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हिंदी राष्ट्र को एक सूत्र में पिरोने वाली भाषा
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राजकीय महिला डिग्री कॉलेज में हिंदी हैं हम अभियान के तहत हुई प्रतियोगिता में शामिल छात्राएं। सं?
- फोटो : BADAUN
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बदायूं। हिंदी हैं हम अभियान के तहत मंगलवार को राजकीय महिला महाविद्यालय में परिचर्चा हुई। इसमें छात्राओं और शिक्षिकाओं ने सहभागिता की। इस दौरान वक्ताओं ने हिन्दी को पूरे राष्ट्र को एक सूत्र में पिरोने वाली भाषा बताया।
कार्यक्रम का शुभारंभ प्राचार्य डॉ. स्मिता जैन ने किया। उन्होंने कहा कि हिंदी हमारी मातृ भाषा है। इसे हमेशा ध्यान रखना चाहिए। वहीं उन्होंने कहा कि महर्षि दयानंद गुजरात के थे। गुजराती और संस्कृत के प्रकांड विद्वान होते हुए भी उन्होंने हिंदी को पूरे राष्ट्र को एक सूत्र में पिरोने वाली भाषा बताया।
असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. वंदना ने कहा कि घरों में सेब और केले को अभिभावक बच्चों से एपल और बनाना कहलवाना पसंद करते हैं। अंग्रेजियत का प्रयोग शान समझी जाती है। इससे हम मातृभाषा से विमुख हो रहे हैं। अंग्रेजी भी सीखिए पर अपनी मातृभाषा को मत भूलिए। अन्यथा हिंदी और अंग्रेजी के मिले-जुले स्वरूप से उपजी नई भाषा आपको कहीं का नहीं छोड़ेगी। वहीं अधिकतर छात्राओं ने हिंदी के क्षेत्र में व्यापक रोजगार देने की वकालत की।
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ये बोलीं छात्राएं
हिंदी भाषा में आशा है। भाषा और संस्कृति किसी भी राष्ट्र की निधि है। हिंदी को विश्व भाषा का गौरव दिया जा चुका है। जिस तरह से जापान में जापानी, चीन में चीनी तो फिर हिंदुस्तान में हिंदी भाषा क्यों प्रभावी रूप से स्वीकार्य नहीं हो सकती? अंग्रेजी को देश पर जबरन थोपा गया है।
-धारणा, बीएससी द्वितीय वर्ष
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भारत बहुत सी भाषाओं को देश है, मगर हिंदी की अपनी प्रतिष्ठा है। हिंदी को ही राष्ट्रीय आंदोलन के लिए चुना गया। गुजरात में रहने वाले गांधीजी ने भी गुजराती नहीं बल्कि हिंदी भाषा को चुना। यह हिंदुस्तान की भाषा है। देश की स्वाधीनता के आंदोलन को हिंदी ने ही दिशा दी। यह जन-जन की भाषा है।
-अनामिका पटेल, बीए तृतीय वर्ष
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कार्यक्रम का शुभारंभ प्राचार्य डॉ. स्मिता जैन ने किया। उन्होंने कहा कि हिंदी हमारी मातृ भाषा है। इसे हमेशा ध्यान रखना चाहिए। वहीं उन्होंने कहा कि महर्षि दयानंद गुजरात के थे। गुजराती और संस्कृत के प्रकांड विद्वान होते हुए भी उन्होंने हिंदी को पूरे राष्ट्र को एक सूत्र में पिरोने वाली भाषा बताया।
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असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. वंदना ने कहा कि घरों में सेब और केले को अभिभावक बच्चों से एपल और बनाना कहलवाना पसंद करते हैं। अंग्रेजियत का प्रयोग शान समझी जाती है। इससे हम मातृभाषा से विमुख हो रहे हैं। अंग्रेजी भी सीखिए पर अपनी मातृभाषा को मत भूलिए। अन्यथा हिंदी और अंग्रेजी के मिले-जुले स्वरूप से उपजी नई भाषा आपको कहीं का नहीं छोड़ेगी। वहीं अधिकतर छात्राओं ने हिंदी के क्षेत्र में व्यापक रोजगार देने की वकालत की।
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ये बोलीं छात्राएं
हिंदी भाषा में आशा है। भाषा और संस्कृति किसी भी राष्ट्र की निधि है। हिंदी को विश्व भाषा का गौरव दिया जा चुका है। जिस तरह से जापान में जापानी, चीन में चीनी तो फिर हिंदुस्तान में हिंदी भाषा क्यों प्रभावी रूप से स्वीकार्य नहीं हो सकती? अंग्रेजी को देश पर जबरन थोपा गया है।
-धारणा, बीएससी द्वितीय वर्ष
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भारत बहुत सी भाषाओं को देश है, मगर हिंदी की अपनी प्रतिष्ठा है। हिंदी को ही राष्ट्रीय आंदोलन के लिए चुना गया। गुजरात में रहने वाले गांधीजी ने भी गुजराती नहीं बल्कि हिंदी भाषा को चुना। यह हिंदुस्तान की भाषा है। देश की स्वाधीनता के आंदोलन को हिंदी ने ही दिशा दी। यह जन-जन की भाषा है।
-अनामिका पटेल, बीए तृतीय वर्ष