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...मां कभी सर पे खुली छत नहीं रहने देगी
Updated Sat, 12 May 2018 11:33 PM IST
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...मां कभी सर पे खुली छत नहीं रहने देगी
-विपरीत परिस्थितियों में भी नहीं हारी मां, बच्चों को को पहुंचाया मुकाम पर
फोटो
मातृ दिवस पर विशेष....
अमर उजाला ब्यूरो
बुलंदशहर। ‘कुछ नहीं होगा तो आंचल में छुपा लेगी मुझे, मां कभी सर पे खुली छत नहीं रहने देगी।’ मशहूर शायर मुनव्वर राना की ये पंक्तियां उन माताओं के लिए सटीक बैठती हैं, जिन्होंने अपनी जिंदगी में संघर्ष करते हुए अपने बच्चों को मुकाम तक पहुंचाया। विपरीत परिस्थितियों में परिवार के लालन पालन के लिए अगर सबसे अधिक कोई मेहनत करता है तो वह मां है। मातृ दिवस के मौके पर अमर उजाला ने कुछ ऐसी ही माताओं के संघर्ष की दास्तां दुनिया के सामने रखने की कोशिश की है।
मां ने चाय बेचकर बेटी को बनाया टॉपर
चाय बेचकर एक मां ने अपनी बेटी को टॉपर बना दिया। हम बात कर रहे हैं राधा नगर की रहने वाली पूनम शर्मा की। उनके पति कुलदीप शर्मा का वर्ष 2010 में बीमारी के कारण देहांत हो गया था। इसके बाद परिवार आर्थिक तंगी से जूझने लगा। समाज की परवाह न करते हुए बच्चों की परवरिश के लिए पूनम ने बीएसए दफ्तर के बाहर चाय बेचनी शुरू कर दी। चाय की छोटी सी दुकान से बच्चों की परवरिश और उनकी पढ़ाई संभव नहीं थी, लेकिन पूनम ने हार नहीं मानी और अपनी मेहनत की बदौलत चाय बेचकर बेटी यशी को टॉपर बना दिया। यशी एचसीएल द्वारा संचालित विद्याज्ञान स्कूल की छात्रा है। उसने वर्ष 2017 में सीबीएसई से 10वीं की परीक्षा में 9.2 सीजीपीए अंक पाकर जिला टॉप किया था। यशी ने इस बार 12वीं की परीक्षा दी है और मां पूनम को विश्वास है कि इस बार भी बेटी जिले में टॉप करेगी।
पांच बहनों का सहारा बनीं पुष्पलता
भूड़ क्षेत्र में रहने वाली पुष्पलता माहुर एक ऐसी शख्सियत हैं, जिन्होंने अपनी पांच बहनों को मां और पिता दोनों का प्यार दिया। जिला कृषि कार्यालय में बतौर प्रधान सहायक पुष्पलता माहुर के पिता इसी विभाग में कार्यरत थे और उनकी मौत उस समय हो गई थी, जब वह शिक्षा ग्रहण कर रही थीं। पिता का साया उठते ही मां सदमे में आ गईं और उन्होंने भी साथ छोड़ दिया। इसके बाद परिवार को चलाना मुश्किल हो गया, लेकिन पुष्पलता ने हार नहीं मानी और ट्यूशन आदि कर पढ़ाई जारी रखी। कृषि विभाग में पिता के स्थान पर नौकरी हासिल की और अपनी पांच बहनों की पढ़ाया लिखाया। नौकरी लगने के बाद उन्होंने अपनी बहनों की शादी की। पुष्पलता ने खुद शादी नहीं की। आज उनका परिवार उनकी बहनें और उनके बच्चे हैं। सभी उन्हें मां और पिता का दर्जा देते हैं।
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पति की मौत के बाद हुनर आया काम, बच्चे हुए कामयाब
