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एसएनसीयू में फैला इंफेक्शन, कराया फ्यूमीगेशन
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बदायूं। महिला अस्पताल के एसएनसीयू वार्ड में आखिरकार कई नवजात बच्चों में इंफेक्शन हो ही गया। इसकी वजह बच्चों की बढ़ती संख्या बताई जा रही है, जिससे उनमें एक जैसे लक्षण मिले। वो सुस्त हो गए थे, दूध नहीं पी रहे थे, उनकी सांसें तेज हो गई थीं और दिमागी बुखार के साथ उन्हें दौरे पड़ने शुरू हो गए थे। इससे निपटने के लिए एसएनसीयू वार्ड में फ्यूमीगेशन कराया गया है। साथ ही बच्चों को अच्छी दवाएं दी जा रहीं हैं, ताकि संक्रमण जल्द ही दूर हो।
एसएनसीयू पर पिछले दो माह से इंफेक्शन का खतरा मंडरा रहा था। 16 वार्मर पर नवजात बच्चों की संख्या दोगुनी हो गई थी। एक-एक वार्मर पर दो-दो बच्चों का इलाज किया जा रहा था। पिछले दो माह ऐसे गुजरे कि एसएनसीयू लगातार चर्चाओं में बना रहा। अच्छी दवाओं की हमेशा कमी रही तो कभी चिकित्सकों पर गंभीर आरोप लगे थे। पिछले दो माह के रिकॉर्ड के मुताबिक एसएनसीयू में करीब आठ-दस बच्चों की मौत हो चुकी है। अमर उजाला ने एसएनसीयू की बदइंतजामी पर पहले ही आगाह कर दिया था। इसके बावजूद स्वास्थ्य विभाग ने कोई ध्यान नहीं दिया।
नतीजा यह रहा है कि बच्चों में इंफेक्शन फैल गया। कई बच्चों में एक जैसे लक्षण दिखने लगे। उन्होंने दूध पीना बंद कर दिया, तेजी से सांसें चलने लगी, उनमें सुस्ती आने लगी और दिमागी बुखार से दौरे पड़ने लगे। यह देखकर एसएनसीयू के चिकित्सकों ने सैप्टिक स्क्रीनिंग टेस्ट कराया, जिससे बच्चों में इंफेक्शन होने की पुष्टि हुई। इससे अस्पताल प्रशासन में हड़कंप मच गया। एक दिन पहले एसएनसीयू में नवजात बच्चों को एक वार्ड से दूसरे वार्ड में शिफ्ट कराकर फ्यूमीगेशन कराया गया। पूरे वार्ड को अच्छी तरह से बैक्टीरिया मुक्त किया गया। तब कहीं उस वार्ड में बच्चों को शिफ्ट किया गया है।
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कलावा और कंगन पर लगाई रोग
-महिला अस्पताल के एसएनसीयू में कई स्टाफ नर्स तैनात हैं। उनके कलावा और कंगन, घड़ी आदि पहनने पर रोक लगा दी गई है। उन्हें बताया कि हाथ में कोई ऐसी चीज न पहने, जिससे बच्चों में इंफेक्शन फैलने का डर बना रहे। अंदर घुसते समय पहले अपने हाथों को अच्छी तरह से धो लेें।
बाहरी बच्चों का सेप्टिक स्क्रीनिंग टेस्ट अनिवार्य
-डॉ. संदीप वार्ष्णेय ने बताया कि बाहरी बच्चों से इंफेक्शन का खतरा ज्यादा रहता है। उनके परिवार वाले तरह-तरह के कपड़े में रखते हैं। एसएनसीयू में जो बच्चे बाहर से आ रहे हैं। उनका पहले सेप्टिक स्क्रीनिंग टेस्ट कराया जा रहा है, जिससे उनका इंफेक्शन दूसरे बच्चों में न फैले। इससे इस टेस्ट को अनिवार्य कर दिया गया है।
नवजात बच्चों की संख्यी घटी
-एसएनसीयू वार्ड में अब नवजात बच्चों की संख्या घटने लगी है। पिछले दो माह के दौरान बच्चों की संख्या 30-32 हो गई थी। सोलह वार्मर पर दो-दो बच्चों को भर्ती करना पड़ा था। अब धीरे-धीरे बच्चों की संख्या घटने लगी है। इस समय करीब 17 बच्चे भर्ती हैं।
कराया गया दवाओं और इंजेक्शन का इंतजाम
-पिछले समय दवाएं और इंजेक्शन न मिलने से बच्चों का सही तरह से इलाज नहीं हो पा रहा था। अस्पताल प्रशासन बाहर से दवाएं नहीं खरीद रहा था लेकिन इंफेक्शन फैलने के बाद स्वास्थ्य विभाग में खलबली मच गई। इससे अस्पताल प्रशासन ने बाहर से दवाओं और इंजेक्शन की खरीदारी शुरू कर दी है और इलाज भी शुरू कर दिया गया है।
