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छोटी काशी : तीर्थ स्थल का मिले तमगा और बेरोजगारों को रोजगार
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छोटी काशी : तीर्थ स्थल का मिले तमगा और बेरोजगारों को रोजगार
अनूपशहर। महाभारत काल में बलभद्र नगर नाम से मशहूर अनूपशहर नगरी का इतिहास पौराणिक है। गंगा किनारे बसी इस नगरी को छोटी काशी का भी नाम दिया गया है लेकिन आज विधानसभा क्षेत्र अनूपशहर अपनी उपेक्षा के कारण विकास की दौड़ में बहुत पीछे नजर आता है। 18वीं विधानसभा के चुनाव की तैयारी कर रहे यहां के लोग 70 साल से अनूपशहर को तीर्थ नगरी घोषित किए जाने की मांग कर रहे हैं लेकिन यहां से विधायक बन कर विधानसभा पहुंचे जनप्रतिनिधि केवल मुद्दा ही उठा पाते हैं, इसे तीर्थनगरी की उपाधि अभी तक नहीं दिलवाई जा सकी है। विकास की राह से दूर अनूपशहर की जनता आज भी बेरोजगारी की मार झेल रही है। मतदाता ऐसे जनप्रतिनिधि को चुनना चाहते हैं जो उनकी मांगो को पूरा कर सके।
1952 से ही उठ रहा मुद्दा
वर्ष 1952 में पहली विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के प्रत्याशी ने यहां से जीत हासिल की थी। तभी से यहां के लोग अनूपशहर को तीर्थनगरी बनाए जाने की मांग करते रहे हैं। रविवार का बबस्टर गंज पर जब संजीव कुमार से चर्चा की गई तो उन्होंने बताया कि उनके दादा बताया करते थे कि अनूपशहर महाभारत काल से ही बसा हुआ है। पावन तपोस्थली होने के कारण महात्मा संतों की प्रिय नगरी रहा है। अहार क्षेत्र में श्रीकृष्ण और रुक्मिणी से जुड़ी कथाएं भी प्रचलित हैं। महाभारत कालीन एक किले के अवशेष भी अवंतिका देवी मंदिर के पास मौजूद मिले थे। मंदिर का भी वैष्णव समाज से पुराना नाता है। यही वजहें थीं कि विधानसभा क्षेत्र अनूपशहर को तीर्थनगरी बनाए जाने और उसके अनुरूप विकास होने की मांग वर्ष 1952 से ही क्षेत्रवासी करते रहे हैं। वहीं, अब भी उनका कहना है क्षेत्र की जनता ऐसे ही नेता को चुनना चाहती है जो अनूपशहर को तीर्थनगरी का दर्जा दिला सके।
बेरोजगारी मुद्दा, पलायन कर रहे हैं युवा
नगर निवासी व्यवसायी भुवनेश और विकास गर्ग ने बताया कि अनूपशहर गन्ना, गेहूं और दूध का मुख्य उत्पादक क्षेत्र है। यही नहीं राजधानी से सटा होने पर भी यहां के युवा रोजगार से वंचित हैं। यही कारण है कि यहां शिक्षा का उच्च स्तर मिलने के बावजूद उन्हें नौकरी के लिए दूर दराज राज्यों और शहरों में पलायन करना पड़ रहा है। क्षेत्र में पर्याप्त जमीन व सस्ता मानव श्रम और कच्चे माल की उपलब्धता के बाद भी किसी भी सरकार ने यहां कभी उद्योग धंधे स्थापित करने के बारे में विचार नहीं किया। करीब तीस वर्ष पूर्व सहकारी नगर में स्थापित सूत मिल को भी बंद कर दिया गया था और करीब एक हजार से अधिक कर्मचारियों को अनिवार्य सेवानिवृत्ति दे दी गई थी।
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गन्ना उत्पादन काफी, चीनी मिल की पेराई कम
क्षेत्र के गांव कतियावली निवासी किसान त्रिलोक चंद शर्मा ने बताया कि अनूपशहर क्षेत्र में गन्ने की पैदावार बहुतायत है। चीनी मिल भी तहसील के गांव खालौर के निकट है। लेकिन, यहां केवल साढ़े 12 हजार क्विंटल गन्ना की पेराई की ही क्षमता है। जिसे वर्षों से बढ़ाए जाने की मांग की जा रही है। विधानसभा में भी इस मुद्दे को उठाया जा चुका है, लेकिन अभी तक इसकी क्षमता 25 हजार क्विंटल प्रतिदिन नहीं की गई है। किसानों की मांग है कि नेता उनकी समस्याओं का समाधान करें।
