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शहर की शान : राष्ट्रीय गीतकार उर्मिलेश शंखधार ने बदायूं का बढ़ाया मान
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उर्मिलेश शंखधार । फाइल फोटो
- फोटो : BADAUN
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बदायूं। हिंदी गीत और गजल से खासे चर्चित रहे राष्ट्रीय गीतकार डॉ. उर्मिलेश शंखधार साहित्य में अपने योगदान की वजह से आज भी अमर हैं। डॉ. ब्रजेंद्र अवस्थी के सानिध्य में उन्होंने बदायूं में रहकर साहित्य और काव्य रचना का जो बीज बोया, उसके अंकुर आज भी नए कवियों के रूप में मंच की शोभा बढ़ा रहे हैं। कई पुस्तकें लिखने वाले डॉ. उर्मिलेश ने विदेशों तक बदायूं का मान बढ़ाया था।
डॉ. उर्मिलेश बहुआयामी व्यक्तित्व के धनी थे। वे एक सफल अध्येता, कुशल समीक्षक, यशस्वी मंच-संचालक के तौर पर जाने जाते हैं। काव्य-मंच पर अपने प्रभावशाली व्यक्तित्व के कारण वह किसी राजकुमार की तरह सुशोभित होते थे। मंच पर उनका चुंबकीय व्यक्तित्व और काव्यपाठ का अंदाज श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर देता था।
डॉ. उर्मिलेश का जन्म छह जुलाई, 1951 को ननिहाल इस्लामनगर में हुआ था। पिता स्व. भूपराम शर्मा ‘भूप’ मूल रूप से बिसौली क्षेत्र के भतरी गोवर्धनपुर गांव के निवासी थे और जन कवि के रूप में विख्यात थे। डॉ. उर्मिलेश ने हिंदी पठन पाठन को ही अपनी आजीविका और ध्येय बनाया। स्थानीय एनएमएसएन दास पीजी कॉलेज में वह हिंदी विभाग के रीडर/अध्यक्ष पद तक पहुंचे। उन्होंने काव्य पाठ शुरू किया तो देश विदेश के बड़े मंचों को सुशोभित किया।
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डॉ. उर्मिलेश का साहित्य-सृजन
डॉ. उर्मिलेश ने साहित्य और समालोचना के सरल आयाम, नया सप्तक: व्याख्या और विवेचन के नए आयाम तथा गीति सप्तक: पहचान और परख नाम से प्रमुख समीक्षात्मक ग्रंथ लिखे। डॉ. उर्मिलेश के काव्य ग्रंथों में सोत नदी बहती है, धुआं चीरते हुए (गजल संग्रह), डॉ.उर्मिलेश की गजलें, घर बुनते अक्षर (मुक्तक संग्रह), चिरंजीव हैं हम (गीतसंग्रह), गंधों की जागीर (दोहा संग्रह), वरदानों की पांडुलिपि (दोहा संग्रह), बाढ़ में डूबी नदी (गीत संग्रह), फैसला वो भी गलत था (गजल संग्रह), धूप निकलेगी (गजल संग्रह), जागरण की देहरी पर (गीत संग्रह), बिंब कुछ उभरते हैं (गीत संग्रह), तथा ‘आइने आह भरते हैं (गजल संग्रह) प्रमुख हैं। इनके अलावा विनय कैसेट्स, नीमच (मध्य प्रदेश) ने डॉ. उर्मिलेश कैसेट्स व मशहूर गीतकार डॉ. विष्णु सक्सेना ने डॉ. उर्मिलेश के गीत कैसेट के रूप में भावभीनी गीतांजलि प्रस्तुत की है।
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यादगार हैं उर्मिलेश की रचनाएं
डॉ. उर्मिलेश की कई रचनाएं व पंक्तियां आज भी लोग गुनगुना बैठते हैं।
कहीं मंदिर कहीं मस्जिद की तख्ती हम लगा बैठे
हमें एक घर बनाना था मगर ये क्या बना बैठे।
केसरिया हिंदू हुआ, हरा हुआ इस्लाम
रंगों पर भी लिख गया, धर्म जाति का नाम।
अयोध्या के मंदिर-मस्जिद प्रकरण पर देश के कई गीतकारों ने अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त की, पर राष्ट्रीय एकता के प्रबल पक्षधर डॉ.उर्मिलेश की लाइनें इस तरह रहीं-
उसने मंदिर तोड़ डाला, तूने मस्जिद तोड़ दी
जलजला वो भी गलत था जलजला ये भी गलत।
लड़कियों की जिंदगी पर उनकी गजल बेमिसाल रही।
लड़कियां लड़कियां लड़कियां
सुर्खियां, हल्दियां, स्याहियां
लड़कियां लड़कियां लड़कियां
गोदियां, लोरियां, घुट्टियां।
