{"_id":"68892181e9109173560d8a4f","slug":"the-administration-took-possession-of-the-broken-statue-found-beneath-the-religious-place-chandauli-news-c-189-1-svns1013-134404-2025-07-30","type":"story","status":"publish","title_hn":"Chandauli News: धार्मिक स्थल के नीचे मिली खंडित प्रतिमा को प्रशासन ने कब्जे में लिया","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
Chandauli News: धार्मिक स्थल के नीचे मिली खंडित प्रतिमा को प्रशासन ने कब्जे में लिया
विज्ञापन
चकिया। धार्मिक स्थल के नीचे मिली पत्थर की किसी देवता की खंडित प्रतिमा को मंगलवार को प्रशासन ने कब्जे में ले लिया। वर्तमान में प्रतिमा को कोतवाली परिसर में स्थित मंदिर में रखा गया है। भाजपा विधायक कैलाश आचार्य, भाजपा जिलाध्यक्ष काशीनाथ सिंह एवं नगर पंचायत अध्यक्ष गौरव श्रीवास्तव ने कोतवाली में लाई गई प्रतिमा का अवलोकन किया।
सोमवार को धार्मिक स्थल के ठीक नीचे गढ़े शिलाखंड पर उत्कीर्ण किसी देवता की प्रतिमा मिलने का वीडियो वायरल होने से चर्चाओं का बाजार गर्म हो गया। प्रतिमा पाए जाने की सूचना को देखते हुए स्थानीय प्रशासन सक्रिय हो गया। एसडीएम विनय कुमार मिश्र और कोतवाल अर्जुन सिंह पुलिस फोर्स के साथ मौके पर पहुंचे और प्रतिमा को वहां से हटाकर कोतवाली में स्थित मंदिर में रखने का निर्देश दिया। इसके बाद गढ़े पत्थर पर उत्कीर्ण किसी देवता की भारी भरकम प्रतिमा कोतवाली ले आकर मंदिर पर रखवा दी गई। उधर, कार्यकर्ताओं की सूचना व कोतवाली के मंदिर में प्रतिमा आने की सूचना पर विधायक कैलाश आचार्य, भाजपा जिलाध्यक्ष काशीनाथ सिंह और चेयरमैन गौरव श्रीवास्तव ने कोतवाली पहुंच कर प्रतिमा का अवलोकन किया। विधायक ने कहा कि प्रतिमा हिंदू समाज की धरोहर है, जो खंडित हो गई है, लेकिन इसका निर्माण पूरा कराकर उसे धार्मिक स्थल में ही स्थापित कराया जाएगा। चकिया थानाध्यक्ष अर्जुन सिंह का कहना है कि प्रतिमा को सुरक्षा की दृष्टि से कोतवाली में रखा गया है। आगे जैसा उच्चाधिकारियों का आदेश होगा, उसका पालन किया जाएगा।
उधर, धार्मिक स्थल के नीचे सोमवार को मिली खंडित भगवान सूर्य की प्रतिमा को चकिया कोतवाली ले जाने की सूचना पर हिंदू संगठनों के नेता कोतवाली पहुंच गए और प्रतिमा को कोतवाली लाए जाने के औचित्य पर सवाल उठाने लगे। संगठनों से जुड़े भाजपा के मंडल महामंत्री सारांश केसरी, जीत मोदनवाल, शशिकांत प्रजापति, विजय वर्मा, सूरज मौर्य, हिमांशु कश्यप, संजीव विश्वकर्मा, किशन श्रीवास्तव के नेतृत्व में दर्जनों लोगों ने धार्मिक स्थल का एएसआई सर्वे कराने और प्रतिमा को लतीफशाह में ही जहां वह पाई गई है उसी स्थान पर स्थापित करने की मांग की और हंगामा मचाया। हालांकि प्रशासन पर इसका कोई असर नहीं पड़ा।
विज्ञापन
उधर,
धार्मिक स्थल के नीचे गढ़े गए पत्थर पर उत्कीर्ण प्रतिमा को काशी हिंदू विश्वविद्यालय के प्राचीन भारतीय इतिहास संस्कृति एवं पुरातत्व विभाग के असिस्टेंट प्रोफेसर स्वतंत्र सिंह ने भगवान सूर्य की प्रतिमा बताया। उन्होंने प्रतिमा उत्तर गुप्त काल के होने की भी संभावना जताई। व्हाट्सएप के माध्यम से भेजी गई फोटो के आधार पर परीक्षण के बाद डॉ. सिंह ने कहा कि जिस गढ़े शिलाखंड पर भगवान सूर्य की खंडित प्रतिमा स्थित है, वह चुनार के बलुआ पत्थर की है। जिस पर छेनी-हथौड़ी से सूर्य की प्रतिमा बनाई गई है। उन्होंने कहा कि गुप्त काल और उत्तर गुप्त काल में मंदिर निर्माण के दौरान इस तरह के स्थापत्य का प्रयोग किया जाता रहा है। जिसमें मंदिर के अष्ट दिगपाल की मूर्तियां बलुआ पत्थरों पर निर्मित होती थीं। प्राप्त प्रतिमा भी इन्हीं दिग्पालों में से एक सूर्य की प्रतिमा है। प्रतिमा के ठीक नीचे भगवान सूर्य के दंडी और लेखाकार की प्रतिमाएं इसका प्रमाण हैं। सूर्य भगवान के दोनों हाथों में कमलनाल सहित कमल के पुष्प सुशोभित हैं। जैसा कि गुप्त काल के दौरान सूर्य भगवान की प्रतिमा बनाई जाती थी। उस प्रतिमा में पैर की उंगलियां छिपा दी जाती थीं। इसी से प्रतिमा के गुप्त काल या उत्तर गुप्त काल का होने के प्रमाण है। उन्होंने बताया कि गढ़े हुए पत्थर पर उत्कीर्ण प्रतिमा आठवीं शताब्दी की हो सकती है। उन्होंने कहा कि कार्बन डेटिंग के बाद ही प्रतिमा का काल निर्धारित हो सकता है।
