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Budaun News: रुहेलाओं से सिरविहीन ककोड़ा देवी का हुआ था युद्ध

Fri, 24 Oct 2025 01:12 AM IST
Bareily Bureau बरेली ब्यूरो
Updated Fri, 24 Oct 2025 01:12 AM IST
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Headless Kakora Devi fought with the Rohillas.
ककोड़ा देवी मंदिर जिनके नाम से लगता है ककोड़ा मेला। संवाद - फोटो : स्रोत प्रशासन
कादरचौक। रुहेलखंड मंडल का मिनी कुंभ से जाना जाने वाला ककोड़ा मेला साढे़ पांच सौ साल से भी अधिक पुराने इतिहास को समेटे हुए हुए है। कहा जाता है कि इलाके में वर्चस्व के लिए जब रुहेलाओं ने आक्रमण किया तो ककोड़ा देवी ने उनसे जनमानस की रक्षा की।
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रुहेलाओं को लगा कि देवी साक्षात रूप में उनसे लड़ रही हैं। उनका सिर भी धड़ से अलग हो गया, उसके बाद भी वह लड़ती रहीं। इससे रुहेला भयाक्रांत हो गए और हार मानकर भाग खड़े हुए। ककोड़ा गांव में आज भी सिर कटी देवी का मंदिर है। इस मंदिर में उनका सिर धड़ से अलग रखा है।
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बताते कि अफगानिस्तान के रूह इलाके से 18वीं सदी के प्रारंभ में दाऊद खां नामक व्यापारी अपने साथियों के साथ यहां घोड़ों का व्यापार करने आया था। व्यापार में सफल न होने पर इन लोगों ने स्थानीय जमींदारों की सेना में नौकरी कर ली। जब इनकी संख्या तीन-चार सौ हो गई तो दाऊद खां के बेटे अली मोहम्मद खां ने छोटे जमीदारों को परास्त कर अपने अधीन कर लिया। उसी वक्त दिल्ली के बादशाह मोहम्मद शाह ने अली मोहम्मद खां को नवाब का दर्जा दे दिया।
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वर्ष 1749 में अली मोहम्मद खां के इंतकाल के बाद रुहेलखंड के सभी जिलों को उनके छह बेटों और अन्य सरदारों में बांट दिया गया। उझानी और उसके आसपास का इलाका नवाब के बड़े बेटे मोहम्मद अब्दुल्ला के हिस्से में आया। वह वहीं पर कोठी बनाकर रहने लगे। सर्प पालने व शिकार करने के शौकीन नवाब अब्दुल्ला कुष्ठ रोग से पीड़ित हो गए। बताते हैं उन दिनों गंगा ककोड़ा देवी मंदिर के पास से बहती थीं। वहीं पर उनकी मुलाकात ध्यान मुनि नाम के संत से हुई।
ध्यान मुनि के आदेश पर अब्दुल्ला ने गंगा में स्नान किया और ककोड़ देवी का नियमित दर्शन शुरू किया। थोड़े ही दिन में नवाब का कुष्ठ रोग ठीक हो गया। गंगा एवं ककोड़ा देवी के इस चमत्कार से प्रभावित होकर नवाब ने वहां मेला लगवाना शुरू किया। इसमें पूरे रुहेलखंड से लोग मेले में आकर गंगा किनारे प्रवास करने लगे। कालांतर में यही मेला ककोड़ा मेला के नाम से विख्यात हुआ। मंदिर परिसर में ही बने बरगद के नीचे कुएं में रुहेलाओं के शस्त्र दबे हैं।



मुगलों के बाद अंग्रेजों ने लगवाया मेला
मुगल शासन के बाद अंग्रेजों ने मेला ककोड़ा को और भव्यता के साथ लगवाना शुरू किया। इसके लिए अंग्रेजों ने 1937 में कादरचौक थाने के सामने मेला का सामान रखने के लिए तीन बड़े गोदाम बनवाए थे। इसमें तत्कालीन जिला बोर्ड चेयरमैन चौधरी बदन सिंह के नाम का शिलापट आज भी लगा है। हालांकि अब गोदाम जीर्णशीर्ण अवस्था में है। आजादी के बाद मेला बेसिक शिक्षा विभाग ने लगावाया। उसके बाद जिला प्रशासन की ओर से मेले का आयोजन किया गया। अब जिला पंचायत मेला लगवाती है।




हाईकोर्ट में भी पहुंच चुका है मेले का मामला
साल 1965 में मेला उझानी क्षेत्र के पलिया में लगा था। बताते हैं कि तत्कालीन मंत्री स्व. श्रीकृष्ण गोयल ने राजनीतिक प्रभाव से मेले को उझानी क्षेत्र में लगवाया। इस पर नूरपुर निवासी छम्मन मियां, पंडित सोनपाल द्विवेदी और ककोड़ा के तत्कालीन प्रधान देवीराम ने हाईकोर्ट में रिट दायर कर दी। हाईकोर्ट ने आदेश दिया कि मेला ककोड़ देवी मंदिर क्षेत्र में ही लगेगा। आवागमन मुख्य मार्ग कादरचौक से होकर रहेगा। उस साल मेला दो जगह लगा था। इसके बाद हाईकोर्ट के आदेश के अनुपालन में मेला ककोड़ा क्षेत्र में ही लगाया जाने लगा। वर्तमान में मेला कासगंज जिले की भूमि पर लगता है लेकिन आयोजन जिला पंचायत बदायूं ही करती है।






ककोड़ा मेला को मिले राजकीय मेले का दर्जा : नन्हेदास
ककोड़ा गांव निवासी महंत नन्हेदास का कहना है कि ककोड़ा मेला को आज तक राजकीय मेले का दर्जा नहीं मिल सका है। नेताओं को इस बारे में सोचना चाहिए। राजकीय मेला घोषित कराने को उनके प्रयास जारी रहेंगे।





देवी मंदिर में चल रहा सौंदर्यीकरण का कार्य
ककोड़ा देवी मंदिर के महंत धर्मगिरि ने कहा है कि अति प्राचीन मेला है जो मिनी कुंभ के नाम से जाना जाता है, लेकिन यहां कुंभ जैसी सुविधाएं नहीं मिलतीं। देवी मंदिर को सरकारी सहायता मिली है। सौंदर्यीकरण के लिए काम चल रहा है।




हर वर्ष की भांति प्रवास करेंगे साधु-संत
दिउचरी आश्रम के मधुसूदनाचार्य ने कहा है कि साधु संतों कार्तिक मास में गंगा प्रवास करते हैं। वह हर वर्ष की भांति अपने साधु-संतों के साथ गंगा किनारे प्रवास करेंगे। भंडारे का आयोजन भी जारी रहेगा।

ककोड़ा देवी मंदिर जिनके नाम से लगता है ककोड़ा मेला। संवाद

ककोड़ा देवी मंदिर जिनके नाम से लगता है ककोड़ा मेला। संवाद- फोटो : स्रोत प्रशासन

ककोड़ा देवी मंदिर जिनके नाम से लगता है ककोड़ा मेला। संवाद

ककोड़ा देवी मंदिर जिनके नाम से लगता है ककोड़ा मेला। संवाद- फोटो : स्रोत प्रशासन

ककोड़ा देवी मंदिर जिनके नाम से लगता है ककोड़ा मेला। संवाद

ककोड़ा देवी मंदिर जिनके नाम से लगता है ककोड़ा मेला। संवाद- फोटो : स्रोत प्रशासन

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