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क्या फर्क पड़ता है कि छोटू बाल मजदूर है
बदायूं, ब्यूरो
Updated Sat, 11 Jun 2016 11:56 PM IST
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किसी को क्या फर्क पड़ता है जो मासूम छोटू बाल श्रमिक है। वह पढ़ाई करने और खेलने-कूदने की उम्र में जोखिम भरे काम करता है। उसकी इच्छाएं, उसकी उमंग, उसका बचपन सब कुछ गालियां खाने, झिड़कियां सुनने और काम करने में गुजरता है। उसके स्कूल जाने का, पढ़ाई करने का, टाई-बेल्ट, जूते-मोजे और नई यूनिफार्म पहनने का सपना टूटता है। साथ के बच्चों को स्कूल जाते देखकर, बच्चों के लंच बॉक्स को देखकर, खिलौनों की दुकान पर नए खिलौने देखकर उसका मन मचलता है। इससे किसी को क्या फर्क पड़ता है?
जी हां, छोटू के काम करने से किसी को कोई फर्क नहीं पड़ता है। क्यों कि शहर में बाल श्रम होने से किसी सरकारी कर्मचारी के वेतन से कटौती तो हो नहीं जाएगी, किसी अधिकारी पर कार्रवाई भी नहीं होगी। बाल श्रम रोकने का जिम्मा लेने वाले किसी सामाजिक संगठन को मिलने वाली सहायता राशि में कटौती भी नहीं होगी। बाल श्रम दिवस पर होने वाले कार्यक्रमों में कमी भी नहीं आएगी। भाषण दिए जाएंगे, अभियान चलाए जाएंगे। कुछ एक बच्चों को पकड़कर लाया जाएगा और फिर चंद रोज बाद उन्हें उन्हीं के हाल पर छोड़ दिया जाएगा, जिससे फिर से वे पेट भरने के लिए कहीं न कहीं काम करने को मजबूर होंगे। कुछ ऐसा ही जीवन जिले भर के सैकड़ों मजदूर बने बच्चे जीने को मजबूर हैं।
शहर सहित जिले भर में धड़ल्ले से हो रहे बाल श्रम पर शायद आपको यकीन नहीं हो रहा होगा और छोटू की इस कहानी पर भी, तो अपने घर, मोहल्ले, गली-कूंचे, गांव के आसपास खुले खुले होटल, ढाबों में बर्तन धोते और भट्टी पर खाना बनाते हुए बच्चों, खाना परोसते बच्चों, खराद मशीन, वेल्डिंग मशीन, वाहन रिपेयरिंग, घरों में झाडू-पोंछा करते, पंचर जोड़ते, आइसक्रीम बेचते और ठेले में धक्का लगाते, चाय-लस्सी ले जाते, खिलौने बेचते हुए बच्चों से प्यार की दो बातें करके उनका दुख जानने की कोशिश करना तो वे सब बता देंगे।
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आपके प्यार का सानिध्य पाकर छोटू बता देगा कि उसका बाप नहीं है और है तो वह शराब पीता है, या काम करने में सक्षम नहीं है। वह मां को पीटता है, घर में कई रोज तक खाना नहीं बनता, मां घरों में झाड़ू पोछा करके जो कमाती है, उससे घर के सभी भाई-बहनों को खाना नहीं मिल पाता है। इसी मजबूरी में वह पढ़ाई और खेलने कूदने की उम्र में काम करता है। आखिर करे भी क्यों ना, घर में बड़ा भी तो छोटू ही है। उसे अपनी मां को पिटाई और लोगों के उलाहने सुनने से बचाना, छोटे भाई-बहनों के खाने का इंतजाम करना है, तो काम करना ही पड़ेगा। इस वजह से छोटू का बेशकीमती बचपन 50 से सौ रुपये के लिए बर्तन धोता हुआ अक्सर नजर आ जाता है। लोगों का कहना है कि इसे रोकने के लिए मजबूत इच्छाशक्ति से कदम नहीं उठाए जा रहे हैं, जबकि केंद्र और राज्य सरकारें तमाम योजनाएं संचालित कर रही हैं। इन योजनाओं का लाभ उन बच्चों तक नहीं पहुंच पा रहा है। कोई पहुंचाने भी क्यों? पहुंचाए तो तब जब कोई फर्क पड़े। सच! इससे किसी को कोई फर्क नहीं पड़ता है।