विज्ञापन
सोमवार को धार्मिक स्थल के ठीक नीचे गढ़े शिलाखंड पर उत्कीर्ण किसी देवता की प्रतिमा मिलने का वीडियो वायरल होने से चर्चाओं का बाजार गर्म हो गया। प्रतिमा पाए जाने की सूचना को देखते हुए स्थानीय प्रशासन सक्रिय हो गया। एसडीएम विनय कुमार मिश्र और कोतवाल अर्जुन सिंह पुलिस फोर्स के साथ मौके पर पहुंचे और प्रतिमा को वहां से हटाकर कोतवाली में स्थित मंदिर में रखने का निर्देश दिया। इसके बाद गढ़े पत्थर पर उत्कीर्ण किसी देवता की भारी भरकम प्रतिमा कोतवाली ले आकर मंदिर पर रखवा दी गई। उधर, कार्यकर्ताओं की सूचना व कोतवाली के मंदिर में प्रतिमा आने की सूचना पर विधायक कैलाश आचार्य, भाजपा जिलाध्यक्ष काशीनाथ सिंह और चेयरमैन गौरव श्रीवास्तव ने कोतवाली पहुंच कर प्रतिमा का अवलोकन किया। विधायक ने कहा कि प्रतिमा हिंदू समाज की धरोहर है, जो खंडित हो गई है, लेकिन इसका निर्माण पूरा कराकर उसे धार्मिक स्थल में ही स्थापित कराया जाएगा। चकिया थानाध्यक्ष अर्जुन सिंह का कहना है कि प्रतिमा को सुरक्षा की दृष्टि से कोतवाली में रखा गया है। आगे जैसा उच्चाधिकारियों का आदेश होगा, उसका पालन किया जाएगा।
विज्ञापन
उधर, धार्मिक स्थल के नीचे सोमवार को मिली खंडित भगवान सूर्य की प्रतिमा को चकिया कोतवाली ले जाने की सूचना पर हिंदू संगठनों के नेता कोतवाली पहुंच गए और प्रतिमा को कोतवाली लाए जाने के औचित्य पर सवाल उठाने लगे। संगठनों से जुड़े भाजपा के मंडल महामंत्री सारांश केसरी, जीत मोदनवाल, शशिकांत प्रजापति, विजय वर्मा, सूरज मौर्य, हिमांशु कश्यप, संजीव विश्वकर्मा, किशन श्रीवास्तव के नेतृत्व में दर्जनों लोगों ने धार्मिक स्थल का एएसआई सर्वे कराने और प्रतिमा को लतीफशाह में ही जहां वह पाई गई है उसी स्थान पर स्थापित करने की मांग की और हंगामा मचाया। हालांकि प्रशासन पर इसका कोई असर नहीं पड़ा।
विज्ञापन
उधर,
धार्मिक स्थल के नीचे गढ़े गए पत्थर पर उत्कीर्ण प्रतिमा को काशी हिंदू विश्वविद्यालय के प्राचीन भारतीय इतिहास संस्कृति एवं पुरातत्व विभाग के असिस्टेंट प्रोफेसर स्वतंत्र सिंह ने भगवान सूर्य की प्रतिमा बताया। उन्होंने प्रतिमा उत्तर गुप्त काल के होने की भी संभावना जताई। व्हाट्सएप के माध्यम से भेजी गई फोटो के आधार पर परीक्षण के बाद डॉ. सिंह ने कहा कि जिस गढ़े शिलाखंड पर भगवान सूर्य की खंडित प्रतिमा स्थित है, वह चुनार के बलुआ पत्थर की है। जिस पर छेनी-हथौड़ी से सूर्य की प्रतिमा बनाई गई है। उन्होंने कहा कि गुप्त काल और उत्तर गुप्त काल में मंदिर निर्माण के दौरान इस तरह के स्थापत्य का प्रयोग किया जाता रहा है। जिसमें मंदिर के अष्ट दिगपाल की मूर्तियां बलुआ पत्थरों पर निर्मित होती थीं। प्राप्त प्रतिमा भी इन्हीं दिग्पालों में से एक सूर्य की प्रतिमा है। प्रतिमा के ठीक नीचे भगवान सूर्य के दंडी और लेखाकार की प्रतिमाएं इसका प्रमाण हैं। सूर्य भगवान के दोनों हाथों में कमलनाल सहित कमल के पुष्प सुशोभित हैं। जैसा कि गुप्त काल के दौरान सूर्य भगवान की प्रतिमा बनाई जाती थी। उस प्रतिमा में पैर की उंगलियां छिपा दी जाती थीं। इसी से प्रतिमा के गुप्त काल या उत्तर गुप्त काल का होने के प्रमाण है। उन्होंने बताया कि गढ़े हुए पत्थर पर उत्कीर्ण प्रतिमा आठवीं शताब्दी की हो सकती है। उन्होंने कहा कि कार्बन डेटिंग के बाद ही प्रतिमा का काल निर्धारित हो सकता है।