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इम्पीरियल हॉर्स शो से शुरू हुआ था बुलंदशहर महोत्सव का सफर
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इम्पीरियल हॉर्स शो से शुरू हुआ था बुलंदशहर महोत्सव का सफर
बुलंदशहर। 12 मार्च से शुरू हुई जिला कृषि औद्योगिक एवं सांस्कृतिक प्रदर्शनी (बुलंदशहर महोत्सव) के सफर को 139 साल पूरे हो गए। इतने लंबे सफर में बुलंदशहर महोत्सव ने साल दर साल विकास और आधुनिकता के नए सोपान गढ़े हैं। दस्तावेजों के अनुसार, 1881 में अंग्रेज कलेक्टर मिस्टर किलार्क ने घोड़ाें की प्रदर्शनी का आयोजन किया था, जिसे ‘इम्पीरियल हॉर्स शो’ नाम दिया गया। 1955 में इसका नाम जिला कृषि औद्योगिक एवं सांस्कृतिक प्रदर्शनी कर दिया और वर्ष 2020 में इसे बदलकर बुलंदशहर महोत्सव कर दिया।
सन् 1857 के गदर के बाद ईस्ट इंडिया कंपनी के हाथ से शासन की कमान ब्रिटिश पार्लियामेंट ने ले ली थी, इसके बाद बुलंदशहर में भी गतिविधियां तेज हो गईं, जिस स्थान पर आज प्रदर्शनी लगती है, वहां पर घोड़ों की प्रदर्शनी लगने का जिक्र मिलता है। यह जगह घोड़ों की प्रदर्शनी के लिए मुफीद थी। वहीं, ब्रिटिश शासनकाल में अंग्रेज प्रशासक अपने मनोरंजन के लिए घुड़दौड़ और पोलो आदि खेलों का आयोजन करते थे। इसके लिए अच्छी नस्ल के लिए घोड़ों की आवश्यकता पड़ने पर प्रतिवर्ष घोड़ों का बाजार लगता था। माना जाता है कि आधुनिक जिला प्रदर्शनी की बुनियाद तभी से पड़ी। वर्तमान में इस प्रदर्शनी को बुलंदशहर महोत्सव के नाम से जाना जाता है। प्रदर्शनी के वरिष्ठ सदस्य मुकुल शर्मा ने बताया कि प्रदर्शनी की नींव वर्ष 1881 ई. में तत्कालीन अंग्रेज कलेक्टर मिस्टर किलार्क ने घोड़ो की प्रदर्शनी का आयोजन कर किया। जिसके बाद बाजार लगने लगा और वर्ष 1881 से 1926 तक प्रदर्शनी ‘इम्पीरियल हॉर्स शो’ के नाम से जानी जाती रही। बाद में इसका नाम जिला प्रदर्शनी एवं हॉर्स शो कर दिया गया। इस दौरान बारिश होने पर कार्यक्रम में परेशानी न हो, इसके लिए वर्ष 1936 में बैरन हॉल का निर्माण कराया गया। वर्ष 1955 में इसका नाम जिला कृषि औद्योगिक एवं सांस्कृतिक प्रदर्शनी कर दिया गया। जिला प्रदर्शनी में सांस्कृतिक कार्यक्रम के लिए स्थान का अभाव होने पर वर्ष 1958 में तत्कालीन डीएम एसएन महरोत्रा द्वारा ऑडिटोरियम का निर्माण कराया गया। इसके बाद से प्रदर्शनी पंडाल का तीन बार पुन: निर्माण कराकर बड़े आकार में बदल दिया गया है। 2020 में डीएम रविंद्र कुमार ने जिला कृषि औद्योगिक एवं सांस्कृतिक प्रदर्शनी के नाम को बुलंदशहर महोत्सव कर दिया।
प्रदर्शनी के सफर के कुछ अहम मुकाम
1936 में कार्यक्रम कराने के लिए बैरनहॉल का निर्माण कराया गया। इसके बाद कार्यक्रम इसी हॉल में होने लगे। वहीं, बैरनहॉल के निकट फुलवारी लगाई गई, जिससे प्रदर्शनी की सुंदरता अलग नजर आती है। वर्ष 1955 से प्रदर्शनी का रूप बदल दिया गया और घुड़दौड़ बंद कर दी गई। वर्तमान में घुड़दौड़ वाले स्थान पर आवास बन चुके हैं। ऑडीटोरियम को वर्तमान में रविंद्र नाट्यशाला के नाम से जाना जाता है, जिसमें बड़े कार्यक्रम के साथ समय-समय पर शासन की योजनाओं को लेकर कार्यक्रम आयोजित होते रहते हैं।