इतिहास: ऐसे पड़ा अनूपशहर नाम
कहा जाता है कि हरिद्वार के बाद कोई नगर गंगा किनारे बसा है तो वह अनूपशहर है। अनूपशहर के इतिहास के बारे में बात करें तो मुगलकालीन शासक जहांगीर जब शिकार करने जंगलों में गया था, तो उसे एक शेर ने घेर लिया था और जैसे ही शेर जहांगीर पर हमला करने वाला था कि अचानक अनूप राय नाम का एक सैनिक राजा के सामने आ गया और उसने शेर से राजा जहांगीर को बचाया। जहांगीर अनूप की वीरता से प्रभावित हुआ और उसको आसपास के गांव दे दिए, जिसके बाद अनूप के नाम पर अनूपशहर का नाम पड़ा।
क्षेत्र में रोजगार धंधों को लेकर जनप्रतिनिधियों का उपेक्षा का ही भाव है। जिसके चलते नये रोजगारों का सृजन नहीं हुआ है। सूत मिल को चालू किया जाना चाहिए। चीनी मिल की क्षमता का विस्तार हो जिससे किसान सूदूर स्थानों पर जाने के लिये मजबूर न हो। - प्रमोद भगत, किसान
अहार व अनूपशहर महाभारत कालीन क्षेत्र है। जहां अनेकों मंदिर व ऐतिहासिक स्थान स्थित हैं। पावन गंगा का तट होने के बाद भी शासन स्तर से गंगाघाटों का जीर्णोद्धार तथा श्रद्धालुओं के ठहरने का समुचित प्रबंध न होने की वजह से यह क्षेत्र उपेक्षा का शिकार है। इस क्षेत्र को तीर्थ व पर्यटन नगरी घोषित किया जाना चाहिए। - भूवनेश वार्ष्णेय, कार्यकर्ता, श्रीगंगा सेवा समिति
नरौरा परमाणु बिजलीघर से अनूपशहर, बुलंदशहर, सिकंदराबाद होते हुए देश की राजधानी दिल्ली को यदि रेल लाइन से जोड़ दिया जाए तो गन्ना व दूध के उत्पादक इस क्षेत्र में रोजगार पैदा होगा तथा आवागमन भी सुगम हो जायेगा। साथ ही क्षेत्र के विकास में भी वृद्धि होगी। - श्याम रस्तोगी, विकास संघर्ष मंच
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अनूपशहर। महाभारत काल में बलभद्र नगर नाम से मशहूर अनूपशहर नगरी का इतिहास पौराणिक है। गंगा किनारे बसी इस नगरी को छोटी काशी का भी नाम दिया गया है लेकिन आज विधानसभा क्षेत्र अनूपशहर अपनी उपेक्षा के कारण विकास की दौड़ में बहुत पीछे नजर आता है। 18वीं विधानसभा के चुनाव की तैयारी कर रहे यहां के लोग 70 साल से अनूपशहर को तीर्थ नगरी घोषित किए जाने की मांग कर रहे हैं लेकिन यहां से विधायक बन कर विधानसभा पहुंचे जनप्रतिनिधि केवल मुद्दा ही उठा पाते हैं, इसे तीर्थनगरी की उपाधि अभी तक नहीं दिलवाई जा सकी है। विकास की राह से दूर अनूपशहर की जनता आज भी बेरोजगारी की मार झेल रही है। मतदाता ऐसे जनप्रतिनिधि को चुनना चाहते हैं जो उनकी मांगो को पूरा कर सके।
1952 से ही उठ रहा मुद्दा
वर्ष 1952 में पहली विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के प्रत्याशी ने यहां से जीत हासिल की थी। तभी से यहां के लोग अनूपशहर को तीर्थनगरी बनाए जाने की मांग करते रहे हैं। रविवार का बबस्टर गंज पर जब संजीव कुमार से चर्चा की गई तो उन्होंने बताया कि उनके दादा बताया करते थे कि अनूपशहर महाभारत काल से ही बसा हुआ है। पावन तपोस्थली होने के कारण महात्मा संतों की प्रिय नगरी रहा है। अहार क्षेत्र में श्रीकृष्ण और रुक्मिणी से जुड़ी कथाएं भी प्रचलित हैं। महाभारत कालीन एक किले के अवशेष भी अवंतिका देवी मंदिर के पास मौजूद मिले थे। मंदिर का भी वैष्णव समाज से पुराना नाता है। यही वजहें थीं कि विधानसभा क्षेत्र अनूपशहर को तीर्थनगरी बनाए जाने और उसके अनुरूप विकास होने की मांग वर्ष 1952 से ही क्षेत्रवासी करते रहे हैं। वहीं, अब भी उनका कहना है क्षेत्र की जनता ऐसे ही नेता को चुनना चाहती है जो अनूपशहर को तीर्थनगरी का दर्जा दिला सके।