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जिले में 172 घुमंतू कर रहे काम
बेसिक शिक्षा परिषद की ओर से कराए गए सर्वेे में जिले भर में केवल 172 बच्चे ऐसे पाए गए जो घुमंतु समुदाय के हैं और विभिन्न कार्यों में लिप्त हैं, लेकिन वास्तव में यह संख्या काफी ज्यादा है। ऐसा इसलिए है कि तमाम बच्चों के नामांकन स्कूलों में तो हो जाते हैं, लेकिन वे लोग स्कूल न जाकर दुकानों और ढाबों में काम करते रहते हैं, लेकिन बेसिक शिक्षा विभाग के शिक्षक मिड डे मील की धनराशि निकालने के चक्कर में उनकी उपस्थिति दर्ज कराते रहते हैं। इससे वे बच्चे बाल श्रमिक होकर भी बाल श्रमिकों में नहीं आ पाते हैं और उन्हें बाल श्रम से बचाया भी नहीं जा पा रहा है।
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दिन भर भीख मांगते हैं बच्चे
शिक्षा का अधिकार कानून के तहत छह से 14 वर्ष तक के बच्चों को निशुल्क शिक्षा देने का प्रावधान है, लेकिन शहर सहित जिले के तमाम कस्बों और नगरों में छोटे-छोटे बच्चे भीख मांगते नजर आ जाते हैं। शहर में सबसे ज्यादा भीख मांगने वाले लॉवेला चौराहा, रोडवेज बस डिपो, प्राइवेट बस अड्डा, पुलिस लाइंस चौराहा, स्कूल कॉलेजों के बाहर, पार्क और मेलों के बाहर, कचहरी चौराहा आदि स्थानों पर मिल जाते हैं। इन बच्चों को रोकने के लिए भी कोई खास प्रयास नहीं हो रहे हैं।
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विभागीय अधिकारी, नौ दिन चले अढ़ाई कोस
- बाल श्रम रोकने को लेकर सजग नहीं अधिकारी
- 24 टीमों ने साढ़े पांच माह में पकड़े छह बाल श्रमिक
अमर उजाला ब्यूरो
बदायूं। जिलेभर में बाल श्रम रोकने का जिम्मा लिए श्रम प्रवर्तन विभाग भी अपनी जिम्मेदारी नौ दिन चले अढ़ाई कोस की तर्ज पर निभा रहा है। अधिकारी और कर्मचारी बाल श्रम रोकने के लिए सजग नहीं नजर आ रहे हैं, वे केवल काम चलाने और नौकरी चलाने भर का काम कर रहे हैं, उन्हें शहर सहित जिले भर में शायद ही कहीं पर बाल श्रम होता नजर आता है। अगर नजर आता होता तो अब तक सैकड़ों बाल श्रमिक पढ़ाई की उम्र में बाल श्रम की जद से निकल चुके होते और स्कूलों में पढ़कर अपने भावी जीवन के सुनहरे सपने संजो रहे होते हैं।
