{"_id":"f1a66bc0ca704bb4ee9bceee28ca57ae","slug":"swlrajpal-old-freedom-fighter-hindi-news","type":"story","status":"publish","title_hn":"राखी के दिन पहनी थीं हथकड़ियां","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
राखी के दिन पहनी थीं हथकड़ियां
बदायूं
Updated Thu, 27 Aug 2015 11:58 PM IST
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
विज्ञापन
जंग-ए-आजादी के दीवाने ठाकुर राजपाल सिंह ने रक्षाबंधन के दिन हथकड़ी पहनी थीं। स्वाधीनता के लिए संघर्ष करने वाले इस वीर द्वारा जंगे आजादी में अहम भूमिका निभाने और रक्षाबंधन के दिन जेल जाने के कारण हर बर्ष रक्षाबंधन को यहां याद किया जाता है।
आजादी के इस रण बांकुरे का जन्म 25 फरवरी 1910 को जमींदार परिवार लायक सिंह के घर हुआ था। वह सिर्फ 13 वर्ष की उम्र में आजादी की लड़ाई में कूद पड़े। छोटी सी उम्र में ही वह अपने साथी मानसिंह, बाबू बृज बल्लभ, बदन सिंह, डोरी सिंह, टीकाराम महाशय, श्याम सिंह को साथ लेकर अंग्रेज अफसरों के घरों में चोरी छिपे आग लगाने का और का काम किया था। आग लगाते पकड़े जाने पर उन्हें इस्लामनर थाने में 15 दिनों तक रखा गया। इसके बाद जंग-ए-आजादी का सिलसिला चल पड़ा। वह अनेकों बार जेल गए और यातनाएं भी सहीं। कुछ समय बाद राजपाल सिंह की शादी कर दी गईं। इनकी पत्नी का नाम फूलवती था। उनके दो पुत्र अमर सिंह, राज सिंह और एक पुत्री राजरानी हुईं। बेटी राजरानी की शादी करनाल (हरियाणा) में राना कुॅवर राजेंद्र के साथ हुई। उस समय हाथी भी दहेज मे दिया गया था। इनके पास दूसरा हाथी था, जिसकी मृत्यु रुदायन में हुई थी। उस जगह को अब भी हाथी तिराहे के नाम से जाना जाता हैं। 10 अगस्त 1942 का दिन था। राजपाल सिंह के घर में रक्षाबंधन की तैयारियां की जा रहीं थीं। लंबे अंतराल के बाद आई उनकी बहन लौगंश्री राखी बांधने जा रही थी कि अचानक राजपाल सिंह की हवेली को चारों ओर से पुलिस ने घेर लिया। उन्हें उस समय के थानेदार नत्थू सिंह ने पकड़ लिया और हाथों में राखी की जगह लोहे की हथकड़ी पहनाकर ले गए। 16 जनवरी 1943 तक पांच माह, 10 दिन तक वह नजरबंद रहने के बाद जेल से रिहाई मिलने के बाद ही घर लौटे। उसके बाद भी राजपाल सिंह ने अंग्रेज विरोधी गतिविधियां नहीं त्यागीं। वह 56 वर्ष की जिंदगी बसर करने के बाद आठ अगस्त 1966 को दुनिया से विदा हो गए। अब उनकी यादें ही शेष हैं। गांव में बनी उनकी समाधि को लोग नमन करते हैं।
आजादी के इस रण बांकुरे का जन्म 25 फरवरी 1910 को जमींदार परिवार लायक सिंह के घर हुआ था। वह सिर्फ 13 वर्ष की उम्र में आजादी की लड़ाई में कूद पड़े। छोटी सी उम्र में ही वह अपने साथी मानसिंह, बाबू बृज बल्लभ, बदन सिंह, डोरी सिंह, टीकाराम महाशय, श्याम सिंह को साथ लेकर अंग्रेज अफसरों के घरों में चोरी छिपे आग लगाने का और का काम किया था। आग लगाते पकड़े जाने पर उन्हें इस्लामनर थाने में 15 दिनों तक रखा गया। इसके बाद जंग-ए-आजादी का सिलसिला चल पड़ा। वह अनेकों बार जेल गए और यातनाएं भी सहीं। कुछ समय बाद राजपाल सिंह की शादी कर दी गईं। इनकी पत्नी का नाम फूलवती था। उनके दो पुत्र अमर सिंह, राज सिंह और एक पुत्री राजरानी हुईं। बेटी राजरानी की शादी करनाल (हरियाणा) में राना कुॅवर राजेंद्र के साथ हुई। उस समय हाथी भी दहेज मे दिया गया था। इनके पास दूसरा हाथी था, जिसकी मृत्यु रुदायन में हुई थी। उस जगह को अब भी हाथी तिराहे के नाम से जाना जाता हैं। 10 अगस्त 1942 का दिन था। राजपाल सिंह के घर में रक्षाबंधन की तैयारियां की जा रहीं थीं। लंबे अंतराल के बाद आई उनकी बहन लौगंश्री राखी बांधने जा रही थी कि अचानक राजपाल सिंह की हवेली को चारों ओर से पुलिस ने घेर लिया। उन्हें उस समय के थानेदार नत्थू सिंह ने पकड़ लिया और हाथों में राखी की जगह लोहे की हथकड़ी पहनाकर ले गए। 16 जनवरी 1943 तक पांच माह, 10 दिन तक वह नजरबंद रहने के बाद जेल से रिहाई मिलने के बाद ही घर लौटे। उसके बाद भी राजपाल सिंह ने अंग्रेज विरोधी गतिविधियां नहीं त्यागीं। वह 56 वर्ष की जिंदगी बसर करने के बाद आठ अगस्त 1966 को दुनिया से विदा हो गए। अब उनकी यादें ही शेष हैं। गांव में बनी उनकी समाधि को लोग नमन करते हैं।
विज्ञापन