{"_id":"62a63a92bf105662b91f3cd0","slug":"ummeed-ki-mashal-badaun-news-bly4880551179","type":"story","status":"publish","title_hn":"‘सहर’ मिटा रही बेरोजगारी का अंधियारा...मुफलिसी में बन रही सहारा","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
‘सहर’ मिटा रही बेरोजगारी का अंधियारा...मुफलिसी में बन रही सहारा
विज्ञापन
जरी जरदोजी का काम करती सहर। संवाद
- फोटो : BADAUN
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
सौरभ सक्सेना
बदायूं। शहर से सटे कस्बे शेखूपूर की सहर अपने नाम के अनुरूप उम्मीदों की उस ‘सुबह’ की तरह हैं जो न केवल खुद अपने परिवार का सहारा हैं बल्कि कुछ और घरों के बेरोजगारी के अंधेरे को दूर करके उनकी मुफलिसी में सहारा बन रही हैं। जरी के काम में महारत रखने वाली सहर ने एक समूह के माध्यम से 10 महिलाओं को जोड़ा है, जिन्हें जरी जरदोजी का काम देकर वह उनको आत्मनिर्भर बना रहीं हैं। समूह से जुड़ी महिलाओं को प्रतिमाह औसतन 10 से 12 हजार की कमाई हो रही है।
सहर उर्फ माही खान उन लोगों के लिए प्रेरणा हैं जो परेशानियों के आगे हार मान जाते हैं। सहर तो परेशानियों के बीच ही बड़ी हुईं। केवल 16 दिन की थीं, जब वालिद रईस अहमद का इंतकाल हो गया। घर में चार बड़ी बहनें और थीं। मां संजीदा बेगम के सामने पांच बेटियों की बड़ी जिम्मेदारी थी, लेकिन उन्होंने हिम्मत नहीं हारी और सभी को पढ़ा लिखाकर बड़ा कर दिया। मां की परेशानियों को देखकर बड़ी हुई सहर ने भी उनके नक्शेकदम पर चलते हुए शुरू से ही आत्मनिर्भर बनने के लिए कोशिश शुरू कर दी।
2018 में एक जनपद-एक उत्पाद योजना के तहत प्रधानमंत्री रोजगार सृजन कार्यक्रम से पांच लाख का ऋण लिया और घर पर ही जरी जरदोजी का काम शुरू कर दिया। धीरे-धीरे इस काम में उन्हें महारत हासिल होती गई।
विज्ञापन
दो साल पहले उन्होंने अली हमजा स्वयं सहायता समूह का गठन करके कस्बे की महिलाओं को जोड़ा। इस समय उनके समूह में उनके साथ 10 महिलाएं काम कर रही हैं जो साड़ी, कुर्ता, चुन्नी आदि पर जरी का काम करके अपने परिवार का सहारा बन रही हैं। सहर बताती हैं कि ये सभी महिलाएं प्रतिमाह औसतन 10-12 हजार रुपये कमाकर अपने परिवार की आर्थिक मदद कर रही हैं।
-
बरेली से लाती हैं कच्चा माल, जयपुर तक होती है बिक्री
सहर बताती हैं कि जरी के काम के लिए वे लोग बरेली से सितारे, गोटा, रील आदि सामान लाते हैं। कुछ सामान लाचा या लहंगा बनाने के लिए स्पेशल आता है। तैयार सामान को वे प्रदर्शनी के माध्यम से या फिर ऑर्डर पर सेल करते हैं। जरी के काम की मांग जयपुर में ज्यादा है, सो यहां से तैयार माल जयपुर समेत अन्य शहरों में भी जाता है। फिलहाल सहर समूह की अध्यक्ष, उनकी बहन शाजिया कोषाध्यक्ष व कस्बे की सुमन सचिव हैं।
-
फोटो : 4
राममंदिर बनाकर दिया सौहार्द का संदेश
आज जहां लोग धर्म के नाम पर लड़ रहे हैं वहीं सहर ने जरीदोजी से कपड़े पर रामंदिर की आकृति उकेरकर सौहार्द का संदेश दिया है। सहर ने कई महीनों की मेहनत से कपड़े को सितारों से सजाकर उसे राममंदिर का रूप दिया है, जिसकी काफी तारीफ हुई है। सहर का कहना है कि सभी धर्म शांति और प्यार की बात कहते हैं, इसलिए उन्होंने राममंदिर बनाकर सांप्रदायिक सौहार्द की मिसाल पेश करने की कोशिश की है। वह बताती हैं कि इसका तमाम लोगों ने विरोध भी किया, लेकिन उनका परिवार हमेशा उनके साथ खड़ा रहा। उनकी इच्छा है कि वह अपनी इस कलाकृति को मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को भेंट करें। संवाद
