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माननीय और अफसरों को अब मुफ्त नहीं मिलेंगी महंगे ब्रांडों की दवाएं
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बदायूं। शासन ने दवाओं की खरीद के बजट में 80 फीसदी कटौती कर दी है। ऐसे में जिलों के लिए अब एलपी (लोकल पर्चेज) को सिर्फ 20 प्रतिशत मिलेगा बजट। दवाओं और चिकित्सा उपयोग संबंधी अन्य सामानों की खरीद के लिए 80 फीसदी बजट उत्तर प्रदेश मेडिकल सप्लाई कारपोरेशन के जरिए दिया जाएगा। माननीयों, अधिकारियों और कर्मचारियों को भी अब लोकल पर्चेज के जरिए स्वास्थ्य विभाग दवाएं नहीं दे सकेगा। आदेश मिलने के बाद हाल ही में इसे अब जिला अस्पताल में भी लागू कर दिया गया है।
अब तक स्थानीय स्तर पर दवाओं की खरीद के लिए मोटा बजट मिलता था। स्थानीय स्तर पर माननीयों, अधिकारियों के साथ जिन कर्मचारियों को चिकित्सा प्रतिपूर्ति अनुमन्य है उनको भी इसका लाभ आसानी से मिल जाता था। हालांकि, यह बात अलग है कि जरूरतमंद और गरीबों को लोकल पर्चेज का लाभ कभी नहीं मिला। दरअसल, माननीय, अधिकारी और असरदार कर्मचारी सरकारी अस्पतालों में मिलने वाली दवाएं नहीं लेते थे। इनमें लिए बाजार से स्थानीय खरीद योजना के तहत महंगे ब्रांडों की दवाएं उपलब्ध कराई जाती थीं। इनमें सबसे ज्यादा तादाद विधायकों, पूर्व विधायकों, बड़े अधिकारियों, स्वास्थ्य विभाग और जजी के कर्मचारियों की है, लेकिन अब इनको इसका लाभ नहीं मिल सकेगा। लोकल पर्चेज के लिए मिलने वाले कुल बजट का अब सिर्फ 20 प्रतिशत बजट ही मिलेगा। बाकी बजट उत्तर प्रदेश मेडिकल सप्लाई कारपोरेशन को उपलब्ध कराया जाएगा। कारपोरेशन के जरिए ही दवाओं की खरीद की जाएगी। सरकारी अस्पतालों में लोकल पर्चेज की बढ़ती प्रवृत्ति को देखते हुए शासन ने यह कदम उठाया है। शासन की मंशा लोकल पर्चेज के बजट को न्यूनतम स्तर पर लाने की है। इसे जिला अस्पताल में भी लागू कर दिया गया है।
यह है लोकल पर्चेज
- स्थानीय स्तर पर जिला अस्पताल की ओर से किसी मेडिकल स्टोर से अनुबंध किया जाता है। जरूरत के मुताबिक साल भर इस मेडिकल स्टोर से महंगे ब्रांडों की दवाओं की खरीद की जाती है। वित्तीय वर्ष बदलने के साथ पुराना भुगतान कर दिया जाता है। कई बार लोकल पर्चेज साल में 40 लाख से भी ऊपर निकल जाती थी।
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यह है चिकित्सा प्रतिपूर्ति
ज्यादातर सरकारी विभाग अपने कर्मचारियों को चिकित्सा प्रतिपूर्ति देते हैं। कर्मचारी के बीमार होने पर अगर कर्मचारी जरूरत के अनुसार किसी निजी या सरकारी अस्पताल में इलाज कराता है और बाद में वह इलाज संबंधी क्लेम करता है, तो उसको विभाग की ओर से चिकित्सा पर आये खर्च का नियमानुसार भुगतान किया जाता है।
पूर्व विधायक और सीएमएस के बीच एलपी को लेकर हो चुकी तकरार
बदायूं। हाल ही में भाजपा के एक पूर्व विधायक और जिला अस्पताल के सीएमएस बीबी पुष्कर के बीच लोकल पर्चेज को लेकर तकरार हो गई थी। दरअसल, पूर्व विधायक निजी डॉक्टर द्वारा लिखी गईं दवाओं की लिस्ट लेकर सीएमएस के पास पहुंचे थे, लेकिन सीएमएस ने इन दवाओं की लोकल पर्चेज से इंकार कर दिया था। इसके बाद दोनों में तकरार हो गई थी। दोनों ने एक दूसरे पर अभद्रता का आरोप भी लगाया था। यह मामला काफी चर्चा में रहा था।
