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40 एकड़ जमीन मिले तो  बने नया कृषि विज्ञान केंद्र

Thu, 30 Mar 2017 12:24 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो बदायूं।
अमर उजाला ब्यूरो बदायूं। Updated Thu, 30 Mar 2017 12:24 AM IST
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If you get 40 acres New Krishi Vigyan Kendra
भूमि की जरूरत - फोटो : अमर उजाला
केंद्र सरकार से स्वीकृत केंद्र की स्थापना के लिए नहीं मिल रही भूमि
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तीन तहसीलों ने मना किया, बदायूं और दातागंज से उम्मीद

जिले में नए कृषि विज्ञान केंद्र (केवीके) की स्थापना में जमीन रोड़ा बन रही है। केंद्र की स्थापना के लिए 40 एकड़ भूमि की जरूरत है। केंद्र सरकार से इस बारे में दिशा निर्देश मिलने पर डीएम के आदेश पर उप कृषि निदेशक आरपी चौधरी ने जिले के सभी एसडीएम को जमीन मुहैया कराने के लिए लिखा था। पांच तहसीलों में से बिल्सी, बिसौली और सहसवान तहसील प्रशासन ने जमीन मुहैया कराने में असमर्थता जताई है। हालांकि, अभी तहसील सदर और दातागंज की ओर से जमीन के संबंध में कोई जवाब नहीं आया है। 
बदायूं के उझानी में एक कृषि विज्ञान केंद्र पहले से है। भारतीय कृषि अनुसंधान केंद्र ने प्रदेश में वित्तीय वर्ष 2016-17 में सात नए कृषि विज्ञान केंद्रों को स्वीकृति दी थी। इनमें एक कृषि विज्ञान केंद्र की स्थापना बदायूं में भी होनी है। दिसंबर 2016 में केंद्र सरकार ने डीएम को पत्र भेजकर केंद्र की स्थापना को 40 एकड़ भूमि की व्यवस्था करने को कहा था। केवीके खुलने के बाद जिले के किसानों को नई तकनीकी से खेती की जानकारी मिलेगी। नई प्रजातियों के बीजों का भी विकास होगा। इससे किसानों की आर्थिक स्थिति में सुधार होगा। बदायूं की जलवायु में कौन सी फसल में किसानों को बेहतर उत्पादन मिलेगा इस बारे में भी कृषि विज्ञान केंद्र के जरिए प्रचार-प्रसार से लाभ मिलेगा। किसानों को किस तकनीक से फसल करने पर फायदा होगा यह भी आसानी से पता लग जाएगा।
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भारतीय कृषि अनुसंधान केंद्र ने बदायूं जिले में कृषि विज्ञान केंद्र की स्थापना को स्वीकृति दी है। इसकी स्थापना के लिए 40 एकड़ भूमि की जरूरत है। इस संबंध में सभी एसडीएम को लिखा गया है। बिसौली, बिल्सी और सहसवान एसडीएम ने जमीन होने से इंकार कर दिया है। सदर और दातागंज तहसील से अभी जवाब नहीं मिला है।
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-आरपी चौधरी, उप निदेशक कृषि
 
उझानी केवीके ने तो किसानों का जीवन बदल दिया
मृदा परीक्षण से लेकर प्रशिक्षण देने में भी अव्वल रहे वैज्ञानिक

बदायूं जिले के इकलौते कृषि विज्ञान केंद्र ने इलाके में खेती करने का तौर-तरीका ही बदल डाला। बुवाई से लेकर सिंचाई तक और फसल को कीट के प्रकोप से बचाने के लिए वैज्ञानिक पद्धति की वकालत कर किसानों को जागरूक करने का काम किया। मृदा परीक्षण हो या फिर फसल प्रदर्शनी हर तरह से किसानों को ही फायदा मिला।
नगर से सटे कछला रोड पर बने केंद्र की स्थापना वर्ष-1992 में हुई। उस वक्त स्थानीय केंद्र देश के पहले गोविंद बल्लभ पंत कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय से संबद्ध था। यूपी से अलग उत्तराखंड बनने के बाद वर्ष- 2000 में उझानी स्थित कृषि विज्ञान केंद्र को मेरठ के सरदार बल्लभ भाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्व विद्यालय से संबद्ध कर दिया गया। करीब 18 हेक्टेयर रकवा से जुड़े केंद्र पर ही बीज उत्पादन, मशरूम उत्पादन, मधुमक्खी पालन और किसानों को खेती के नये तौर-तरीके से अवगत कराने की सुविधा उपलब्ध है।

केंद्र प्रोग्राम कोआर्डिनेटर/ सह निदेशक डॉ. आरपी सिंह ने बताया कि वैज्ञानिकों ने इलाके के किसानों के उस ढर्रे को भी बदल डाला जो सालों पुराना था। फसलों से अच्छा उत्पादन कैसे लिया जाए और बुवाई से खेत की तैयारी किस तरह से करनी चाहिए, यह भी समझाया जाता रहा। किसानों को प्रशिक्षण देने, पढ़ाई छोड़ चुके युवाओं को कौशल विकास के तहत स्वरोजगार को प्रेरित करने से लेकर गांवों में फसल प्रदर्शनी लगाकर किसानों को फायदा पहुंचाया गया। मृदा परीक्षण प्रयोगशाला और जैव प्रौद्योगिकी प्रयोगशाला से भी किसानों को फायदा मिला है।
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