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Budaun News: ब्रज प्रदेश में दूसरों को जीत की राह दिखाने वाले दुर्विजय शाक्य बदायूं में हो गए फेल
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उझानी। बदायूं लोकसभा सीट से भाजपा प्रत्याशी दुर्विजय शाक्य की हार ने कई ऐसे सवाल खड़े कर दिए हैं, जिन पर आने वाले दिनों में भाजपा के चुनावी रणनीतिकार मंथन जरूर करेंगे। करेंगे भी क्यों नहीं, उनके प्रत्याशी संगठन में ब्रज प्रदेश के संगठन अध्यक्ष भी थे। चूक किस स्तर पर हो गई, हार की असल वजह क्या रही, यह खुलकर भले ही सामने नहीं आ पाए, लेकिन हकीकत पर गौर जरूर होगा।
सपा के राष्ट्रीय महासचिव शिवपाल यादव के बेटे आदित्य यादव के सामने हार का सामना करने वाले भाजपा के दुर्विजय शाक्य के बारे में भाजपा ने चुनाव प्रचार के दौरान साफ कर दिया था कि यही स्थानीय प्रत्याशी हैं। आदित्य को तो बाहरी करार दे दिया था। स्थानीय होने के नाते भाजपा प्रत्याशी और उनके रणनीतिकारों को स्थानीय स्तर के ही जिन मुद्दों को प्रमुखता से उठाना चाहिए था, उनमें विकास, महंगाई, छुट्टा पशुओं से किसानों को दिक्कत, बेरोजगारी, देहात क्षेत्र में सड़कों की मौजूदा स्थिति से लेकर चिकित्सकीय सेवाओं में खामियों पर छूने की कोशिश ही नहीं की गई थी। दूसरा यह कि कार्यकर्ताओं में भी पिछले दो लोकसभा चुनाव की तरह जोश नजर नहीं आया। इसका सीधा असर मतदान के प्रतिशत के गिरावट के रूप में सामने आया था।
दरअसल, भाजपा के दुर्विजय शाक्य को जिन दिनों बदायूं सीट से भाजपा ने प्रत्याशी घोषित किया, तब जिले में धारणा बनी कि वह खुद को संगठन का कुशल शिल्पकार साबित करने में किसी भी स्तर पर कमी नहीं छोड़ेंगे। फिर भी किसी स्तर पर चूक हो ही गई। वैसे, भाजपा प्रत्याशी के रूप में उन्हें जिले के संगठन से लेकर केंद्रीय सहकारिता राज्यमंत्री बीएल वर्मा, बिल्सी के विधायक हरीश शाक्य, बदायूं सदर से विधायक महेश चंद्र गुप्ता से सहयोग भी कम नहीं मिला। शुरूआत में सांसद संघमित्रा मौर्य भी उनके साथ दिखाई पड़ती रहीं। केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह, प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ, मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री मोहन यादव, उत्तराखंड के सीएम पुष्कर सिंह धामी और प्रदेश अध्यक्ष भूपेंद्र चौधरी आदि ने बड़े नेताओं ने जिले में आकर चुनावी सभाएं भी की थीं।
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सपा की जीत में अहम रहा एमवाई फैक्टर
वर्ष- 2019 में भतीजे धर्मेंद्र यादव की बदायूं लोकसभा सीट से हार का बदला लेने के लिए सपा ने कई बार अपनी रणनीति बदली। पहली बार तो धर्मेंद्र यादव को ही प्रत्याशी घोषित कर दिया गया था। इसके बाद माहौल बदला तो पार्टी ने राष्ट्रीय महासचिव शिवपाल यादव को मैदान में उतार दिया। वह बदायूं पहुंचे तो उन्होंने चुनाव प्रचार कम, बल्कि जिले के मौजूदा हालात पर ज्यादा गौर किया। शिवपाल यादव, जिस विधानसभा क्षेत्र में सम्मेलन करने पहुंचते, बेटे आदित्य यादव उनके साथ दिखते। इस दौरान उन्होंने सपा से रूठे नेताओं में खासकर पूर्व केंद्रीय मंत्री सलीम शेरवानी और पूर्व दर्जा राज्यमंत्री आबिद रजा को मना लिया। यही नहीं, बिल्सी से बसपा के पूर्व विधायक हाजी बिट्टन भी उनके साथ आ गए। मुस्लिम (एम) के बाद वाई (यादव) नेताओं में जो गुटबंदी के शिकार थे, वह भी एक ही प्लेटफार्म पर आ गए तो आदित्य यादव को प्रत्याशी घोषित कराके बदायूं से बेड़ापार कर लिया।