बुगरासी की रहने वाली रानी वर्मा के पति मित्रसेन की 1999 में एक हादसे में मौत हो गई। इसके बाद रानी के सामने दो बेटे और एक बेटी की परवरिश का संकट आ गया। रानी ने हार नहीं मानी और अपने हुनर के दम पर बच्चों को कामयाबी तक पहुंचाया। उन्होंने हाथ से कढ़ाई और सिलाई कर परिवार का पालन पोषण किया और बच्चों को अच्छी शिक्षा दिलाई। इसी मेहनत का नतीजा रहा कि आज उनका बड़ा बेटा नवीन सोनी एमकॉम और छोटा बेटा अजय सोनी बीटेक कर प्राइवेट कंपनियों में उच्च पद पर हैं। बेटी सोनिया ने भी उच्च शिक्षा हासिल की और उसकी शादी हो चुकी है। रानी वर्मा का कहना है कि यदि वह मेहनत कर हुनर का सहारा नहीं लेती तो आज अपने बच्चों की सबसे अच्छी मां नहीं बन पातीं।
बेटी को एलएलबी और बेटे को कराया एमबीए
सिकंदराबाद के मोहल्ला रिसालदारान की रहने वाली अफसरी बेगम ने विकट परिस्थितियों में ऐसा कुछ कर दिखाया, जिसकी जितनी भी तारीफ की जाए वह कम है। पति खुर्शीद अहमद की वर्ष 1998 में चुनाव ड्यूटी के दौरान हत्या हो गई थी। इसके बाद अफसरी बेगम के सामने विकट परिस्थितियां आने लगी। समाज के तानेे का डर और बच्चों की परवरिश की चिंता सताने लगी। पति ने जो प्रापर्टी छोड़ी थी उसी के किराए पर उन्होंने गुजारा करते हुए बच्चों को पाला, लेकिन कभी उन्होंने हार नहीं मानी और कड़ी मेहनत कर बड़ी बेटी उज्मा खुर्शीद को एलएलबी और बेटे फरहाज खुर्शीद को एमबीए कराया। आज दोनों उच्च पदोें पर नौकरी कर रहे हैं। जबकि छोटी बेटी अजमत खुर्शीद को बीए तक शिक्षा दिलाई।
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-विपरीत परिस्थितियों में भी नहीं हारी मां, बच्चों को को पहुंचाया मुकाम पर
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मातृ दिवस पर विशेष....
अमर उजाला ब्यूरो
बुलंदशहर। ‘कुछ नहीं होगा तो आंचल में छुपा लेगी मुझे, मां कभी सर पे खुली छत नहीं रहने देगी।’ मशहूर शायर मुनव्वर राना की ये पंक्तियां उन माताओं के लिए सटीक बैठती हैं, जिन्होंने अपनी जिंदगी में संघर्ष करते हुए अपने बच्चों को मुकाम तक पहुंचाया। विपरीत परिस्थितियों में परिवार के लालन पालन के लिए अगर सबसे अधिक कोई मेहनत करता है तो वह मां है। मातृ दिवस के मौके पर अमर उजाला ने कुछ ऐसी ही माताओं के संघर्ष की दास्तां दुनिया के सामने रखने की कोशिश की है।
मां ने चाय बेचकर बेटी को बनाया टॉपर
चाय बेचकर एक मां ने अपनी बेटी को टॉपर बना दिया। हम बात कर रहे हैं राधा नगर की रहने वाली पूनम शर्मा की। उनके पति कुलदीप शर्मा का वर्ष 2010 में बीमारी के कारण देहांत हो गया था। इसके बाद परिवार आर्थिक तंगी से जूझने लगा। समाज की परवाह न करते हुए बच्चों की परवरिश के लिए पूनम ने बीएसए दफ्तर के बाहर चाय बेचनी शुरू कर दी। चाय की छोटी सी दुकान से बच्चों की परवरिश और उनकी पढ़ाई संभव नहीं थी, लेकिन पूनम ने हार नहीं मानी और अपनी मेहनत की बदौलत चाय बेचकर बेटी यशी को टॉपर बना दिया। यशी एचसीएल द्वारा संचालित विद्याज्ञान स्कूल की छात्रा है। उसने वर्ष 2017 में सीबीएसई से 10वीं की परीक्षा में 9.2 सीजीपीए अंक पाकर जिला टॉप किया था। यशी ने इस बार 12वीं की परीक्षा दी है और मां पूनम को विश्वास है कि इस बार भी बेटी जिले में टॉप करेगी।