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बुलंदशहर। 12 मार्च से शुरू हुई जिला कृषि औद्योगिक एवं सांस्कृतिक प्रदर्शनी (बुलंदशहर महोत्सव) के सफर को 139 साल पूरे हो गए। इतने लंबे सफर में बुलंदशहर महोत्सव ने साल दर साल विकास और आधुनिकता के नए सोपान गढ़े हैं। दस्तावेजों के अनुसार, 1881 में अंग्रेज कलेक्टर मिस्टर किलार्क ने घोड़ाें की प्रदर्शनी का आयोजन किया था, जिसे ‘इम्पीरियल हॉर्स शो’ नाम दिया गया। 1955 में इसका नाम जिला कृषि औद्योगिक एवं सांस्कृतिक प्रदर्शनी कर दिया और वर्ष 2020 में इसे बदलकर बुलंदशहर महोत्सव कर दिया।
सन् 1857 के गदर के बाद ईस्ट इंडिया कंपनी के हाथ से शासन की कमान ब्रिटिश पार्लियामेंट ने ले ली थी, इसके बाद बुलंदशहर में भी गतिविधियां तेज हो गईं, जिस स्थान पर आज प्रदर्शनी लगती है, वहां पर घोड़ों की प्रदर्शनी लगने का जिक्र मिलता है। यह जगह घोड़ों की प्रदर्शनी के लिए मुफीद थी। वहीं, ब्रिटिश शासनकाल में अंग्रेज प्रशासक अपने मनोरंजन के लिए घुड़दौड़ और पोलो आदि खेलों का आयोजन करते थे। इसके लिए अच्छी नस्ल के लिए घोड़ों की आवश्यकता पड़ने पर प्रतिवर्ष घोड़ों का बाजार लगता था। माना जाता है कि आधुनिक जिला प्रदर्शनी की बुनियाद तभी से पड़ी। वर्तमान में इस प्रदर्शनी को बुलंदशहर महोत्सव के नाम से जाना जाता है। प्रदर्शनी के वरिष्ठ सदस्य मुकुल शर्मा ने बताया कि प्रदर्शनी की नींव वर्ष 1881 ई. में तत्कालीन अंग्रेज कलेक्टर मिस्टर किलार्क ने घोड़ो की प्रदर्शनी का आयोजन कर किया। जिसके बाद बाजार लगने लगा और वर्ष 1881 से 1926 तक प्रदर्शनी ‘इम्पीरियल हॉर्स शो’ के नाम से जानी जाती रही। बाद में इसका नाम जिला प्रदर्शनी एवं हॉर्स शो कर दिया गया। इस दौरान बारिश होने पर कार्यक्रम में परेशानी न हो, इसके लिए वर्ष 1936 में बैरन हॉल का निर्माण कराया गया। वर्ष 1955 में इसका नाम जिला कृषि औद्योगिक एवं सांस्कृतिक प्रदर्शनी कर दिया गया। जिला प्रदर्शनी में सांस्कृतिक कार्यक्रम के लिए स्थान का अभाव होने पर वर्ष 1958 में तत्कालीन डीएम एसएन महरोत्रा द्वारा ऑडिटोरियम का निर्माण कराया गया। इसके बाद से प्रदर्शनी पंडाल का तीन बार पुन: निर्माण कराकर बड़े आकार में बदल दिया गया है। 2020 में डीएम रविंद्र कुमार ने जिला कृषि औद्योगिक एवं सांस्कृतिक प्रदर्शनी के नाम को बुलंदशहर महोत्सव कर दिया।
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प्रदर्शनी के सफर के कुछ अहम मुकाम
1936 में कार्यक्रम कराने के लिए बैरनहॉल का निर्माण कराया गया। इसके बाद कार्यक्रम इसी हॉल में होने लगे। वहीं, बैरनहॉल के निकट फुलवारी लगाई गई, जिससे प्रदर्शनी की सुंदरता अलग नजर आती है। वर्ष 1955 से प्रदर्शनी का रूप बदल दिया गया और घुड़दौड़ बंद कर दी गई। वर्तमान में घुड़दौड़ वाले स्थान पर आवास बन चुके हैं। ऑडीटोरियम को वर्तमान में रविंद्र नाट्यशाला के नाम से जाना जाता है, जिसमें बड़े कार्यक्रम के साथ समय-समय पर शासन की योजनाओं को लेकर कार्यक्रम आयोजित होते रहते हैं।
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