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भगवान के चरणों में मन और बुद्धि संसार में लगाओ
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बिल्सी में भागवत कथा सुनाते महाराज रामचन्द्राचार्य। संवाद
- फोटो : BADAUN
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बिल्सी। ज्वाला प्रसाद जैन बाल निकेतन स्कूल में चल रही श्रीमद्भागवत कथा ज्ञान यज्ञ के पांचवें दिन कथा व्यास पुष्कर पीठाधीश्वर जगद्गुरू श्रीरामानुजाचार्य स्वामी रामचंद्राचार्य ने भगवान श्रीकृष्ण की बाल लीलाओं का वर्णन किया। कहा कि भगवान के चरणों में मन लगाओ, सांसारिक कामों में बुद्धि का प्रयोग करो तो उद्धार होगा।
कथाव्यास ने कहा कि भगवान की बाल लीलाओं को देखकर गोपियां भगवान से प्रार्थना करती हैं कि हे प्रभु आप हमारे घर भी पधारें। हमारे घर में उधम मचाएं। हमारी मटकियों को फोड़ें। हम चोर-चोर कहते हुए आपके पीछे भागें। इस प्रकार की अद्भुत प्रार्थना को सुनकर भगवान गोपियों के यहां जाकर माखन चोरी करते हैं। कहा कि क्रोध की अवस्था में व्यक्ति की स्मृति का विनाश हो जाता है। नुकसान होने के बाद व्यक्ति समझ पाता है कि मैंने क्या खोया, मैंने क्या गंवाया। जो भगवान के अनन्य भक्त होते हैं। उनकी प्रेम भक्ति को देखकर परमात्मा के हृदय में कामनाएं उत्पन्न हो जाती हैं।
कहा कि भगवान की बाल लीलाओं का आनंद बुद्धि से नहीं लेना चाहिए। भगवान में जो बुद्धि लगाता है वह निश्चय ही मूर्ख है। क्योंकि भगवान बुद्धि का नहीं हृदय का विषय हैं। बुद्धि संसार में लगानी चाहिए। मन भगवान के चरणों में लगाना चाहिए। भागवत कथा की आरती महंत मटरुमल शर्मा महाराज, धर्मपत्नी शांति देवी ने की। उसके बाद प्रसाद का वितरण किया गया। इस मौके पर प्रदीप शर्मा, ओजित शर्मा, संजीव शर्मा, राजीव शर्मा, यश भारद्वाज, राजीव शर्मा, पुष्कीन माहेश्वरी, देव वार्ष्णेय, कुशाग्र माहेश्वरी आदि ने कथा का रसपान किया। संवाद
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कथाव्यास ने कहा कि भगवान की बाल लीलाओं को देखकर गोपियां भगवान से प्रार्थना करती हैं कि हे प्रभु आप हमारे घर भी पधारें। हमारे घर में उधम मचाएं। हमारी मटकियों को फोड़ें। हम चोर-चोर कहते हुए आपके पीछे भागें। इस प्रकार की अद्भुत प्रार्थना को सुनकर भगवान गोपियों के यहां जाकर माखन चोरी करते हैं। कहा कि क्रोध की अवस्था में व्यक्ति की स्मृति का विनाश हो जाता है। नुकसान होने के बाद व्यक्ति समझ पाता है कि मैंने क्या खोया, मैंने क्या गंवाया। जो भगवान के अनन्य भक्त होते हैं। उनकी प्रेम भक्ति को देखकर परमात्मा के हृदय में कामनाएं उत्पन्न हो जाती हैं।
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कहा कि भगवान की बाल लीलाओं का आनंद बुद्धि से नहीं लेना चाहिए। भगवान में जो बुद्धि लगाता है वह निश्चय ही मूर्ख है। क्योंकि भगवान बुद्धि का नहीं हृदय का विषय हैं। बुद्धि संसार में लगानी चाहिए। मन भगवान के चरणों में लगाना चाहिए। भागवत कथा की आरती महंत मटरुमल शर्मा महाराज, धर्मपत्नी शांति देवी ने की। उसके बाद प्रसाद का वितरण किया गया। इस मौके पर प्रदीप शर्मा, ओजित शर्मा, संजीव शर्मा, राजीव शर्मा, यश भारद्वाज, राजीव शर्मा, पुष्कीन माहेश्वरी, देव वार्ष्णेय, कुशाग्र माहेश्वरी आदि ने कथा का रसपान किया। संवाद
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