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साहब, ये कैसे स्वास्थ्य उपकेंद्र...दवाएं नहीं, भूसा और जानवर भरे हैं यहां
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बदायूं। स्वास्थ्य विभाग ने लाखों रुपये खर्च कर किसरुआ में कई साल पहले स्वास्थ्य उपकेंद्र तो बनवा दिया, लेकिन अब तक न तो उसमें कभी दवा मिली और न ही डॉक्टर आए। कई वर्षों से बंद पड़े उपकेंद्र पर अब ग्रामीणों ने कब्जा कर लिया है। स्वास्थ्य उपकेंद्र के कमरों में भूसा भरा जा रहा है और परिसर में मवेशी बांधे जा रहे हैं।
शहर से करीब दस किलोमीटर दूर किसरुआ में स्वास्थ्य उपकेंद्र बना है। स्वास्थ्य विभाग और सरकार की मंशा रही होगी कि ग्रामीणों को इलाज के लिए शहर नहीं भागना पड़ेगा। आसपास के ग्रामीणों को भी दवा मिल सकेगी। इलाज के लिहाज से किसरुआ में एक स्वास्थ्य उपकेंद्र का निर्माण कराया गया। इसके लिए लाखों रुपये खर्च किए गए। बिल्डिंग का निर्माण तो हो गया, लेकिन कभी स्वास्थ्य उपकेंद्र में डॉक्टर नहीं आए और न ही कोई कर्मचारी नियुक्त किया गया। दिन, माह, साल गुजरते चले गए, लेकिन कभी स्वास्थ्य उपकेंद्र के हाल नहीं सुधरे। परिणाम यह रहा कि स्वास्थ्य उपकेंद्र जर्जर हालत में पहुंच गया है। ग्रामीणों ने इसकी बिल्डिंग पर कब्जा कर लिया है। इसके कमरों में भूसा, उपले भरे जा रहे हैं। रोजाना इसके परिसर में मवेशियों को बांधा जाता है।
यहां कभी इलाज होगा, अब तो ग्रामीणों ने इसके बारे में विचार करना भी छोड़ दिया है। वे या तो गुलड़िया स्वास्थ्य केंद्र जाते हैं या फिर जिला अस्पताल आकर इलाज कराते हैं। किसरुआ का स्वास्थ्य उपकेंद्र अब तो नाम का रह गया है।
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हजरतपुर के आयुर्वेद चिकित्सालय में पड़े हैं ताले, बंधते हैं पशु
बदायूं। कुछ यही हाल हजरतपुर में आयुर्वेदिक चिकित्सालय का है। यहां चिकित्सालय तो बना है, लेकिन कभी इसके ताले नहीं खुले। ग्रामीणों की माने तो जब से इसका निर्माण हुआ है, तभी से ताले पड़े हैं। कहा जा रहा था कि यहां चिकित्सक आया करेंगे और लोगों का इलाज करेंगे। यह सुनते-सुनते कई साल गुजर चुके हैं लेकिन अब तक न तो कभी चिकित्सक आए और न ही कोई स्टाफ तैनात किया गया। इस समय स्वास्थ्य केंद्र के हालत ये हो चुके हैं कि इसमें दिनभर मवेशी चरते हैं। कुछ ग्रामीणों ने इसमें अपने मवेशी बांधने शुरू कर दिए हैं। वर्षों से बंद पड़े चिकित्सालय की दीवारें भी जर्जर होने लगी हैं।
म्याऊं स्वास्थ्य केंद्र में नहीं मिल रही दवा
म्याऊं। म्याऊं स्वास्थ्य केंद्र में डॉक्टर तो आ रहे हैं, लेकिन मरीजों को दवा नहीं मिल रही है। दवा वितरण केंद्र सुनसान पड़ा रहता है। डॉक्टर एक छोटी पर्ची लिख देते हैं, वह दवा मरीजों को मेडिकल स्टोर से खरीदनी पड़ती है। ग्राम सिसौरा निवासी शिलेंद्र (35) ने बताया कि कुछ दिन पहले उसके हाथ में चोट लग गई थी। इसकी दवा लेने स्वास्थ्य केंद्र पर आया था। डॉक्टर ने दवा तो लिख दी, लेकिन स्वास्थ्य केंद्र में दवा नहीं मिली। वहीं प्रदीप (28) ने भी दवा नहीं मिलने की शिकायत की। गिल्टैया निवासी ओमपाल (48) ने बताया कि उन्हें डॉक्टर ने तो देख लिया था, लेकिन दवा नहीं मिली। वहीं जगदीश अपने बच्चे को दवा दिलाने तो उन्हें भी दवा नहीं मिली। इससे स्वास्थ्य केंद्र में मरीजों का बुरा हाल है। उन्हें कभी-कभी आधी अधूरी दवा मिल जाती हैं। बाकी मेडिकल से दवा खरीदना मजबूरी है।
