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कभी राजनीति में चलता था जिनका सिक्का, आज सियासत से दूर हैं वे रसूखदार परिवार
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बदायूं। जिले की राजनीति में बड़ा रसूख रखने वाले कई परिवार आज सियासी उठापटक से दूर हैं। सक्रिय राजनीति से इन परिवारों की लंबे समय से दूरी है। कुछ परिवार ऐसे भी हैं जो सक्रिय राजनीति में बने रहे, लेकिन अब तक वहां से किसी को विधानसभा या लोकसभा पहुंचने का मौका नहीं मिला। चुनाव मैदान में भी उतरे लेकिन परिवार की सियासी विरासत आगे नहीं बढ़ सकी।
शहर विधानसभा सीट से 1977 में जनता पार्टी, 1989 और 1991 में भाजपा से विधायक चुने गए कृष्ण स्वरूप वैश्य प्रदेश में मंत्री भी रहे। उनके तीन बेटों में बड़े बेटे प्रभात वैश्य अमेरिका में सॉफ्टवेयर इंजीनियर हैं। सबसे छोटे नवीन वैश्य चार्टर्ड अकाउंटेंट हैं। दोनों भाइयों ने राजनीति में ज्यादा दिलचस्पी नहीं दिखाई। 2002 में कृष्ण स्वरूप वैश्य की पत्नी ने भाजपा से टिकट मांगा था। पार्टी ने प्रेम स्वरूप पाठक को टिकट दिया और वह विधायक चुने गए। तीसरे बेटे अजीत वैश्य सक्रिय राजनीति में हैं लेकिन अब तक उनको चुनाव लड़ने का मौका नहीं मिला। इस चुनाव में वह भाजपा के जिला बूथ प्रबंधन प्रमुख हैं।
शहर सीट से 1985 में कांग्रेस से विधायक चुने जाने के बाद सरकार में पर्यटन व यातायात राज्यमंत्री बनने वाली प्रमिला भद्वार मेहरा का परिवार राजनीति से दूर है। प्रमिला भद्वार को राजनीति विरासत में मिली थी। उनके पिता पुरुषोत्तम लाल भद्वार दो बार निर्दलीय और एक बार कांग्रेस से विधायक रहे थे। अब प्रमिला भद्वार कई साल से एक बेटी के साथ गुड़गांव में रहती हैं और दूसरी बेटी विदेश में है। परिवार अक्सर उझानी में अपने पैतृक घर में आता रहता है। भद्वार की छोटी बहन हेमा ने पिछले लोकसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी के टिकट पर बदायूं से लोकसभा चुनाव लड़ा था पर हार गईं। भद्वार की बेटियां राजनीति से दूर हैं।
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दातागंज विधानसभा सीट से 1977 में जनता पार्टी इसके बाद 1985, 1991, 1993 में भाजपा से विधायक रहे अवनीश कुमार सिंह पप्पू भइया का परिवार भी राजनीति में नहीं आया। उनका एक बेटा सरकारी नौकरी में है। खुद अवनीश लंबे समय से अस्वस्थ होने के कारण पूरी तरह राजनीति से दूर हैं। पप्पू भइया के पिता हरीशचंद्र सिंह 1957 में जनसंघ और 1967 में निर्दलीय विधायक चुने गए थे। उन्हीं से प्रेरणा लेकर पप्पू भइया राजनीति में आए थे पर परिवार की नई पीढ़ी को राजनीति में दिलचस्पी नहीं है।
1980 में शहर सीट से कांग्रेस के टिकट पर विधायक चुने जाने वाले श्रीकृष्ण गोयल, नारायण दत्त तिवारी सरकार में मंत्री रहे। उनका परिवार भी राजनीति से दूर है। उनके भतीजे यादव कृष्ण गोयल ने सियासत में कदम रखा और नगर पालिका उझानी के चेयरमैन भी रहे। इसके बाद इस परिवार ने भी सियासत से दूरी बना ली। श्रीकृष्ण गोयल के बेटे हरीकृष्ण गोयल का निधन हो चुका है।
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बाबा दो, पिता चार बार रहे विधायक, बेटे को भाया व्यापार
बिसौली विधानसभा सीट से बाबू ब्रजबल्लभ 1977 और 1980 में कांग्रेस से विधायक रहे। उनकी हत्या के बाद बेटे योगेंद्र कुमार कुन्नू बाबू 1985, 1989 में कांग्रेस, 1996 और 2002 में सपा से विधायक चुने गए। इस परिवार का लंबे समय तक जिले की राजनीतिक दखल रहा। कुन्नू बाबू के बेटे आशीष गर्ग राजनीति से दूर हैं। वह अपना व्यापार करते हैं। बिसौली सीट भी 2007 के चुनाव के बाद सुरक्षित हो चुकी है।
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विधायक संतोष कुमारी के बेटे शैलेश भी नहीं कर सके करिश्मा
दातागंज सीट से तीन बार कांग्रेस से विधायक रहीं संतोष कुमारी पाठक के पिता पंडित त्रिवेणी सहाय भी इस सीट से विधायक रहे। 1977 में पहली बार अवनीश कुमार सिंह ने संतोष कुमारी पाठक को शिकस्त देकर चुनाव जीता था। इसके बाद संतोष कुमारी पाठक 1980 और 1989 में दो बार और विधायक चुनी गईं। इन दोनों का इस सीट पर लंबा राजनीतिक घमासान रहा। संतोष कुमारी पाठक के बेटे डॉ. शैलेश पाठक सक्रिय राजनीति में हैं पर कोई खास सफलता नहीं मिल सकी। उन्होंने कई चुनाव लड़े। दो बार वह मामूली अंतर से हार गए। इस बार भाजपा से टिकट के दावेदार थे, लेकिन उनको टिकट नहीं मिल सका। संवाद
