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Hindi News ›   Uttar Pradesh ›   Chandauli News ›   The story of the child playing the role of Ram is unique, Deepak walked 15 km to take the vocal exam.

रामनगर की रामलीला: अनूठी है राम की भूमिका निभा रहे बच्चे की कहानी, स्वर परीक्षा देने 15 किमी पैदल गए दीपक

Thu, 05 Oct 2023 12:33 PM IST
किरन रौतेला अमरेंद्र पांडेय, अमर उजाला, चंदौली, वाराणसी
अमरेंद्र पांडेय, अमर उजाला, चंदौली, वाराणसी Published by: किरन रौतेला Updated Thu, 05 Oct 2023 12:33 PM IST
सार

यूनेस्को के विश्व धरोहर में शामिल 221 वर्ष पुरानी रामनगर की विश्वप्रसिद्ध रामलीला में इस वर्ष राम की भूमिका चंदौली के नियामताबाद विकासखंड के छोटे से गांव रंगौली के निवासी नरेंद्र पांडेय के इकलौते पुत्र दीपक पांडेय निभा रहे हैं। पिता नरेंद्र पांडेय  चंद्ररखा में एक स्कूल की बस चलाते हैं और दीपक भी उसी स्कूल में सातवीं के छात्र हैं।

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The story of the child playing the role of Ram is unique, Deepak walked 15 km to take the vocal exam.
रामनगर की रामलीला में भगवान राम की भूमिका निभाने वाले दीपक पांडेय - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

रामनगर की विश्वप्रसिद्ध रामलीला देखने आई भीड़ में खड़े एक बच्चे ने अपने पिता से पूछा-पापा क्या मैं कभी राम नहीं बन सकता, क्या मैं कभी हाथी पर नहीं चढूंगा, क्या मैं कभी राजा साहब से नहीं मिलूंगा। पिता ने हंसी में बात टाल दी और कहा कि यह आसान नहीं है और न ही मुझे मालूम है कि राम कैसे बनते हैं। बच्चे ने हठ किया तो पिता ने खिलौना दिलाकर फुसला दिया। लेकिन बच्चे पर पूरे वर्ष बस एक ही धुन सवार थी कि मुझे राम बनना है। काफी मेहनत और प्रयास के बाद उसने खुद ही चयन प्रक्रिया की जानकारी जुटा ली और एक दिन पिता से कहा कि मुझे रामनगर ले चलिए, स्वर परीक्षा देनी है। पिता ने कहा समय नहीं है। बच्चा अकेले ही रामनगर चला गया और स्वर परीक्षा के बाद रामनगर के महराजा ने उसे राम के रूप में चुन लिया। घर आने पर पिता से कहा कि अब आप नहीं जाने देंगे तो महाराज खुद मुझे ले जाएंगे। मैं राम बन गया हूं। यह कहानी है चंदौली के 12 वर्षीय बच्चे दीपक पांडेय की।

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यूनेस्को के विश्व धरोहर में शामिल 221 वर्ष पुरानी रामनगर की विश्वप्रसिद्ध रामलीला में इस वर्ष राम की भूमिका चंदौली के नियामताबाद विकासखंड के छोटे से गांव रंगौली के निवासी नरेंद्र पांडेय के इकलौते पुत्र दीपक पांडेय निभा रहे हैं। पिता नरेंद्र पांडेय  चंद्ररखा में एक स्कूल की बस चलाते हैं और दीपक भी उसी स्कूल में सातवीं के छात्र हैं। घर पर पत्नी आरती और दो छोटी बेटियां चांदनी और सुषमा हैं। नरेंद्र पांडेय ने बताया कि हमारे पूर्वज रामलीला के नेमी थे। मेरे पिताजी ने भी एक दिन की भी लीला नागा नहीं की। उनके बाद हमे जब कभी समय मिलता, रामलीला चला जाता था। 2022 में पुत्र दीपक को भी रामलीला का मेला दिखाने ले गया था। लेकिन एक ही दिन में रामनगर की रामलीला उसके जेहन में ऐसी बसी की फिर उसको राम बनने की धुन सवार हो गई। मेले में ही हठ करने लगा कि मुझे पता करना है कि राम कैसे बनते हैं। मैने खिलौने दिलाकर उसके फुसला दिया लेकिन घर आने के बाद भी दिन-रात वह उसी के बारे में सोचता रहा और खुद ही जानकारी की और परीक्षा देने गया। जब आकर बताया कि मेरा चयन राम के लिए हो गया है तो हमें एकबारगी विश्वास नहीं हुआ। जब किले में गए और प्रशिक्षण शुरू हुआ तो लगा जैसे भगवान की कृपा हो गई है।