शहर में अधिकारियों की नाक के नीचे होटल-ढाबों में बाल श्रम हो रहा है, लेकिन अधिकारी इस पर रोक नहीं लगा रहे हैं। आप सोच रहे होंगे कि अधिकारी और कर्मचारी बाल श्रम रोकने के लिए सजग क्यों नहीं है। बता देते हैं कि जिले के प्रत्येक ब्लाक और नगरों को मिलाकर 24 टीमें बनाई गई हैं, जो बाल श्रम रोकेंगी, लेकिन इन टीमों ने जनवरी से लेकर अब तक करीब सवा पांच माह का वक्त बीत चुका है, लेकिन एक भी बाल श्रमिक नहीं पकड़ है। केवल श्रम प्रवर्तन विभाग के अधिकारियों ने फरवरी में छापामारी कर तीन बाल श्रमिकों को खतरनाक काम करते हुए पकड़ा था और मई में तीन बाल श्रमिक गैर खतरनाक कार्य करते हुए पकड़े थे। कुल छह बाल श्रमिक पकड़े गए। अगर सभी 24 टीमें प्रतिमाह दो-दो बाल श्रमिकों को पकड़कर उन्हें पुनर्वास का काम करातीं तो अब करीब ढाई सौ से अधिक बच्चों का बचपन काम करने में नहीं गुजर रहा होता।
वर्जन
जिले में बाल श्रम रोकने के लिए 24 टीमें बनाई गई हैं। खुद भी छापामारी करके छह लोगों को पकड़ा है। इनमें खतरनाक कार्यों में लिप्त पाए तीन बाल श्रमिकों को मुक्त कराकर काम कराने वाले दुकानदारों और ढाबा मालिकों के खिलाफ कार्रवाई की गई है। बच्चों का स्कूल में नामांकन कराने के लिए बेसिक शिक्षा विभाग को लिख दिया गया है। आगे भी बाल श्रम रोकने के लिए अभियान चलाकर कार्रवाई की जाएगी।
-आरपी यादव, श्रम प्रवर्तन अधिकारी
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जी हां, छोटू के काम करने से किसी को कोई फर्क नहीं पड़ता है। क्यों कि शहर में बाल श्रम होने से किसी सरकारी कर्मचारी के वेतन से कटौती तो हो नहीं जाएगी, किसी अधिकारी पर कार्रवाई भी नहीं होगी। बाल श्रम रोकने का जिम्मा लेने वाले किसी सामाजिक संगठन को मिलने वाली सहायता राशि में कटौती भी नहीं होगी। बाल श्रम दिवस पर होने वाले कार्यक्रमों में कमी भी नहीं आएगी। भाषण दिए जाएंगे, अभियान चलाए जाएंगे। कुछ एक बच्चों को पकड़कर लाया जाएगा और फिर चंद रोज बाद उन्हें उन्हीं के हाल पर छोड़ दिया जाएगा, जिससे फिर से वे पेट भरने के लिए कहीं न कहीं काम करने को मजबूर होंगे। कुछ ऐसा ही जीवन जिले भर के सैकड़ों मजदूर बने बच्चे जीने को मजबूर हैं।
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जिले में 172 घुमंतू कर रहे काम
बेसिक शिक्षा परिषद की ओर से कराए गए सर्वेे में जिले भर में केवल 172 बच्चे ऐसे पाए गए जो घुमंतु समुदाय के हैं और विभिन्न कार्यों में लिप्त हैं, लेकिन वास्तव में यह संख्या काफी ज्यादा है। ऐसा इसलिए है कि तमाम बच्चों के नामांकन स्कूलों में तो हो जाते हैं, लेकिन वे लोग स्कूल न जाकर दुकानों और ढाबों में काम करते रहते हैं, लेकिन बेसिक शिक्षा विभाग के शिक्षक मिड डे मील की धनराशि निकालने के चक्कर में उनकी उपस्थिति दर्ज कराते रहते हैं। इससे वे बच्चे बाल श्रमिक होकर भी बाल श्रमिकों में नहीं आ पाते हैं और उन्हें बाल श्रम से बचाया भी नहीं जा पा रहा है।
