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खुद को तपाकर मां ने जीवन संवार दिया...
बदायूं, ब्यूरो
Updated Sun, 08 May 2016 12:00 AM IST
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ममता का पर्याय कही जाने वाली मां जीवन भर खुद को तपाकर अपने बच्चों का जीवन संवारती है। एक मां ही होती है, जो बच्चे के जन्म के बाद से खुद को गीले बिस्तर पर सुलाती है, जिससे बच्चे को अच्दे से नींद आ सके। वो लोरी सुनाती है, दुलारती है, स्नेह बरसाती है। कोमल होने के बावजूद भी विषम परिस्थतियों में मां न सिर्फ मां का प्यार देती है, बल्कि की पिता की सुरक्षा महसूस कराती है। खुद तंगहाली में जीकर बच्चों को पालन पोषण करती है।
ऐसी ही एक मां हैं प्रेमवती, जो मृतक आश्रित के रूप में रोडवेज डिपो में चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी के रूप में कार्य कर रही हैं। अब वह बुढ़ापे की दहलीज पर कदम रख चुकी हैं, लेकिन उनके संघर्ष अब भी जारी हैं। इनके संघर्ष की कहानी करीब साढ़े 30 साल पहले शुरू होती है, जब इनके पति मदनलाल की मौत 26 अक्तूबर 1989 में बीमारी की वजह से हो जाती है। रोडवेज डिपो में चौकीदार पद पर कार्यरत पति की नौकरी पाने की जद्दोजद के साथ चार बेटियों और एक बेटे के पालन पोषण की जिम्मेदारी भी उनके कंधों पर आ गई।
प्रेमवती ने काफी भागदौड़ करने के बाद मृतक आश्रित में नौकरी तो पा ली, लेकिन सहसवान रोजाना रोडवेज डिपो पर नौकरी के लिए आना और फिर जाना। उसके साथ ही बच्चों का पालन पोषण करना सो अलग। इन जिम्मेदारियों को एक साथ निभाते हुए कभी प्रेमवती थकी, कभी परेशान हुईं, लेकिन हार कभी नहीं मानी। बेटी ऊषा, गीता, पूनम, पिंकी और बेटे सूरजपाल को पढ़ाकर जीवन यापन करने के काबिल बनाया।
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बेटे-बेटियों की शादी विवाह के बावजूद अपनी जिंदगी जीने का मौका प्रेमवती को नहीं मिल सका। बड़ी बेटी की मौत के बाद उनकी दो बेटियों और एक बेटे को पालने की जिम्मेदारी खुद ले ली। बड़ी नातिन की शादी कराने के बाद एक नाती और एक नातिन की जिंदगी संवारने में खुद लगाए हुए हैं। अब वह शहर के पनवडिय़ा मोहल्ले में किराए के मकान में रह रहे हैं। उम्र के इस पड़ाव में खुद का मकान बनाने की ख्वाहिश अधूरी रह गई।
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ऐसी ही एक मां हैं प्रेमवती, जो मृतक आश्रित के रूप में रोडवेज डिपो में चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी के रूप में कार्य कर रही हैं। अब वह बुढ़ापे की दहलीज पर कदम रख चुकी हैं, लेकिन उनके संघर्ष अब भी जारी हैं। इनके संघर्ष की कहानी करीब साढ़े 30 साल पहले शुरू होती है, जब इनके पति मदनलाल की मौत 26 अक्तूबर 1989 में बीमारी की वजह से हो जाती है। रोडवेज डिपो में चौकीदार पद पर कार्यरत पति की नौकरी पाने की जद्दोजद के साथ चार बेटियों और एक बेटे के पालन पोषण की जिम्मेदारी भी उनके कंधों पर आ गई।
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प्रेमवती ने काफी भागदौड़ करने के बाद मृतक आश्रित में नौकरी तो पा ली, लेकिन सहसवान रोजाना रोडवेज डिपो पर नौकरी के लिए आना और फिर जाना। उसके साथ ही बच्चों का पालन पोषण करना सो अलग। इन जिम्मेदारियों को एक साथ निभाते हुए कभी प्रेमवती थकी, कभी परेशान हुईं, लेकिन हार कभी नहीं मानी। बेटी ऊषा, गीता, पूनम, पिंकी और बेटे सूरजपाल को पढ़ाकर जीवन यापन करने के काबिल बनाया।
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बेटे-बेटियों की शादी विवाह के बावजूद अपनी जिंदगी जीने का मौका प्रेमवती को नहीं मिल सका। बड़ी बेटी की मौत के बाद उनकी दो बेटियों और एक बेटे को पालने की जिम्मेदारी खुद ले ली। बड़ी नातिन की शादी कराने के बाद एक नाती और एक नातिन की जिंदगी संवारने में खुद लगाए हुए हैं। अब वह शहर के पनवडिय़ा मोहल्ले में किराए के मकान में रह रहे हैं। उम्र के इस पड़ाव में खुद का मकान बनाने की ख्वाहिश अधूरी रह गई।