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किसान आंदोलन के बहाने सियासी जमीन तलाश रहे दल
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किसान बाहुल्य जनपद से काफी संख्या में रोजाना किसान दिल्ली बॉर्डर पर चल रहे धरने में सम्मिलित हो रहे हैं। ऐसे में जनपद में अपना जनाधार खो रहे राजनीतिक दल भी इस किसान आंदोलन में प्रत्यक्ष रूप से शामिल होकर अपना खोया जनाधार पाने की राह तलाश रहे हैं। गत कई चुनावों में अपना हश्र देखने के बाद सपा, रालोद और कांग्रेस के पदाधिकारी और कार्यकर्ता लगातार किसान आंदोलन में अपनी उपस्थिति दर्ज करा रहे हैं।
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गौरतलब है कि भौगोलिक दृष्टिकोण से जनपद कृषि बाहुल्य क्षेत्र है। यहां पर कुल 4 लाख 36 हजार हेक्टेयर भूमि है। जिसमें से 3 लाख 75 हजार हेक्टेयर भूमि कृषि क्षेत्र में दर्ज है। जनपद से भाकि यू समेत अन्य किसान संगठन दिल्ली बॉर्डर पर चल रहे आंदोलन में प्रतिभाग कर रहे हैं। रोजाना सैकड़ों की संख्या में किसान संगठन के लोग आंदोलन में भाग लेने पहुंच रहे हैं। खास बात यह है कि इस किसान आंदोलन में जनपद के राजनीतिक दल भी अपना सियासी भविष्य संवारने में जुटे हुए हैं।
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दल के नेता केंद्र सरकार पर ठीकरा फोड़ते और विभिन्न जुमलेबाजी भी करते नजर आ रहे हैं। यही नहीं बीते दिनों सपा ने किसानों के आंदोलन में बढ़ चढ़कर हिस्सा लिया है। सपा ने 26 जनवरी को जनपद में विभिन्न स्थानों पर ट्रैक्टर रैली निकाली थी। जबकि, रालोद ने भी समर्थन करते हुए रैली का आयोजन किया और रालोद के जिलाध्यक्ष और स्याना के पूर्व विधायक समेत काफी संख्या में कार्यकर्ता किसानों को समर्थन देने दिल्ली बॉर्डर पहुंचे। इसके अलावा कांग्रेस के पदाधिकारी शुरूआत से ही किसान आंदोलन में चक्का जाम से लेकर सड़क पर जाम लगाने तक किसानों के साथ नजर आए और सरकार को घेरने की कोई कोर कसर बाकी नहीं छोड़ी।
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यह आंकड़े दलों की दर्शा रहे मजबूरी
इन दलों के बीते कुछ चुनावों के आंकड़ें देखे जाएं तो वह चौंकाने वाले रहे हैं। खासतौर पर लोकसभा चुनाव 2014 में कांग्रेस ने रालोद के साथ गठबंधन कर चुनाव लड़ा था, जिसमें उनकी प्रत्याशी अंजू मुस्कान को कुल 59,116 मत हासिल हुए थे और उनकी जमानत भी जब्त हो गई थी। जबकि, सपा के प्रत्याशी कमलेश वाल्मीकि को 1,28,737 मत हासिल हुए थे। इसके अलावा गत लोकसभा चुनाव 2019 में इन दलों का आंकड़ा और भी चौंकाने वाला है, कांग्रेस प्रत्याशी 19 के लोकसभा चुनाव में मात्र 29,465 मताें पर ही सिमट गए थे। जबकि, सपा ने बसपा के साथ गठबंधन कर लिया था और प्रत्याशी योगेश वर्मा टक्कर में रहे। उन्हें 3,91,264 मत हासिल हुए थे। रालोद ने इस चुनाव में प्रत्याशी को मैदान में नहीं उतारा था।
इसके अलावा वर्ष 2017 में सदर विधानसभा सीट पर हुए चुनाव में भी इन दलों की स्थिति अच्छी नहीं रही थी। उस दौरान सपा ने कांग्रेस के साथ चुनाव लड़ते हुए शुजात आलम को मैदान में उतारा और मात्र 24,030 मतों में सिमट गए। रालोद के प्रत्याशी भगवान शर्मा उर्फ गुड्डू पंडित ने 17,077 मत हासिल किए किए थे। इस चुनाव में भी अधिकतर प्रत्याशियों की जमानत जब्त हुई थी। जबकि, गत वर्ष 2020 में सदर सीट पर हुए विधानसभा उपचुनाव में भी ये दल कोई खास मत हासिल नहीं कर पाए थे। कांग्रेस के सुशील चौधरी ने 10,319 और सपा-रालोद गठबंधन के प्रवीण कुमार ने मात्र 7286 मत हासिल किए थे।
समाजवादी पार्टी हमेशा से गरीब और किसानों की हिमायती रही है। किसान आंदोलन के साथ ही इस काले कानून के लागू होने के पहले दिन से ही सपा इसका विरोध करती रही है। हम अभी भी किसान चौपाल, ट्रैक्टर रैली आदि के माध्यम से लगातार किसानों के समर्थन में खड़े हुए हैं।
अमजद अली गुड्डू, जिलाध्यक्ष सपा
किसान आंदोलन को हमारी पार्टी पूरा समर्थन कर रही है। भाजपा सरकार जब से सत्ता में आई है, वह उद्योगपतियों की साइड में रही है। यह कृषि कानून लाकर भी भाजपा ने किसानों की नहीं उद्योगपतियों के बारे में ही सेाचा है। कांग्रेस के कार्यकर्ता और पदाधिकारी किसानों की आवाज हमेशा उठाते रहेंगे।
टुक्कीमल खटीक, जिलाध्यक्ष कांग्रेस
किसानों के मसीहा चौधरी चरण सिंह की बनाई पार्टी किसानों की ही पार्टी है। जब-जब किसानों पर कोई संकट आदि आता है तो रालोद उनकी आवाज उठाने में हमेशा आगे रहती है। इस समय भी हमारे नेता चौधरी अजित सिंह ने किसानों के पक्ष में खड़े रहने का निर्देश दिया है।
अरुण चौधरी, जिलाध्यक्ष रालोद