ग्रामीण इलाकों में उपकेंद्र हैं, जहां एनएम बैठतीं हैं। जो उपकेंद्र बंद पड़े हैं, उनकी पुताई कराई जाएगी। उनमें साफ-सफाई भी होगी, ताकि एनएम वहां बैठ सकें।
डॉ. मंजीत सिंह, प्रभारी सीएमओ
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शहर से करीब दस किलोमीटर दूर किसरुआ में स्वास्थ्य उपकेंद्र बना है। स्वास्थ्य विभाग और सरकार की मंशा रही होगी कि ग्रामीणों को इलाज के लिए शहर नहीं भागना पड़ेगा। आसपास के ग्रामीणों को भी दवा मिल सकेगी। इलाज के लिहाज से किसरुआ में एक स्वास्थ्य उपकेंद्र का निर्माण कराया गया। इसके लिए लाखों रुपये खर्च किए गए। बिल्डिंग का निर्माण तो हो गया, लेकिन कभी स्वास्थ्य उपकेंद्र में डॉक्टर नहीं आए और न ही कोई कर्मचारी नियुक्त किया गया। दिन, माह, साल गुजरते चले गए, लेकिन कभी स्वास्थ्य उपकेंद्र के हाल नहीं सुधरे। परिणाम यह रहा कि स्वास्थ्य उपकेंद्र जर्जर हालत में पहुंच गया है। ग्रामीणों ने इसकी बिल्डिंग पर कब्जा कर लिया है। इसके कमरों में भूसा, उपले भरे जा रहे हैं। रोजाना इसके परिसर में मवेशियों को बांधा जाता है।
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यहां कभी इलाज होगा, अब तो ग्रामीणों ने इसके बारे में विचार करना भी छोड़ दिया है। वे या तो गुलड़िया स्वास्थ्य केंद्र जाते हैं या फिर जिला अस्पताल आकर इलाज कराते हैं। किसरुआ का स्वास्थ्य उपकेंद्र अब तो नाम का रह गया है।
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हजरतपुर के आयुर्वेद चिकित्सालय में पड़े हैं ताले, बंधते हैं पशु
बदायूं। कुछ यही हाल हजरतपुर में आयुर्वेदिक चिकित्सालय का है। यहां चिकित्सालय तो बना है, लेकिन कभी इसके ताले नहीं खुले। ग्रामीणों की माने तो जब से इसका निर्माण हुआ है, तभी से ताले पड़े हैं। कहा जा रहा था कि यहां चिकित्सक आया करेंगे और लोगों का इलाज करेंगे। यह सुनते-सुनते कई साल गुजर चुके हैं लेकिन अब तक न तो कभी चिकित्सक आए और न ही कोई स्टाफ तैनात किया गया। इस समय स्वास्थ्य केंद्र के हालत ये हो चुके हैं कि इसमें दिनभर मवेशी चरते हैं। कुछ ग्रामीणों ने इसमें अपने मवेशी बांधने शुरू कर दिए हैं। वर्षों से बंद पड़े चिकित्सालय की दीवारें भी जर्जर होने लगी हैं।
म्याऊं स्वास्थ्य केंद्र में नहीं मिल रही दवा
म्याऊं। म्याऊं स्वास्थ्य केंद्र में डॉक्टर तो आ रहे हैं, लेकिन मरीजों को दवा नहीं मिल रही है। दवा वितरण केंद्र सुनसान पड़ा रहता है। डॉक्टर एक छोटी पर्ची लिख देते हैं, वह दवा मरीजों को मेडिकल स्टोर से खरीदनी पड़ती है। ग्राम सिसौरा निवासी शिलेंद्र (35) ने बताया कि कुछ दिन पहले उसके हाथ में चोट लग गई थी। इसकी दवा लेने स्वास्थ्य केंद्र पर आया था। डॉक्टर ने दवा तो लिख दी, लेकिन स्वास्थ्य केंद्र में दवा नहीं मिली। वहीं प्रदीप (28) ने भी दवा नहीं मिलने की शिकायत की। गिल्टैया निवासी ओमपाल (48) ने बताया कि उन्हें डॉक्टर ने तो देख लिया था, लेकिन दवा नहीं मिली। वहीं जगदीश अपने बच्चे को दवा दिलाने तो उन्हें भी दवा नहीं मिली। इससे स्वास्थ्य केंद्र में मरीजों का बुरा हाल है। उन्हें कभी-कभी आधी अधूरी दवा मिल जाती हैं। बाकी मेडिकल से दवा खरीदना मजबूरी है।
ग्रामीण इलाकों में उपकेंद्र हैं, जहां एनएम बैठतीं हैं। जो उपकेंद्र बंद पड़े हैं, उनकी पुताई कराई जाएगी। उनमें साफ-सफाई भी होगी, ताकि एनएम वहां बैठ सकें।
डॉ. मंजीत सिंह, प्रभारी सीएमओ