‘बदायूं महोत्सव’ के संस्थापक के रूप में डॉ. उर्मिलेश का योगदान सदैव स्मरणीय रहेगा। उन्हें गीत गंधर्व, भारत श्री, साहित्य सारस्वत, युगचारण, कवि भूषण तथा राष्ट्रकवि जैसे अलंकरण मिले। मरणोपरांत यश भारती से भी सम्मानित किया गया। अब उनके पुत्र डॉ. अक्षत अशेष व पुत्री डॉ. सोनरूपा विशाल भी काव्य साधना में जुटे हैं।
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डॉ. उर्मिलेश बहुआयामी व्यक्तित्व के धनी थे। वे एक सफल अध्येता, कुशल समीक्षक, यशस्वी मंच-संचालक के तौर पर जाने जाते हैं। काव्य-मंच पर अपने प्रभावशाली व्यक्तित्व के कारण वह किसी राजकुमार की तरह सुशोभित होते थे। मंच पर उनका चुंबकीय व्यक्तित्व और काव्यपाठ का अंदाज श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर देता था।
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डॉ. उर्मिलेश का जन्म छह जुलाई, 1951 को ननिहाल इस्लामनगर में हुआ था। पिता स्व. भूपराम शर्मा ‘भूप’ मूल रूप से बिसौली क्षेत्र के भतरी गोवर्धनपुर गांव के निवासी थे और जन कवि के रूप में विख्यात थे। डॉ. उर्मिलेश ने हिंदी पठन पाठन को ही अपनी आजीविका और ध्येय बनाया। स्थानीय एनएमएसएन दास पीजी कॉलेज में वह हिंदी विभाग के रीडर/अध्यक्ष पद तक पहुंचे। उन्होंने काव्य पाठ शुरू किया तो देश विदेश के बड़े मंचों को सुशोभित किया।
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डॉ. उर्मिलेश का साहित्य-सृजन
डॉ. उर्मिलेश ने साहित्य और समालोचना के सरल आयाम, नया सप्तक: व्याख्या और विवेचन के नए आयाम तथा गीति सप्तक: पहचान और परख नाम से प्रमुख समीक्षात्मक ग्रंथ लिखे। डॉ. उर्मिलेश के काव्य ग्रंथों में सोत नदी बहती है, धुआं चीरते हुए (गजल संग्रह), डॉ.उर्मिलेश की गजलें, घर बुनते अक्षर (मुक्तक संग्रह), चिरंजीव हैं हम (गीतसंग्रह), गंधों की जागीर (दोहा संग्रह), वरदानों की पांडुलिपि (दोहा संग्रह), बाढ़ में डूबी नदी (गीत संग्रह), फैसला वो भी गलत था (गजल संग्रह), धूप निकलेगी (गजल संग्रह), जागरण की देहरी पर (गीत संग्रह), बिंब कुछ उभरते हैं (गीत संग्रह), तथा ‘आइने आह भरते हैं (गजल संग्रह) प्रमुख हैं। इनके अलावा विनय कैसेट्स, नीमच (मध्य प्रदेश) ने डॉ. उर्मिलेश कैसेट्स व मशहूर गीतकार डॉ. विष्णु सक्सेना ने डॉ. उर्मिलेश के गीत कैसेट के रूप में भावभीनी गीतांजलि प्रस्तुत की है।
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यादगार हैं उर्मिलेश की रचनाएं
डॉ. उर्मिलेश की कई रचनाएं व पंक्तियां आज भी लोग गुनगुना बैठते हैं।
कहीं मंदिर कहीं मस्जिद की तख्ती हम लगा बैठे
हमें एक घर बनाना था मगर ये क्या बना बैठे।
केसरिया हिंदू हुआ, हरा हुआ इस्लाम
रंगों पर भी लिख गया, धर्म जाति का नाम।
अयोध्या के मंदिर-मस्जिद प्रकरण पर देश के कई गीतकारों ने अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त की, पर राष्ट्रीय एकता के प्रबल पक्षधर डॉ.उर्मिलेश की लाइनें इस तरह रहीं-
उसने मंदिर तोड़ डाला, तूने मस्जिद तोड़ दी
जलजला वो भी गलत था जलजला ये भी गलत।
लड़कियों की जिंदगी पर उनकी गजल बेमिसाल रही।
लड़कियां लड़कियां लड़कियां
सुर्खियां, हल्दियां, स्याहियां
लड़कियां लड़कियां लड़कियां
गोदियां, लोरियां, घुट्टियां।
‘बदायूं महोत्सव’ के संस्थापक के रूप में डॉ. उर्मिलेश का योगदान सदैव स्मरणीय रहेगा। उन्हें गीत गंधर्व, भारत श्री, साहित्य सारस्वत, युगचारण, कवि भूषण तथा राष्ट्रकवि जैसे अलंकरण मिले। मरणोपरांत यश भारती से भी सम्मानित किया गया। अब उनके पुत्र डॉ. अक्षत अशेष व पुत्री डॉ. सोनरूपा विशाल भी काव्य साधना में जुटे हैं।