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सपा के राष्ट्रीय महासचिव शिवपाल यादव के बेटे आदित्य यादव के सामने हार का सामना करने वाले भाजपा के दुर्विजय शाक्य के बारे में भाजपा ने चुनाव प्रचार के दौरान साफ कर दिया था कि यही स्थानीय प्रत्याशी हैं। आदित्य को तो बाहरी करार दे दिया था। स्थानीय होने के नाते भाजपा प्रत्याशी और उनके रणनीतिकारों को स्थानीय स्तर के ही जिन मुद्दों को प्रमुखता से उठाना चाहिए था, उनमें विकास, महंगाई, छुट्टा पशुओं से किसानों को दिक्कत, बेरोजगारी, देहात क्षेत्र में सड़कों की मौजूदा स्थिति से लेकर चिकित्सकीय सेवाओं में खामियों पर छूने की कोशिश ही नहीं की गई थी। दूसरा यह कि कार्यकर्ताओं में भी पिछले दो लोकसभा चुनाव की तरह जोश नजर नहीं आया। इसका सीधा असर मतदान के प्रतिशत के गिरावट के रूप में सामने आया था।
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दरअसल, भाजपा के दुर्विजय शाक्य को जिन दिनों बदायूं सीट से भाजपा ने प्रत्याशी घोषित किया, तब जिले में धारणा बनी कि वह खुद को संगठन का कुशल शिल्पकार साबित करने में किसी भी स्तर पर कमी नहीं छोड़ेंगे। फिर भी किसी स्तर पर चूक हो ही गई। वैसे, भाजपा प्रत्याशी के रूप में उन्हें जिले के संगठन से लेकर केंद्रीय सहकारिता राज्यमंत्री बीएल वर्मा, बिल्सी के विधायक हरीश शाक्य, बदायूं सदर से विधायक महेश चंद्र गुप्ता से सहयोग भी कम नहीं मिला। शुरूआत में सांसद संघमित्रा मौर्य भी उनके साथ दिखाई पड़ती रहीं। केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह, प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ, मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री मोहन यादव, उत्तराखंड के सीएम पुष्कर सिंह धामी और प्रदेश अध्यक्ष भूपेंद्र चौधरी आदि ने बड़े नेताओं ने जिले में आकर चुनावी सभाएं भी की थीं।
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सपा की जीत में अहम रहा एमवाई फैक्टर
वर्ष- 2019 में भतीजे धर्मेंद्र यादव की बदायूं लोकसभा सीट से हार का बदला लेने के लिए सपा ने कई बार अपनी रणनीति बदली। पहली बार तो धर्मेंद्र यादव को ही प्रत्याशी घोषित कर दिया गया था। इसके बाद माहौल बदला तो पार्टी ने राष्ट्रीय महासचिव शिवपाल यादव को मैदान में उतार दिया। वह बदायूं पहुंचे तो उन्होंने चुनाव प्रचार कम, बल्कि जिले के मौजूदा हालात पर ज्यादा गौर किया। शिवपाल यादव, जिस विधानसभा क्षेत्र में सम्मेलन करने पहुंचते, बेटे आदित्य यादव उनके साथ दिखते। इस दौरान उन्होंने सपा से रूठे नेताओं में खासकर पूर्व केंद्रीय मंत्री सलीम शेरवानी और पूर्व दर्जा राज्यमंत्री आबिद रजा को मना लिया। यही नहीं, बिल्सी से बसपा के पूर्व विधायक हाजी बिट्टन भी उनके साथ आ गए। मुस्लिम (एम) के बाद वाई (यादव) नेताओं में जो गुटबंदी के शिकार थे, वह भी एक ही प्लेटफार्म पर आ गए तो आदित्य यादव को प्रत्याशी घोषित कराके बदायूं से बेड़ापार कर लिया।