बच्चों में एक जैसे लक्षण दिखने लगे थे। जब उनका सेप्टिक स्क्रीनिंग कराया गया तो उनमें इंफेक्शन की पुष्टि हुई। इंफेक्शन रोकने के लिए एसएनसीयू वार्ड में फ्यूमीगेशन कराया गया है, ताकि बैक्टीरिया खत्म हो सकें। बच्चों को अच्छी दवा दी जा रही है, जिससे उनमें जल्द सुधार आ सके।
-संदीप वार्ष्णेय, बाल रोग विशेषज्ञ एसएनसीयू
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एसएनसीयू पर पिछले दो माह से इंफेक्शन का खतरा मंडरा रहा था। 16 वार्मर पर नवजात बच्चों की संख्या दोगुनी हो गई थी। एक-एक वार्मर पर दो-दो बच्चों का इलाज किया जा रहा था। पिछले दो माह ऐसे गुजरे कि एसएनसीयू लगातार चर्चाओं में बना रहा। अच्छी दवाओं की हमेशा कमी रही तो कभी चिकित्सकों पर गंभीर आरोप लगे थे। पिछले दो माह के रिकॉर्ड के मुताबिक एसएनसीयू में करीब आठ-दस बच्चों की मौत हो चुकी है। अमर उजाला ने एसएनसीयू की बदइंतजामी पर पहले ही आगाह कर दिया था। इसके बावजूद स्वास्थ्य विभाग ने कोई ध्यान नहीं दिया।
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नतीजा यह रहा है कि बच्चों में इंफेक्शन फैल गया। कई बच्चों में एक जैसे लक्षण दिखने लगे। उन्होंने दूध पीना बंद कर दिया, तेजी से सांसें चलने लगी, उनमें सुस्ती आने लगी और दिमागी बुखार से दौरे पड़ने लगे। यह देखकर एसएनसीयू के चिकित्सकों ने सैप्टिक स्क्रीनिंग टेस्ट कराया, जिससे बच्चों में इंफेक्शन होने की पुष्टि हुई। इससे अस्पताल प्रशासन में हड़कंप मच गया। एक दिन पहले एसएनसीयू में नवजात बच्चों को एक वार्ड से दूसरे वार्ड में शिफ्ट कराकर फ्यूमीगेशन कराया गया। पूरे वार्ड को अच्छी तरह से बैक्टीरिया मुक्त किया गया। तब कहीं उस वार्ड में बच्चों को शिफ्ट किया गया है।
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कलावा और कंगन पर लगाई रोग
-महिला अस्पताल के एसएनसीयू में कई स्टाफ नर्स तैनात हैं। उनके कलावा और कंगन, घड़ी आदि पहनने पर रोक लगा दी गई है। उन्हें बताया कि हाथ में कोई ऐसी चीज न पहने, जिससे बच्चों में इंफेक्शन फैलने का डर बना रहे। अंदर घुसते समय पहले अपने हाथों को अच्छी तरह से धो लेें।
बाहरी बच्चों का सेप्टिक स्क्रीनिंग टेस्ट अनिवार्य
-डॉ. संदीप वार्ष्णेय ने बताया कि बाहरी बच्चों से इंफेक्शन का खतरा ज्यादा रहता है। उनके परिवार वाले तरह-तरह के कपड़े में रखते हैं। एसएनसीयू में जो बच्चे बाहर से आ रहे हैं। उनका पहले सेप्टिक स्क्रीनिंग टेस्ट कराया जा रहा है, जिससे उनका इंफेक्शन दूसरे बच्चों में न फैले। इससे इस टेस्ट को अनिवार्य कर दिया गया है।
नवजात बच्चों की संख्यी घटी
-एसएनसीयू वार्ड में अब नवजात बच्चों की संख्या घटने लगी है। पिछले दो माह के दौरान बच्चों की संख्या 30-32 हो गई थी। सोलह वार्मर पर दो-दो बच्चों को भर्ती करना पड़ा था। अब धीरे-धीरे बच्चों की संख्या घटने लगी है। इस समय करीब 17 बच्चे भर्ती हैं।
कराया गया दवाओं और इंजेक्शन का इंतजाम
-पिछले समय दवाएं और इंजेक्शन न मिलने से बच्चों का सही तरह से इलाज नहीं हो पा रहा था। अस्पताल प्रशासन बाहर से दवाएं नहीं खरीद रहा था लेकिन इंफेक्शन फैलने के बाद स्वास्थ्य विभाग में खलबली मच गई। इससे अस्पताल प्रशासन ने बाहर से दवाओं और इंजेक्शन की खरीदारी शुरू कर दी है और इलाज भी शुरू कर दिया गया है।
बच्चों में एक जैसे लक्षण दिखने लगे थे। जब उनका सेप्टिक स्क्रीनिंग कराया गया तो उनमें इंफेक्शन की पुष्टि हुई। इंफेक्शन रोकने के लिए एसएनसीयू वार्ड में फ्यूमीगेशन कराया गया है, ताकि बैक्टीरिया खत्म हो सकें। बच्चों को अच्छी दवा दी जा रही है, जिससे उनमें जल्द सुधार आ सके।
-संदीप वार्ष्णेय, बाल रोग विशेषज्ञ एसएनसीयू