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गंगा में बढ़ा डॉल्फिन और दुर्लभ प्रजाति के कछुओं का कुनबा
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बदायूं। गंगा में राष्ट्रीय जलीय जीव डॉल्फिन का कुनबा तेजी से बढ़ रहा है। वर्ल्ड वाइल्ड फंड (डब्ल्यूडब्ल्यूएफ) और वन विभाग के संयुक्त सर्वे में कछला से अटैना घाट तक नौ स्थानों पर डॉल्फिन मिली हैं। अब इनकी गणना की जाएगी। इससे पहले 2015 में नरौरा से कानपुर तक सर्वे किया गया था। उस दौरान गंगा में गहराई वाले सिर्फ चार स्थानों पर डॉल्फिन का बसेरा पाया गया था। इसके अलावा दुर्लभ प्रजाति के कछुओं की चार प्रजातियां भी मिली हैं। इस बार सर्वे में केवल बदायूं की सीमा के भीतर ही नौ स्थानों पर डॉल्फिन का बसेरा मिलने के बाद वन विभाग और जीवजंतु प्रेमी खुश हैं।
अंतराष्ट्रीय स्तर पर काम करने वाली संस्था डब्ल्यूडब्ल्यूएफ दुर्लभ और संरक्षित प्रजातियों की गणना करती है। पिछले दिनों जिले में कछला गंगा घाट से लेकर उसहैत थाना क्षेत्र में आने वाले अटैना गंगा घाट तक डब्ल्यूडब्ल्यूएफ और वन विभाग की टीमों ने गंगा में डॉल्फिन की तलाश के लिए संयुक्त सर्वे शुरू किया था। कई दिनों तक चले इस सर्वे की रिपोर्ट आ गई है। कछला से अटैना घाट तक गंगा में गहराई वाले नौ स्थानों पर डॉल्फिन मिली हैं। डॉल्फिन की गणना में इस बार जीपीएस का इस्तेमाल किया गया। जिन स्थानों पर गंगा में डॉल्फिन दिखी हैं, उन स्थानों को जीपीएस से चिह्नित किया गया है। डॉल्फिन की संख्या बढ़ने से वर्ल्ड वाइल्ड फंड की टीम गदगद है। वर्ल्ड वाइल्ड फंड और वन विभाग के विशेषज्ञों का मानना है कि गंगा में डॉल्फिन को अनुकूल वातावरण मिल रहा है। आने वाले समय में डॉल्फिन की संख्या और बढ़ेगी। जिन स्थानों पर गंगा में डॉल्फिन देखी गई हैं अब वहां इनकी गणना का काम किया जाएगा। इसके बाद साफ हो जाएगा कि जिले में कुल कितनी डॉल्फिन हैं। इसके अलावा गंगा के इस एरिया में कछुआ की चार प्रजातियां भी मिली हैं। यह प्रजातियां भी दुर्लभ श्रेणी में आती हैं। कुछ स्थानों पर दुर्लभ प्रजाति के कछुओं के अंडे भी देखे गए हैं। जानकारों का कहना है कि कछुआ प्रजनन कर रहे हैं जिससे आने वाले दिनों में इनकी संख्या में और इजाफा होगा। डॉल्फिन और कछुओं के संरक्षण के लिए प्रोजेक्ट पर काम किया जा रहा है। गंगा के आसपास के लोगों को इन दुर्लभ प्रजाति के जलीय जीवों के संरक्षण को लेकर जागरूक किया जा रहा है।
दुर्लभ जलीय जीव तरंगों से करता है शिकार
- गंगा में पाई जाने वाली डॉल्फिन विश्व की डॉल्फिन प्रजातियों में से एक है। गंगा के अलावा यह जलीय जीव ब्रह्मपुत्र, मेघना, सिंध नदी में भी पाई जाती हैं। ये नदी की सतह पर आकर सांस लेती हैं। सांस लेने के वक्त होने वाली ध्वनि के कारण इन्हें सूंस नाम दिया गया है। डॉल्फिन के आखें नहीं होतीं और यह काफी समझार जलीय जीव है। यह तरंगों से शिकार करती हैं। दुर्लभ प्रजाति के इस जलीय जीव को राष्ट्रीय जलीय जीव का दर्जा प्राप्त है। इसके बाद भी इसके संरक्षण के कोई ठोस इंतजाम हमारे जिले में नहीं हैं।
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डॉल्फिन का कुनबा गंगा में गहराई वाले स्थानों पर
- कछला से अटैना घाट तक गंगा में जिन नौ स्थानों पर डॉल्फिन को देखा गया है वह सभी गहराई वाले स्थान हैं। वन विभाग के जानकारों का कहना है कि डॉल्फिन गहराई वाले स्थानों पर ही रहती है। सांस लेने के लिए जब यह जल की सतह के ऊपर आती हैं तो सतह से ऊपर 20 फीट तक की जंप लगाती हैं। इस दौरान सांस लेती हैं और फिर से पानी के अंदर चली जाती हैं। गंगा में कछला से अटैना घाट तक कुछ ही स्थान ऐसे हैं जहां गंगा की गहराई डॉल्फिन के प्रति अनुकूल है।
