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Hindi News ›   Uttar Pradesh ›   Budaun News ›   Mastana vicious incident After the change takes place

शातिर है मस्ताना, घटना के बाद बदल लेता ठिकाना

Mon, 27 Jun 2016 11:42 PM IST
Updated Mon, 27 Jun 2016 11:42 PM IST
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 साधना शर्मा की हत्या में नाम आने के बाद मुजरिया थाना क्षेत्र के गांव भीकमपुर के अब्दुल नवी उर्फ मस्ताना का नाम एक बार फिर सुर्खियों में आ गया। लूट, अपहरण और हत्या के मामलों में लिप्त रहे मस्ताना के बारे में एक बात तो साफ है कि वह घटना के बाद हर बार ही अपना ठिकाना बदल लेता है।
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आपराधिक प्रष्ठभूमि से ताल्लुक रखने वालों में मस्ताना का नाम करीब साढ़े तीन दशक से चर्चित रहा है। उसने कई बड़ी घटनाओं को बड़े सहज अंदाज में अंजाम तक पहुंचाया है। सूत्र बताते हैं कि मस्ताना पर बिल्सी, मुजरिया और सहसवान थानों में कई केस दर्ज हैं। लूट, हत्या और अपहरणों के मामलों में शामिल रहा मस्ताना का गांव की राजनीति में रसूख रहा है। उसने एक बार अपनी पत्नी को प्रधान का चुनाव जितवा लिया था।
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मस्ताना ने जब भी कोई घटना करता है, लेकिन उसके बाद से इलाके से गायब हो जाता है। बिल्सी क्षेत्र के लूट-मर्डर के दौरान भी उसने इलाके को छोड़ दिया था। घटना के बाद गायब हो जाने की वजह से ही ज्यादातर मामलों में पुलिस उसे पकड़ने में नाकाम रहती है। उसके प्रमुख ठिकानों में दिल्ली और हरियाणा बताया गया है। साधना शर्मा की हत्या कराने के बाद से ही वह फरार है।
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चश्मदीद बिहारी के भी होंगे बयान
उझानी। बदायूं से लौटते वक्त साधना शर्मा जिस स्कूटी पर सवार थी, उसे उनकी नौकर बिहारी चला रहा था। वह भी मामूली रूप से घायल हुआ था। नामजदगी के वक्त भी बिहारी ने पुलिस को वही बताया जैसा कि विपर्णा ने घटना की तहरीर में लिखा था। पुलिस सूत्रों की मानें तो चश्मदीद बिहारी के किसी भी दिन पुलिस बयान दर्ज कर सकती है।
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ऐन वक्त पर बदला प्रेस कांफ्रेंस का इरादा
उझानी। प्रभारी डीजीसी साधना शर्मा हत्याकांड का खुलासा करने के लिए कोतवाली पुलिस ने सोमवार तड़के ही घटना की थीम और थ्योरी को अंतिम रूप दे दिया था। कोतवाल ने बताया भी कि जिला मुख्यालय पर प्रेस कांफ्रेंस के जरिए घटना से जुड़ी सच्चाई उजागर की जाएगी, लेकिन ऐन वक्त पर प्रेस कांफ्रेंस का इरादा बदलते हुए आरोपियों को कोर्ट में पेश कर दिया गया।
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पारिवारिक हालात ने साधना को
बना दिया था संघर्ष का पर्याय
उझानी। साधना शर्मा, यह नाम लोगों के लिए भले ही अपने अंदाज में सोचने और समझने का मौका दे गया, लेकिन पारिवारिक हालात कभी भी उनके अनुरूप नहीं रहे थे। पिता दिव्यांग थे। पांच बहनें, भाई कोई नहीं। बहनों की परवरिश करते-करते उन्होंने खुद को संघर्ष का पर्याय बना लिया। जिम्मेदारियों को पूरा भी किया, लेकिन कुछेक को पूरा करने से पहले ही उन्हें उनके परिवार से छीन लिया गया।

मोहल्ला बाजारकलां निवासी दिव्यांग रामेंद्रनाथ शर्मा की पांच संतान में सबसे बड़ी साधना शर्मा ने पारिवारिक जिम्मेदारियों को निभाने के लिए ताउम्र अविवाहित रहने की ठान ली थी। इसलिए भी कि उनके कोई भाई नहीं था। बहनों में किसी की उम्र इतनी नहीं कि उनमें से कोई भी अपनी जिम्मेदारी को निभा सके। दिव्यांग पिता की जिम्मेदारियों को बोझ कम करने के लिए उन्होंने मेहनत करके खुद को मुकाम पर पहुंचाया। बहनों में दो की शादी भी की। पिता स्वर्ग सिधारे, तो उन पर जिम्मेदारियों को बोझ बढ़ता गया। शादी-शुदा बहनों में एक विक्षिप्त हुई, तो उसके ससुराल वालों ने छोड़ दिया। उनकी एक बहन ने अपनी मर्जी से शादी कर ली थी। अब घर में एक विक्षिप्त और एक अविवाहित बहन के साथ बुजुर्ग मां है।
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