव देखने को मिला है। होली मिलन अब लोगों के आपस में घुलने मिलने का बहाना होने के बजाय अपने हितों को साधने का जरिया अधिक बन गया है।
भारतीय संस्कृति में होली का महत्व पौराणिक काल से रही है। ऋतु परिवर्तन के दौर में इसके कई अध्यात्मिक और भौतिक मायने रहे हैं। वर्तमान समय में भी इसका महत्व अलग ही रहा है। यही कारण है कि पूर्व में इसकी तैयारी बहुत पहले से शुरू हो जाती थी। पुरनियों की माने तो होली सिर्फ एक दूसरे को रंग लगाने का ही त्योहार नहीं है बल्कि बिछड़ों को मिलाने, एक दूसरे से दुश्मनी भूलाने का भी तरीका रहा है। यही कारण है कि होली बीतने के चार पांच दिन बाद तक लोग एक दूसरे के घर पहुंच कर होली मिलन करते रहे हैं।
लेकिन अब इसमें इसमें कमी आई है। अब तो होली से अधिक होली मिलन समारोहों को महत्व दिया जा रहा है। वर्ग भेद को मिटाने वाले होली में भी वर्ग भेद घर कर गया है। यही कारण है कि होली के बाद सभी वर्गों की अलग अलग होली होती है। इसमें उसी वर्ग के लोगों को प्रवेश दिया जाता है, चाहे वह जाति विशेष हो, व्यवसाय विशेष अथवा राजनीतिक विशेष का होली हो। नगर के हृदयपुर निवासी किसान गुरुनान्हक कहते हैं कि एक दशक पहले तक होली का स्वरूप अलग ही था लेकिन धीरे धीरे यह स्वरूप बदलता गया है। अब होली मिलाने के बजाए लोगों को दूर करने लगा है।
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शास्त्री कालोनी निवासी रेलवे इंटर कालेज के अध्यापक व एनसीसी के मेजर अमरेन्द्र कुमार कहते हैं कि लोगों के व्यवहार के साथ ही होली का त्योहार भी बदल रहा है। पहले जहां सभी वर्ग के लोग एक दूसरे के घर पहुंच कर खुल कर मिलते थे वहीं अब सभी वर्ग के लिए अलग होली है। कैलाशपुरी निवासी व्यवसायी गोपाल जी कहते हैं कि होली रंग अबीर लगाने का त्योहार ही नहीं है बल्कि एक दूसरे से मिलने का पर्व हाली है। पहले अलग से होली मिलन समारोह नहीं होते थे बल्कि जहां लोग एकत्र हुए वहीं समारोह होता था। सभी वर्ग के लोग उसमें शामिल होते थे। गृहणी अंजली सिन्हा कहती है कि सभी पर्व त्योहार में व्यावसायिकता घुस गई है। हालांकि अभी भी होली लोगों के मिलने जुलने का पर्व है। भले ही होली मिलन समारोह के ही बहाने लोग एक दूसरे से मिल रहे हैं और यह सिलसिला चलते रहना चाहिए।
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भारतीय संस्कृति में होली का महत्व पौराणिक काल से रही है। ऋतु परिवर्तन के दौर में इसके कई अध्यात्मिक और भौतिक मायने रहे हैं। वर्तमान समय में भी इसका महत्व अलग ही रहा है। यही कारण है कि पूर्व में इसकी तैयारी बहुत पहले से शुरू हो जाती थी। पुरनियों की माने तो होली सिर्फ एक दूसरे को रंग लगाने का ही त्योहार नहीं है बल्कि बिछड़ों को मिलाने, एक दूसरे से दुश्मनी भूलाने का भी तरीका रहा है। यही कारण है कि होली बीतने के चार पांच दिन बाद तक लोग एक दूसरे के घर पहुंच कर होली मिलन करते रहे हैं।
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लेकिन अब इसमें इसमें कमी आई है। अब तो होली से अधिक होली मिलन समारोहों को महत्व दिया जा रहा है। वर्ग भेद को मिटाने वाले होली में भी वर्ग भेद घर कर गया है। यही कारण है कि होली के बाद सभी वर्गों की अलग अलग होली होती है। इसमें उसी वर्ग के लोगों को प्रवेश दिया जाता है, चाहे वह जाति विशेष हो, व्यवसाय विशेष अथवा राजनीतिक विशेष का होली हो। नगर के हृदयपुर निवासी किसान गुरुनान्हक कहते हैं कि एक दशक पहले तक होली का स्वरूप अलग ही था लेकिन धीरे धीरे यह स्वरूप बदलता गया है। अब होली मिलाने के बजाए लोगों को दूर करने लगा है।
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शास्त्री कालोनी निवासी रेलवे इंटर कालेज के अध्यापक व एनसीसी के मेजर अमरेन्द्र कुमार कहते हैं कि लोगों के व्यवहार के साथ ही होली का त्योहार भी बदल रहा है। पहले जहां सभी वर्ग के लोग एक दूसरे के घर पहुंच कर खुल कर मिलते थे वहीं अब सभी वर्ग के लिए अलग होली है। कैलाशपुरी निवासी व्यवसायी गोपाल जी कहते हैं कि होली रंग अबीर लगाने का त्योहार ही नहीं है बल्कि एक दूसरे से मिलने का पर्व हाली है। पहले अलग से होली मिलन समारोह नहीं होते थे बल्कि जहां लोग एकत्र हुए वहीं समारोह होता था। सभी वर्ग के लोग उसमें शामिल होते थे। गृहणी अंजली सिन्हा कहती है कि सभी पर्व त्योहार में व्यावसायिकता घुस गई है। हालांकि अभी भी होली लोगों के मिलने जुलने का पर्व है। भले ही होली मिलन समारोह के ही बहाने लोग एक दूसरे से मिल रहे हैं और यह सिलसिला चलते रहना चाहिए।