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कटरी से कहीं गुम न जाए काला हिरन....
बदायूं, ब्यूरो
Updated Sun, 17 Apr 2016 12:22 AM IST
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गंगा और रामंगगा की कटरी में ब्लैक बक (काला हिरन) पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं। अक्सर इनका शिकार होता है। कभी मामला सामने आता है कभी नहीं। हिरन की यह ऐसी दुर्लभ प्रजाति है, जिसके संरक्षण का प्रावधान किया गया है। लेकिन इसके लिए जिले में अभी तक कोई परियोजना नहीं बनी।
जिले में गंगा और रामगंगा के कटरी इलाकों में बहुतायत में ब्लैक बक पाए जाते हैं। इन्हीं इलाकों में शिकारी भी सक्रिय रहते हैं। हर तीन साल में एक बार वन विभाग वन्य जीवों की गणना कराता है। 2015 में वन्य जीवों की गणना पर गौर करें, तो जिले में ब्लैक बक की संख्या 1,097 है। हालांकि, इस गणना को अनुमानित माना जाता है, लेकिन पिछले एक साल में जिस तरह से ब्लैक बक के शिकार के मामले सामने आए हैं, वह चिंताजनक हैं। लगभग 16 ब्लैक बक शिकारियों के हाथों मारे गए हैं। गणना के मुताबिक हर साल 10 से 12 ब्लैक बक की प्राकृतिक कारणों से मौत हो जाती है। इस तरह यह संख्या 30 से 35 के बीच पहुंचती है। यह वे आंकड़ेे हैं, जो वन विभाग और पुलिस के रिकार्ड में दर्ज हैं। इसलिए यदि इनके संरक्षण की योजना नहीं बनी तो कटरी से ब्लैक बक एक दिन लुप्त हो जाएगा।
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दर्ज नहीं होते सभी मामले
दातागंज। दुर्लभ प्रजाति के ब्लैक बक के संरक्षण के उपाय नहीं किए जा रहे हैं। दातागंज में रामगंगा और अरिल नदी की कटरी में ब्लैक बक की संख्या सबसे ज्यादा है। दातागंज इलाके के गांव नगरिया अभय, जसमा, वनबौसारी, नैनामई, हजारा, नवीगंज, असधरमई ऐसे इलाके हैं, जहां सड़कों पर ब्लैक बक को घूमते हुए देखा जा सकता है। कुछ समय से इन इलाकों में भी शिकारी सक्रिय हो गए हैं। गौर करने वाली बात यह है कि ब्लैक बक के शिकार के तमाम मामलों में रिपोर्ट ही दर्ज नहीं होती। यहां गौर करने वाली बात यह भी है कि इन इलाकों के लोग भी ब्लैक बक के संरक्षण को लेकर गंभीर हैं। इस वजह से यहां ब्लैक बक की प्रजाति खुद को सुरक्षित महसूस करती है।
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खाल और सींग के लालच में हो रहा शिकार
दातागंज। ब्लैक बक का शिकार उनकी खाल और सींग के लालच में किया जाता है। इनकी खाल और सींग की अंतराष्ट्रीय बाजार में काफी मांग है। शिकार करने वालों के संबंध बड़े तस्करों से होते हैं। ब्लैक बक का शिकार करने के बाद शिकारी इनकी खाल और सींग तस्करों को बेच देते हैं। गौर करने वाली बात यह है कि एक तरफ जोधपुर में काला हिरन का शिकार करने के मामले में सिने अभिनेता समेत कई लोगों पर कोर्ट में मुकदमा चल रहा है, लेकिन यहां शिकारियों के खिलाफ कोई कार्रवाई अभी तक नहीं हुई है।
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दुर्घटना के भी शिकार होते हैं
दातागंज। अक्सर सड़क दुर्घटनाओं में भी ब्लैक बक की मौत हो जाती है। मौत के बाद पोस्टमार्टम कराके इतिश्री हो जाती है। बचाव के लिए उन क्षेत्रों में सड़कों के किनारे कटीली बाढ़ लगाई जा सकती है। यही नहीं गर्मी के दिनों में गांवों में भी इनके झुंड पहुंच जाते हैं, जहां आवारा कुत्तों का भी यह शिकार बन जाते हैं। सहसवान और ककराला के आसपास के क्षेत्र को ब्लैक बक छोड़ गए हैं। आम चर्चा है कि इन क्षेत्रों में इनका शिकार हो जाता था।