डब्ल्यूडब्ल्यूएफ और वन विभाग की संयुक्त टीम ने गंगा में कछला से अटैना तक सर्वे किया है। इस दौरान इस इलाके में नौ स्थानों पर राष्ट्रीय जलीय जीव डॉल्फिन के परिवार पाए गए हैं। इसके अलावा दुर्लभ प्रजाति के कछुओं की चार प्रजातियां भी पाई गई हैं। गंगा में अब डॉल्फिन की गणना की जाएगी। इससे पहले 2015 में सर्वे के दौरान कछला से कानपुर तक चार स्थान स्थानों डॉल्फिन पाई गई थीं। गंगा में डॉल्फिन की बढ़ती संख्या अच्छे संकेत हैं। - विवेक कुमार गुप्ता, प्रभारी डीएफओ
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अंतराष्ट्रीय स्तर पर काम करने वाली संस्था डब्ल्यूडब्ल्यूएफ दुर्लभ और संरक्षित प्रजातियों की गणना करती है। पिछले दिनों जिले में कछला गंगा घाट से लेकर उसहैत थाना क्षेत्र में आने वाले अटैना गंगा घाट तक डब्ल्यूडब्ल्यूएफ और वन विभाग की टीमों ने गंगा में डॉल्फिन की तलाश के लिए संयुक्त सर्वे शुरू किया था। कई दिनों तक चले इस सर्वे की रिपोर्ट आ गई है। कछला से अटैना घाट तक गंगा में गहराई वाले नौ स्थानों पर डॉल्फिन मिली हैं। डॉल्फिन की गणना में इस बार जीपीएस का इस्तेमाल किया गया। जिन स्थानों पर गंगा में डॉल्फिन दिखी हैं, उन स्थानों को जीपीएस से चिह्नित किया गया है। डॉल्फिन की संख्या बढ़ने से वर्ल्ड वाइल्ड फंड की टीम गदगद है। वर्ल्ड वाइल्ड फंड और वन विभाग के विशेषज्ञों का मानना है कि गंगा में डॉल्फिन को अनुकूल वातावरण मिल रहा है। आने वाले समय में डॉल्फिन की संख्या और बढ़ेगी। जिन स्थानों पर गंगा में डॉल्फिन देखी गई हैं अब वहां इनकी गणना का काम किया जाएगा। इसके बाद साफ हो जाएगा कि जिले में कुल कितनी डॉल्फिन हैं। इसके अलावा गंगा के इस एरिया में कछुआ की चार प्रजातियां भी मिली हैं। यह प्रजातियां भी दुर्लभ श्रेणी में आती हैं। कुछ स्थानों पर दुर्लभ प्रजाति के कछुओं के अंडे भी देखे गए हैं। जानकारों का कहना है कि कछुआ प्रजनन कर रहे हैं जिससे आने वाले दिनों में इनकी संख्या में और इजाफा होगा। डॉल्फिन और कछुओं के संरक्षण के लिए प्रोजेक्ट पर काम किया जा रहा है। गंगा के आसपास के लोगों को इन दुर्लभ प्रजाति के जलीय जीवों के संरक्षण को लेकर जागरूक किया जा रहा है।
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दुर्लभ जलीय जीव तरंगों से करता है शिकार
- गंगा में पाई जाने वाली डॉल्फिन विश्व की डॉल्फिन प्रजातियों में से एक है। गंगा के अलावा यह जलीय जीव ब्रह्मपुत्र, मेघना, सिंध नदी में भी पाई जाती हैं। ये नदी की सतह पर आकर सांस लेती हैं। सांस लेने के वक्त होने वाली ध्वनि के कारण इन्हें सूंस नाम दिया गया है। डॉल्फिन के आखें नहीं होतीं और यह काफी समझार जलीय जीव है। यह तरंगों से शिकार करती हैं। दुर्लभ प्रजाति के इस जलीय जीव को राष्ट्रीय जलीय जीव का दर्जा प्राप्त है। इसके बाद भी इसके संरक्षण के कोई ठोस इंतजाम हमारे जिले में नहीं हैं।
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डॉल्फिन का कुनबा गंगा में गहराई वाले स्थानों पर
- कछला से अटैना घाट तक गंगा में जिन नौ स्थानों पर डॉल्फिन को देखा गया है वह सभी गहराई वाले स्थान हैं। वन विभाग के जानकारों का कहना है कि डॉल्फिन गहराई वाले स्थानों पर ही रहती है। सांस लेने के लिए जब यह जल की सतह के ऊपर आती हैं तो सतह से ऊपर 20 फीट तक की जंप लगाती हैं। इस दौरान सांस लेती हैं और फिर से पानी के अंदर चली जाती हैं। गंगा में कछला से अटैना घाट तक कुछ ही स्थान ऐसे हैं जहां गंगा की गहराई डॉल्फिन के प्रति अनुकूल है।
डब्ल्यूडब्ल्यूएफ और वन विभाग की संयुक्त टीम ने गंगा में कछला से अटैना तक सर्वे किया है। इस दौरान इस इलाके में नौ स्थानों पर राष्ट्रीय जलीय जीव डॉल्फिन के परिवार पाए गए हैं। इसके अलावा दुर्लभ प्रजाति के कछुओं की चार प्रजातियां भी पाई गई हैं। गंगा में अब डॉल्फिन की गणना की जाएगी। इससे पहले 2015 में सर्वे के दौरान कछला से कानपुर तक चार स्थान स्थानों डॉल्फिन पाई गई थीं। गंगा में डॉल्फिन की बढ़ती संख्या अच्छे संकेत हैं। - विवेक कुमार गुप्ता, प्रभारी डीएफओ