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The story of the child playing the role of Ram is unique, Deepak walked 15 km to take the vocal exam.
रामनगर की रामलीला देखने पहुंचे राम का पात्र निभा रहे दीपक के पिता नरेंद्र पांडे। - फोटो : अमर उजाला
भगवान राम ने सुन ली बच्चे के दिल की आवाज

नरेंद्र पांडेय ने बताया कि हमारे पूर्वजों के कई जन्मों के पुण्य फलीभूत हुए हैं। बेटे ने मेले में जो कहा था वह उसकी हृदय की आवाज थी और शायद भगवान राम ने एक बच्चे की हृदय की बात सुन ली। नहीं तो हम कभी सपने में भी नहीं सोचे थे कि जिस राम को देखने के लिए हमारी पीढि़या कई किलोमीटर पैदल जाया करती थी वह राम हमारे ही घर में होंगे। बताया कि संस्कारवश दीपक ने पूजा-पाठ करना शुरू कर दिया था। जिसके वजह से उसकी संस्कृत अच्छी थी। स्वर परीक्षा में यही उसके काम आया और उसने संस्कृत के श्लोक अन्य बच्चों से शुद्ध पढ़े, जो चयन का प्रमुख कारण बना।

एक महीने से किले में दीपक के साथ रह रहीं मां आरती

रामनगर की रामलीला के सभी पात्र ब्राह्मण होते हैं। केवल रावण के सेना में अन्य जातियों के छोटे-छोटे बच्चों को शामिल किया जाता है। रामलीला के मुख्य पात्र राम, सीता, भरत, लक्ष्मण और शत्रुघ्न में हर साल परिवर्तन किया जाता है। चुनाव में सर्वप्रथम वरीयता उनके आवाज को दिया जाता है। साथ ही उनका उपनयन संस्कार होना अनिवार्य है। उनकी कमनीयता,रंग रूप का भी ध्यान रखा जाता है। चयन की प्रक्रिया दो चरणों में होती है अंतिम चरण के पांच नामों पर महाराज द्वारा स्वीकृति प्रदान की जाती है। प्रथम गणेश पूजन के साथ ही इन पात्रों का प्रशिक्षण रामनगर गंगा घाट स्थित धर्मशाला में शुरू हो जाता है। प्रशिक्षण अवधि के दौरान बालकों को सात्विक रहना पड़ता है। उनके साबुन लगाने और लहसुन,प्यास, खट्टा-मिठ्ठा खाने पर पूर्ण प्रतिबंध रहता है। दीपक के साथ उनकी मां आरती भी एक महीने से किले में रह रही हैं। पिता नरेंद्र ने बताया कि वे रोजाना लीला में जाते हैं, आरती के बाद पुत्र से मिलकर घर चले आते हैं।

प्रशिक्षण के दौरान भी पूरा अनुशासन, नाम से नहीं बुलाया जाता

रामलीला के पात्रों के प्रशिक्षण के दौरान अनुशासन और रामादि की भावना और गौरव का प्रारंभ हो जाता है। पंच स्वरूपों को प्रशिक्षण के दौरान उनके नाम राम,सीता, भरत, लक्ष्मण, शत्रुघ्न ही पुकारा जाता है। पात्रों में परस्पर वैसा व्यवहार भी प्रारंभ हो जाता है। श्रीराम के उठ खड़े होने पर अन्य सभी पात्र उठ खड़े होते हैं, संवाद समाप्त होने पर राम के बैठने के बाद सभी पात्र उनको प्रणाम कर वरिष्ठता के क्रम में बैठते हैं। इसमें एक खास बता यह है कि भरत बना पात्र अगले वर्ष परीक्षा के बाद राम की भूमिका निभा सकता है। शत्रुघ्न भरत का पात्र निभा सकते हैं। लेकिन राम की भूमिका निभा चुका पात्र लक्ष्मण आदि की भूमिका नहीं निभा सकता। बशर्ते वह राम की पात्रता पर खरा पाये जाने पर अगले वर्ष पुन:राम बनाया जा सकता है।
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