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हाल के दिनों में ब्लैक बक के शिकार के मामलों में कुछ इजाफा हुआ है। शिकारियों पर शिकंजा कसा जाएगा। वन विभाग अपने स्तर से दुर्लभ प्रजाति के इस वन्य जीव के संरक्षण की हर संभव कोशिश कर रहा है। संरक्षण की कोशिश के चलते ही ब्लैक बक की संख्या में इजाफा हो रहा है।
-समीर कुमार, डीएफओ
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जिले में गंगा और रामगंगा के कटरी इलाकों में बहुतायत में ब्लैक बक पाए जाते हैं। इन्हीं इलाकों में शिकारी भी सक्रिय रहते हैं। हर तीन साल में एक बार वन विभाग वन्य जीवों की गणना कराता है। 2015 में वन्य जीवों की गणना पर गौर करें, तो जिले में ब्लैक बक की संख्या 1,097 है। हालांकि, इस गणना को अनुमानित माना जाता है, लेकिन पिछले एक साल में जिस तरह से ब्लैक बक के शिकार के मामले सामने आए हैं, वह चिंताजनक हैं। लगभग 16 ब्लैक बक शिकारियों के हाथों मारे गए हैं। गणना के मुताबिक हर साल 10 से 12 ब्लैक बक की प्राकृतिक कारणों से मौत हो जाती है। इस तरह यह संख्या 30 से 35 के बीच पहुंचती है। यह वे आंकड़ेे हैं, जो वन विभाग और पुलिस के रिकार्ड में दर्ज हैं। इसलिए यदि इनके संरक्षण की योजना नहीं बनी तो कटरी से ब्लैक बक एक दिन लुप्त हो जाएगा।
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दर्ज नहीं होते सभी मामले
दातागंज। दुर्लभ प्रजाति के ब्लैक बक के संरक्षण के उपाय नहीं किए जा रहे हैं। दातागंज में रामगंगा और अरिल नदी की कटरी में ब्लैक बक की संख्या सबसे ज्यादा है। दातागंज इलाके के गांव नगरिया अभय, जसमा, वनबौसारी, नैनामई, हजारा, नवीगंज, असधरमई ऐसे इलाके हैं, जहां सड़कों पर ब्लैक बक को घूमते हुए देखा जा सकता है। कुछ समय से इन इलाकों में भी शिकारी सक्रिय हो गए हैं। गौर करने वाली बात यह है कि ब्लैक बक के शिकार के तमाम मामलों में रिपोर्ट ही दर्ज नहीं होती। यहां गौर करने वाली बात यह भी है कि इन इलाकों के लोग भी ब्लैक बक के संरक्षण को लेकर गंभीर हैं। इस वजह से यहां ब्लैक बक की प्रजाति खुद को सुरक्षित महसूस करती है।
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खाल और सींग के लालच में हो रहा शिकार
दातागंज। ब्लैक बक का शिकार उनकी खाल और सींग के लालच में किया जाता है। इनकी खाल और सींग की अंतराष्ट्रीय बाजार में काफी मांग है। शिकार करने वालों के संबंध बड़े तस्करों से होते हैं। ब्लैक बक का शिकार करने के बाद शिकारी इनकी खाल और सींग तस्करों को बेच देते हैं। गौर करने वाली बात यह है कि एक तरफ जोधपुर में काला हिरन का शिकार करने के मामले में सिने अभिनेता समेत कई लोगों पर कोर्ट में मुकदमा चल रहा है, लेकिन यहां शिकारियों के खिलाफ कोई कार्रवाई अभी तक नहीं हुई है।
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दुर्घटना के भी शिकार होते हैं
दातागंज। अक्सर सड़क दुर्घटनाओं में भी ब्लैक बक की मौत हो जाती है। मौत के बाद पोस्टमार्टम कराके इतिश्री हो जाती है। बचाव के लिए उन क्षेत्रों में सड़कों के किनारे कटीली बाढ़ लगाई जा सकती है। यही नहीं गर्मी के दिनों में गांवों में भी इनके झुंड पहुंच जाते हैं, जहां आवारा कुत्तों का भी यह शिकार बन जाते हैं। सहसवान और ककराला के आसपास के क्षेत्र को ब्लैक बक छोड़ गए हैं। आम चर्चा है कि इन क्षेत्रों में इनका शिकार हो जाता था।
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हाल के दिनों में ब्लैक बक के शिकार के मामलों में कुछ इजाफा हुआ है। शिकारियों पर शिकंजा कसा जाएगा। वन विभाग अपने स्तर से दुर्लभ प्रजाति के इस वन्य जीव के संरक्षण की हर संभव कोशिश कर रहा है। संरक्षण की कोशिश के चलते ही ब्लैक बक की संख्या में इजाफा हो रहा है।
-समीर कुमार, डीएफओ