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राम के नाम बिना मानव जीवन अधूरा
Updated Mon, 06 Nov 2017 12:30 AM IST
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आज के आधुनिक दौर में राम नाम के बिना जीवन अधूरा है। राम नाम लेने से मानव प्रत्येक कष्ट से छुटकारा पा सकता है। मानव को चाहिए कि वह अपनी दिनचर्या के अनुसार प्रभु श्रीराम के नाम का सुमिरन अवश्य करें। उक्त बातें मानस प्रचार समिति बौरी की ओर से आयोजित नौ दिवसीय श्रीरामकथा के अंतिम दिन शनिवार की रात वृंदावन से पधारे कथावाचक डा. पुंडरीक महाराज ने कहीं।
उन्होंने कहा कि भगवान थे, भगवान हैं और भगवान रहेंगे। भगवान में दृढ़ विश्वास हो, श्रद्धा हो और यह भावना हो कि भगवान हमारे हैं और मैं भगवान का हूं। हम रामजी के हैं और रामजी हमारे। दुनिया का कितना ही सामर्थ्यवान, बलवान, धनवान व्यक्ति क्यों न हो, वह ज्यों ही कुपंथ पर पग रखता हैं कुत्ते की भांति हो जाता है। जैसे रावण जब सीता का अपहरण किया तब उसकी गति स्वान की हो गई थी। जटायु को उपकार के बदले श्रीराम ने ऐसी गति हरिधाम की दी, जो गति राजा दशरथ को भी प्राप्त नहीं हो सकी थी। शबरी की राम राम रटते उम्र बीत चुकी थी। शबरी ने सच्चे गुरु की बातों पर विश्वास कर दस हजार वर्ष बिताया। उसे भगवान श्रीराम ने नवधा भक्ति दी। उसे भगवद धाम दिया। श्रीराम का चरित्र जीवन पथ के लिए पाथ्ये है। श्रीराम ने मनुष्य रूप में संघर्ष करते हुए आतंक का समूल नष्ट कर दिया। ब्राह्मणों ने वेद मंत्र पाठ किया। देवताओं ने ध्वनि के साथ पुष्प वर्ष की। वशिष्ठ ने सर्वप्रथम तिलक किया। श्रीराम अवध के राजा वन राजा राम राम बन गए। तीनों लोक में किसी को किसी प्रकार का शोक नहीं रहा। राम के प्रताप से विषमता समाप्त हो गई। इस दौरान समिति के अध्यक्ष हरवंश सिंह, रामदास जी, वीरेंद्र नाथ सिंह आदि मौजूद रहे।
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उन्होंने कहा कि भगवान थे, भगवान हैं और भगवान रहेंगे। भगवान में दृढ़ विश्वास हो, श्रद्धा हो और यह भावना हो कि भगवान हमारे हैं और मैं भगवान का हूं। हम रामजी के हैं और रामजी हमारे। दुनिया का कितना ही सामर्थ्यवान, बलवान, धनवान व्यक्ति क्यों न हो, वह ज्यों ही कुपंथ पर पग रखता हैं कुत्ते की भांति हो जाता है। जैसे रावण जब सीता का अपहरण किया तब उसकी गति स्वान की हो गई थी। जटायु को उपकार के बदले श्रीराम ने ऐसी गति हरिधाम की दी, जो गति राजा दशरथ को भी प्राप्त नहीं हो सकी थी। शबरी की राम राम रटते उम्र बीत चुकी थी। शबरी ने सच्चे गुरु की बातों पर विश्वास कर दस हजार वर्ष बिताया। उसे भगवान श्रीराम ने नवधा भक्ति दी। उसे भगवद धाम दिया। श्रीराम का चरित्र जीवन पथ के लिए पाथ्ये है। श्रीराम ने मनुष्य रूप में संघर्ष करते हुए आतंक का समूल नष्ट कर दिया। ब्राह्मणों ने वेद मंत्र पाठ किया। देवताओं ने ध्वनि के साथ पुष्प वर्ष की। वशिष्ठ ने सर्वप्रथम तिलक किया। श्रीराम अवध के राजा वन राजा राम राम बन गए। तीनों लोक में किसी को किसी प्रकार का शोक नहीं रहा। राम के प्रताप से विषमता समाप्त हो गई। इस दौरान समिति के अध्यक्ष हरवंश सिंह, रामदास जी, वीरेंद्र नाथ सिंह आदि मौजूद रहे।
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