विज्ञापन
बदायूं। शहर से सटे कस्बे शेखूपूर की सहर अपने नाम के अनुरूप उम्मीदों की उस ‘सुबह’ की तरह हैं जो न केवल खुद अपने परिवार का सहारा हैं बल्कि कुछ और घरों के बेरोजगारी के अंधेरे को दूर करके उनकी मुफलिसी में सहारा बन रही हैं। जरी के काम में महारत रखने वाली सहर ने एक समूह के माध्यम से 10 महिलाओं को जोड़ा है, जिन्हें जरी जरदोजी का काम देकर वह उनको आत्मनिर्भर बना रहीं हैं। समूह से जुड़ी महिलाओं को प्रतिमाह औसतन 10 से 12 हजार की कमाई हो रही है।
सहर उर्फ माही खान उन लोगों के लिए प्रेरणा हैं जो परेशानियों के आगे हार मान जाते हैं। सहर तो परेशानियों के बीच ही बड़ी हुईं। केवल 16 दिन की थीं, जब वालिद रईस अहमद का इंतकाल हो गया। घर में चार बड़ी बहनें और थीं। मां संजीदा बेगम के सामने पांच बेटियों की बड़ी जिम्मेदारी थी, लेकिन उन्होंने हिम्मत नहीं हारी और सभी को पढ़ा लिखाकर बड़ा कर दिया। मां की परेशानियों को देखकर बड़ी हुई सहर ने भी उनके नक्शेकदम पर चलते हुए शुरू से ही आत्मनिर्भर बनने के लिए कोशिश शुरू कर दी।
विज्ञापन
2018 में एक जनपद-एक उत्पाद योजना के तहत प्रधानमंत्री रोजगार सृजन कार्यक्रम से पांच लाख का ऋण लिया और घर पर ही जरी जरदोजी का काम शुरू कर दिया। धीरे-धीरे इस काम में उन्हें महारत हासिल होती गई।
विज्ञापन
दो साल पहले उन्होंने अली हमजा स्वयं सहायता समूह का गठन करके कस्बे की महिलाओं को जोड़ा। इस समय उनके समूह में उनके साथ 10 महिलाएं काम कर रही हैं जो साड़ी, कुर्ता, चुन्नी आदि पर जरी का काम करके अपने परिवार का सहारा बन रही हैं। सहर बताती हैं कि ये सभी महिलाएं प्रतिमाह औसतन 10-12 हजार रुपये कमाकर अपने परिवार की आर्थिक मदद कर रही हैं।
-
बरेली से लाती हैं कच्चा माल, जयपुर तक होती है बिक्री
सहर बताती हैं कि जरी के काम के लिए वे लोग बरेली से सितारे, गोटा, रील आदि सामान लाते हैं। कुछ सामान लाचा या लहंगा बनाने के लिए स्पेशल आता है। तैयार सामान को वे प्रदर्शनी के माध्यम से या फिर ऑर्डर पर सेल करते हैं। जरी के काम की मांग जयपुर में ज्यादा है, सो यहां से तैयार माल जयपुर समेत अन्य शहरों में भी जाता है। फिलहाल सहर समूह की अध्यक्ष, उनकी बहन शाजिया कोषाध्यक्ष व कस्बे की सुमन सचिव हैं।
-
फोटो : 4
राममंदिर बनाकर दिया सौहार्द का संदेश
आज जहां लोग धर्म के नाम पर लड़ रहे हैं वहीं सहर ने जरीदोजी से कपड़े पर रामंदिर की आकृति उकेरकर सौहार्द का संदेश दिया है। सहर ने कई महीनों की मेहनत से कपड़े को सितारों से सजाकर उसे राममंदिर का रूप दिया है, जिसकी काफी तारीफ हुई है। सहर का कहना है कि सभी धर्म शांति और प्यार की बात कहते हैं, इसलिए उन्होंने राममंदिर बनाकर सांप्रदायिक सौहार्द की मिसाल पेश करने की कोशिश की है। वह बताती हैं कि इसका तमाम लोगों ने विरोध भी किया, लेकिन उनका परिवार हमेशा उनके साथ खड़ा रहा। उनकी इच्छा है कि वह अपनी इस कलाकृति को मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को भेंट करें। संवाद