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पांच बहनों का सहारा बनीं पुष्पलता
भूड़ क्षेत्र में रहने वाली पुष्पलता माहुर एक ऐसी शख्सियत हैं, जिन्होंने अपनी पांच बहनों को मां और पिता दोनों का प्यार दिया। जिला कृषि कार्यालय में बतौर प्रधान सहायक पुष्पलता माहुर के पिता इसी विभाग में कार्यरत थे और उनकी मौत उस समय हो गई थी, जब वह शिक्षा ग्रहण कर रही थीं। पिता का साया उठते ही मां सदमे में आ गईं और उन्होंने भी साथ छोड़ दिया। इसके बाद परिवार को चलाना मुश्किल हो गया, लेकिन पुष्पलता ने हार नहीं मानी और ट्यूशन आदि कर पढ़ाई जारी रखी। कृषि विभाग में पिता के स्थान पर नौकरी हासिल की और अपनी पांच बहनों की पढ़ाया लिखाया। नौकरी लगने के बाद उन्होंने अपनी बहनों की शादी की। पुष्पलता ने खुद शादी नहीं की। आज उनका परिवार उनकी बहनें और उनके बच्चे हैं। सभी उन्हें मां और पिता का दर्जा देते हैं।
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पति की मौत के बाद हुनर आया काम, बच्चे हुए कामयाब
बुगरासी की रहने वाली रानी वर्मा के पति मित्रसेन की 1999 में एक हादसे में मौत हो गई। इसके बाद रानी के सामने दो बेटे और एक बेटी की परवरिश का संकट आ गया। रानी ने हार नहीं मानी और अपने हुनर के दम पर बच्चों को कामयाबी तक पहुंचाया। उन्होंने हाथ से कढ़ाई और सिलाई कर परिवार का पालन पोषण किया और बच्चों को अच्छी शिक्षा दिलाई। इसी मेहनत का नतीजा रहा कि आज उनका बड़ा बेटा नवीन सोनी एमकॉम और छोटा बेटा अजय सोनी बीटेक कर प्राइवेट कंपनियों में उच्च पद पर हैं। बेटी सोनिया ने भी उच्च शिक्षा हासिल की और उसकी शादी हो चुकी है। रानी वर्मा का कहना है कि यदि वह मेहनत कर हुनर का सहारा नहीं लेती तो आज अपने बच्चों की सबसे अच्छी मां नहीं बन पातीं।
बेटी को एलएलबी और बेटे को कराया एमबीए
सिकंदराबाद के मोहल्ला रिसालदारान की रहने वाली अफसरी बेगम ने विकट परिस्थितियों में ऐसा कुछ कर दिखाया, जिसकी जितनी भी तारीफ की जाए वह कम है। पति खुर्शीद अहमद की वर्ष 1998 में चुनाव ड्यूटी के दौरान हत्या हो गई थी। इसके बाद अफसरी बेगम के सामने विकट परिस्थितियां आने लगी। समाज के तानेे का डर और बच्चों की परवरिश की चिंता सताने लगी। पति ने जो प्रापर्टी छोड़ी थी उसी के किराए पर उन्होंने गुजारा करते हुए बच्चों को पाला, लेकिन कभी उन्होंने हार नहीं मानी और कड़ी मेहनत कर बड़ी बेटी उज्मा खुर्शीद को एलएलबी और बेटे फरहाज खुर्शीद को एमबीए कराया। आज दोनों उच्च पदोें पर नौकरी कर रहे हैं। जबकि छोटी बेटी अजमत खुर्शीद को बीए तक शिक्षा दिलाई।