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दिन भर भीख मांगते हैं बच्चे
शिक्षा का अधिकार कानून के तहत छह से 14 वर्ष तक के बच्चों को निशुल्क शिक्षा देने का प्रावधान है, लेकिन शहर सहित जिले के तमाम कस्बों और नगरों में छोटे-छोटे बच्चे भीख मांगते नजर आ जाते हैं। शहर में सबसे ज्यादा भीख मांगने वाले लॉवेला चौराहा, रोडवेज बस डिपो, प्राइवेट बस अड्डा, पुलिस लाइंस चौराहा, स्कूल कॉलेजों के बाहर, पार्क और मेलों के बाहर, कचहरी चौराहा आदि स्थानों पर मिल जाते हैं। इन बच्चों को रोकने के लिए भी कोई खास प्रयास नहीं हो रहे हैं।
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विभागीय अधिकारी, नौ दिन चले अढ़ाई कोस
- बाल श्रम रोकने को लेकर सजग नहीं अधिकारी
- 24 टीमों ने साढ़े पांच माह में पकड़े छह बाल श्रमिक
अमर उजाला ब्यूरो
बदायूं। जिलेभर में बाल श्रम रोकने का जिम्मा लिए श्रम प्रवर्तन विभाग भी अपनी जिम्मेदारी नौ दिन चले अढ़ाई कोस की तर्ज पर निभा रहा है। अधिकारी और कर्मचारी बाल श्रम रोकने के लिए सजग नहीं नजर आ रहे हैं, वे केवल काम चलाने और नौकरी चलाने भर का काम कर रहे हैं, उन्हें शहर सहित जिले भर में शायद ही कहीं पर बाल श्रम होता नजर आता है। अगर नजर आता होता तो अब तक सैकड़ों बाल श्रमिक पढ़ाई की उम्र में बाल श्रम की जद से निकल चुके होते और स्कूलों में पढ़कर अपने भावी जीवन के सुनहरे सपने संजो रहे होते हैं।
शहर में अधिकारियों की नाक के नीचे होटल-ढाबों में बाल श्रम हो रहा है, लेकिन अधिकारी इस पर रोक नहीं लगा रहे हैं। आप सोच रहे होंगे कि अधिकारी और कर्मचारी बाल श्रम रोकने के लिए सजग क्यों नहीं है। बता देते हैं कि जिले के प्रत्येक ब्लाक और नगरों को मिलाकर 24 टीमें बनाई गई हैं, जो बाल श्रम रोकेंगी, लेकिन इन टीमों ने जनवरी से लेकर अब तक करीब सवा पांच माह का वक्त बीत चुका है, लेकिन एक भी बाल श्रमिक नहीं पकड़ है। केवल श्रम प्रवर्तन विभाग के अधिकारियों ने फरवरी में छापामारी कर तीन बाल श्रमिकों को खतरनाक काम करते हुए पकड़ा था और मई में तीन बाल श्रमिक गैर खतरनाक कार्य करते हुए पकड़े थे। कुल छह बाल श्रमिक पकड़े गए। अगर सभी 24 टीमें प्रतिमाह दो-दो बाल श्रमिकों को पकड़कर उन्हें पुनर्वास का काम करातीं तो अब करीब ढाई सौ से अधिक बच्चों का बचपन काम करने में नहीं गुजर रहा होता।
वर्जन
जिले में बाल श्रम रोकने के लिए 24 टीमें बनाई गई हैं। खुद भी छापामारी करके छह लोगों को पकड़ा है। इनमें खतरनाक कार्यों में लिप्त पाए तीन बाल श्रमिकों को मुक्त कराकर काम कराने वाले दुकानदारों और ढाबा मालिकों के खिलाफ कार्रवाई की गई है। बच्चों का स्कूल में नामांकन कराने के लिए बेसिक शिक्षा विभाग को लिख दिया गया है। आगे भी बाल श्रम रोकने के लिए अभियान चलाकर कार्रवाई की जाएगी।
-आरपी यादव, श्रम प्रवर्तन अधिकारी