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शहर विधानसभा सीट से 1977 में जनता पार्टी, 1989 और 1991 में भाजपा से विधायक चुने गए कृष्ण स्वरूप वैश्य प्रदेश में मंत्री भी रहे। उनके तीन बेटों में बड़े बेटे प्रभात वैश्य अमेरिका में सॉफ्टवेयर इंजीनियर हैं। सबसे छोटे नवीन वैश्य चार्टर्ड अकाउंटेंट हैं। दोनों भाइयों ने राजनीति में ज्यादा दिलचस्पी नहीं दिखाई। 2002 में कृष्ण स्वरूप वैश्य की पत्नी ने भाजपा से टिकट मांगा था। पार्टी ने प्रेम स्वरूप पाठक को टिकट दिया और वह विधायक चुने गए। तीसरे बेटे अजीत वैश्य सक्रिय राजनीति में हैं लेकिन अब तक उनको चुनाव लड़ने का मौका नहीं मिला। इस चुनाव में वह भाजपा के जिला बूथ प्रबंधन प्रमुख हैं।
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शहर सीट से 1985 में कांग्रेस से विधायक चुने जाने के बाद सरकार में पर्यटन व यातायात राज्यमंत्री बनने वाली प्रमिला भद्वार मेहरा का परिवार राजनीति से दूर है। प्रमिला भद्वार को राजनीति विरासत में मिली थी। उनके पिता पुरुषोत्तम लाल भद्वार दो बार निर्दलीय और एक बार कांग्रेस से विधायक रहे थे। अब प्रमिला भद्वार कई साल से एक बेटी के साथ गुड़गांव में रहती हैं और दूसरी बेटी विदेश में है। परिवार अक्सर उझानी में अपने पैतृक घर में आता रहता है। भद्वार की छोटी बहन हेमा ने पिछले लोकसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी के टिकट पर बदायूं से लोकसभा चुनाव लड़ा था पर हार गईं। भद्वार की बेटियां राजनीति से दूर हैं।
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दातागंज विधानसभा सीट से 1977 में जनता पार्टी इसके बाद 1985, 1991, 1993 में भाजपा से विधायक रहे अवनीश कुमार सिंह पप्पू भइया का परिवार भी राजनीति में नहीं आया। उनका एक बेटा सरकारी नौकरी में है। खुद अवनीश लंबे समय से अस्वस्थ होने के कारण पूरी तरह राजनीति से दूर हैं। पप्पू भइया के पिता हरीशचंद्र सिंह 1957 में जनसंघ और 1967 में निर्दलीय विधायक चुने गए थे। उन्हीं से प्रेरणा लेकर पप्पू भइया राजनीति में आए थे पर परिवार की नई पीढ़ी को राजनीति में दिलचस्पी नहीं है।
1980 में शहर सीट से कांग्रेस के टिकट पर विधायक चुने जाने वाले श्रीकृष्ण गोयल, नारायण दत्त तिवारी सरकार में मंत्री रहे। उनका परिवार भी राजनीति से दूर है। उनके भतीजे यादव कृष्ण गोयल ने सियासत में कदम रखा और नगर पालिका उझानी के चेयरमैन भी रहे। इसके बाद इस परिवार ने भी सियासत से दूरी बना ली। श्रीकृष्ण गोयल के बेटे हरीकृष्ण गोयल का निधन हो चुका है।
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बाबा दो, पिता चार बार रहे विधायक, बेटे को भाया व्यापार
बिसौली विधानसभा सीट से बाबू ब्रजबल्लभ 1977 और 1980 में कांग्रेस से विधायक रहे। उनकी हत्या के बाद बेटे योगेंद्र कुमार कुन्नू बाबू 1985, 1989 में कांग्रेस, 1996 और 2002 में सपा से विधायक चुने गए। इस परिवार का लंबे समय तक जिले की राजनीतिक दखल रहा। कुन्नू बाबू के बेटे आशीष गर्ग राजनीति से दूर हैं। वह अपना व्यापार करते हैं। बिसौली सीट भी 2007 के चुनाव के बाद सुरक्षित हो चुकी है।
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विधायक संतोष कुमारी के बेटे शैलेश भी नहीं कर सके करिश्मा
दातागंज सीट से तीन बार कांग्रेस से विधायक रहीं संतोष कुमारी पाठक के पिता पंडित त्रिवेणी सहाय भी इस सीट से विधायक रहे। 1977 में पहली बार अवनीश कुमार सिंह ने संतोष कुमारी पाठक को शिकस्त देकर चुनाव जीता था। इसके बाद संतोष कुमारी पाठक 1980 और 1989 में दो बार और विधायक चुनी गईं। इन दोनों का इस सीट पर लंबा राजनीतिक घमासान रहा। संतोष कुमारी पाठक के बेटे डॉ. शैलेश पाठक सक्रिय राजनीति में हैं पर कोई खास सफलता नहीं मिल सकी। उन्होंने कई चुनाव लड़े। दो बार वह मामूली अंतर से हार गए। इस बार भाजपा से टिकट के दावेदार थे, लेकिन उनको टिकट नहीं मिल सका। संवाद