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बेरोजगारी मुद्दा, पलायन कर रहे हैं युवा
नगर निवासी व्यवसायी भुवनेश और विकास गर्ग ने बताया कि अनूपशहर गन्ना, गेहूं और दूध का मुख्य उत्पादक क्षेत्र है। यही नहीं राजधानी से सटा होने पर भी यहां के युवा रोजगार से वंचित हैं। यही कारण है कि यहां शिक्षा का उच्च स्तर मिलने के बावजूद उन्हें नौकरी के लिए दूर दराज राज्यों और शहरों में पलायन करना पड़ रहा है। क्षेत्र में पर्याप्त जमीन व सस्ता मानव श्रम और कच्चे माल की उपलब्धता के बाद भी किसी भी सरकार ने यहां कभी उद्योग धंधे स्थापित करने के बारे में विचार नहीं किया। करीब तीस वर्ष पूर्व सहकारी नगर में स्थापित सूत मिल को भी बंद कर दिया गया था और करीब एक हजार से अधिक कर्मचारियों को अनिवार्य सेवानिवृत्ति दे दी गई थी।
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गन्ना उत्पादन काफी, चीनी मिल की पेराई कम
क्षेत्र के गांव कतियावली निवासी किसान त्रिलोक चंद शर्मा ने बताया कि अनूपशहर क्षेत्र में गन्ने की पैदावार बहुतायत है। चीनी मिल भी तहसील के गांव खालौर के निकट है। लेकिन, यहां केवल साढ़े 12 हजार क्विंटल गन्ना की पेराई की ही क्षमता है। जिसे वर्षों से बढ़ाए जाने की मांग की जा रही है। विधानसभा में भी इस मुद्दे को उठाया जा चुका है, लेकिन अभी तक इसकी क्षमता 25 हजार क्विंटल प्रतिदिन नहीं की गई है। किसानों की मांग है कि नेता उनकी समस्याओं का समाधान करें।
इतिहास: ऐसे पड़ा अनूपशहर नाम
कहा जाता है कि हरिद्वार के बाद कोई नगर गंगा किनारे बसा है तो वह अनूपशहर है। अनूपशहर के इतिहास के बारे में बात करें तो मुगलकालीन शासक जहांगीर जब शिकार करने जंगलों में गया था, तो उसे एक शेर ने घेर लिया था और जैसे ही शेर जहांगीर पर हमला करने वाला था कि अचानक अनूप राय नाम का एक सैनिक राजा के सामने आ गया और उसने शेर से राजा जहांगीर को बचाया। जहांगीर अनूप की वीरता से प्रभावित हुआ और उसको आसपास के गांव दे दिए, जिसके बाद अनूप के नाम पर अनूपशहर का नाम पड़ा।
क्षेत्र में रोजगार धंधों को लेकर जनप्रतिनिधियों का उपेक्षा का ही भाव है। जिसके चलते नये रोजगारों का सृजन नहीं हुआ है। सूत मिल को चालू किया जाना चाहिए। चीनी मिल की क्षमता का विस्तार हो जिससे किसान सूदूर स्थानों पर जाने के लिये मजबूर न हो। - प्रमोद भगत, किसान
अहार व अनूपशहर महाभारत कालीन क्षेत्र है। जहां अनेकों मंदिर व ऐतिहासिक स्थान स्थित हैं। पावन गंगा का तट होने के बाद भी शासन स्तर से गंगाघाटों का जीर्णोद्धार तथा श्रद्धालुओं के ठहरने का समुचित प्रबंध न होने की वजह से यह क्षेत्र उपेक्षा का शिकार है। इस क्षेत्र को तीर्थ व पर्यटन नगरी घोषित किया जाना चाहिए। - भूवनेश वार्ष्णेय, कार्यकर्ता, श्रीगंगा सेवा समिति
नरौरा परमाणु बिजलीघर से अनूपशहर, बुलंदशहर, सिकंदराबाद होते हुए देश की राजधानी दिल्ली को यदि रेल लाइन से जोड़ दिया जाए तो गन्ना व दूध के उत्पादक इस क्षेत्र में रोजगार पैदा होगा तथा आवागमन भी सुगम हो जायेगा। साथ ही क्षेत्र के विकास में भी वृद्धि होगी। - श्याम रस्तोगी, विकास संघर्ष मंच