शासन ने लोकल पर्चेज के बजट में 80 फीसदी की कटौती की है। लोकल पर्चेज के लिए अब 20 फीसदी बजट की मिलेगा। बाकी बजट उत्तर प्रदेश मेडिकल सप्लाई कारपोरेशन को दिया जाएगा। स्थानीय खरीद के जरिये अब असरदार लोगों को दवाएं मिलना मुमकिन नहीं होंगी। आदेश मिलने के बाद इसे लागू कर दिया गया है।
- डॉ. मंजीत सिंह, सीएमओ
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अब तक स्थानीय स्तर पर दवाओं की खरीद के लिए मोटा बजट मिलता था। स्थानीय स्तर पर माननीयों, अधिकारियों के साथ जिन कर्मचारियों को चिकित्सा प्रतिपूर्ति अनुमन्य है उनको भी इसका लाभ आसानी से मिल जाता था। हालांकि, यह बात अलग है कि जरूरतमंद और गरीबों को लोकल पर्चेज का लाभ कभी नहीं मिला। दरअसल, माननीय, अधिकारी और असरदार कर्मचारी सरकारी अस्पतालों में मिलने वाली दवाएं नहीं लेते थे। इनमें लिए बाजार से स्थानीय खरीद योजना के तहत महंगे ब्रांडों की दवाएं उपलब्ध कराई जाती थीं। इनमें सबसे ज्यादा तादाद विधायकों, पूर्व विधायकों, बड़े अधिकारियों, स्वास्थ्य विभाग और जजी के कर्मचारियों की है, लेकिन अब इनको इसका लाभ नहीं मिल सकेगा। लोकल पर्चेज के लिए मिलने वाले कुल बजट का अब सिर्फ 20 प्रतिशत बजट ही मिलेगा। बाकी बजट उत्तर प्रदेश मेडिकल सप्लाई कारपोरेशन को उपलब्ध कराया जाएगा। कारपोरेशन के जरिए ही दवाओं की खरीद की जाएगी। सरकारी अस्पतालों में लोकल पर्चेज की बढ़ती प्रवृत्ति को देखते हुए शासन ने यह कदम उठाया है। शासन की मंशा लोकल पर्चेज के बजट को न्यूनतम स्तर पर लाने की है। इसे जिला अस्पताल में भी लागू कर दिया गया है।
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यह है लोकल पर्चेज
- स्थानीय स्तर पर जिला अस्पताल की ओर से किसी मेडिकल स्टोर से अनुबंध किया जाता है। जरूरत के मुताबिक साल भर इस मेडिकल स्टोर से महंगे ब्रांडों की दवाओं की खरीद की जाती है। वित्तीय वर्ष बदलने के साथ पुराना भुगतान कर दिया जाता है। कई बार लोकल पर्चेज साल में 40 लाख से भी ऊपर निकल जाती थी।
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यह है चिकित्सा प्रतिपूर्ति
ज्यादातर सरकारी विभाग अपने कर्मचारियों को चिकित्सा प्रतिपूर्ति देते हैं। कर्मचारी के बीमार होने पर अगर कर्मचारी जरूरत के अनुसार किसी निजी या सरकारी अस्पताल में इलाज कराता है और बाद में वह इलाज संबंधी क्लेम करता है, तो उसको विभाग की ओर से चिकित्सा पर आये खर्च का नियमानुसार भुगतान किया जाता है।
पूर्व विधायक और सीएमएस के बीच एलपी को लेकर हो चुकी तकरार
बदायूं। हाल ही में भाजपा के एक पूर्व विधायक और जिला अस्पताल के सीएमएस बीबी पुष्कर के बीच लोकल पर्चेज को लेकर तकरार हो गई थी। दरअसल, पूर्व विधायक निजी डॉक्टर द्वारा लिखी गईं दवाओं की लिस्ट लेकर सीएमएस के पास पहुंचे थे, लेकिन सीएमएस ने इन दवाओं की लोकल पर्चेज से इंकार कर दिया था। इसके बाद दोनों में तकरार हो गई थी। दोनों ने एक दूसरे पर अभद्रता का आरोप भी लगाया था। यह मामला काफी चर्चा में रहा था।
शासन ने लोकल पर्चेज के बजट में 80 फीसदी की कटौती की है। लोकल पर्चेज के लिए अब 20 फीसदी बजट की मिलेगा। बाकी बजट उत्तर प्रदेश मेडिकल सप्लाई कारपोरेशन को दिया जाएगा। स्थानीय खरीद के जरिये अब असरदार लोगों को दवाएं मिलना मुमकिन नहीं होंगी। आदेश मिलने के बाद इसे लागू कर दिया गया है।
- डॉ. मंजीत सिंह, सीएमओ