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धान की खेती में दक्षिण भारतीय प्रजातियों का दबदबा

Wed, 28 Jun 2017 01:07 AM IST
Updated Wed, 28 Jun 2017 01:07 AM IST
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धान की खेती में दक्षिण भारतीय प्रजातियों का दबदबा
चकिया। जिले में हाइब्रिड, रिसर्च एवं लोकल प्रजातियों की मौजूदगी धान की नर्सरियों में लगातार घटती जा रही है। आजकल किसानों का विश्वास धान की साउथ इंडियन प्रजातियों पर बढ़ा है। इसके पीछे बांधों, एनपीसी तथा लिफ्ट केनालों से पर्याप्त पानी मिलने की उम्मीद प्रमुख कारण है।
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हरित क्रांति के दौर में जिले में साउथ इंडियन धान की प्रजातियों ने प्रवेश किया था। तब से लेकर आज तक इन प्रजातियों की विश्वसनीयता लगातार बढ़ी है। इन प्रजातियों में एनटीयू 7029, डीपीटी 5204, मोती 360, मोती गोल्ड, निर्मल 212, अमन, आद्रा तथा 501 प्रजातियां किसानों की पहली पसन्द हैं। धान की नर्सरी में इन प्रजातियों का दबदबा इसी से साबित होता है कि बीज की दुकानों पर इन प्रजातियों की कमी हो गई है। इन प्रजातियों में सुवर्णा मंसूरी एमटीयू 7029 तथा डीपीटी 5204 की सर्वाधिक डिमांड है। इन प्रजातियों ने धान के कटोरे में रिकार्ड उत्पादन दिया है। यहां पिछले मानसून सत्र में अच्छी बरसात होने से क्षेत्र के बांधों, नरायनपुर पंप केनाल सहित अनेक पंप केनालों एवं लिफ्ट केनालों से पर्याप्त पानी मिलने की उम्मीद से किसान उत्साहित हैं। इसीलिए लंबी अवधि में तैयार होने के बावजूद किसान इन प्रजातियों पर भरोसा कर रहे हैं। बीएचयू कृषि विज्ञान संस्थान के चावल वैज्ञानिक प्रोफेसर आरपी सिंह कहते हैं कि जिले में हरित क्रांति के दौरान आई दक्षिण भारतीय प्रजातियों ने उत्पादन के नये कीर्तिमान स्थापित किये हैं। इसलिए ये प्रजातियां आज भी किसानों की पहली पसन्द बनी हैं।
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इनसेट
एक सौ चार दिन में तैयार होगी फसल
चकिया। बीएचयू कृषि विज्ञान संस्थान के वैज्ञानिकों द्वारा विकसित धान की एचयूआर 1304 नामक प्रजाति एक सौ चार दिन में ही तैयार होगी। जिससे सब्जियों एवं दहलन तिलहन की खेती करने वाले किसानों को फायदा मिलेगा। यहां के लिए इस वर्ष बीएचयू ने इस प्रजाति को उतारा है। बीएचयू कृषि विज्ञान संस्थान के पूर्व निदेशक चावल वैज्ञानिक प्रोफेसर आरपी सिंह ने बताया कि कम अवधि में अधिक उत्पादन देने वाली यह प्रजाति यहां के लिए अत्यन्त कारगर है। उन्होंने कहा कि यह प्रजाति रोग मुक्त है तथा कम अवधि की अन्य प्रजातियों की अपेक्षा अधिक उत्पादन देने में सक्षम है। उन्होंने कहा कि इस प्रजाति की खेती करके किसान त्रिफसली खेती की ओर अग्रसर हो सकेंगे। चन्द्रप्रभा कृषि विकास समिति के अध्यक्ष संतराम पांडेय ने बताया कि यह प्रजाति किसानों को अग्रिम प्रक्षेत्र प्रदर्शन के तहत खेती करने के लिए दी गई है।
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