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...उनको तो समझ नहीं थी, तो बेड़ियों में किसने जकड़ा

Sun, 06 Jan 2019 11:35 PM IST
pawan chandra पवन चंद्रा
Updated Sun, 06 Jan 2019 11:35 PM IST
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...उनको तो समझ नहीं थी, तो बेड़ियों में किसने जकड़ा
बदायूं। कहते हैं कि बुरे वक्त में लोगों की पहचान होती है, अगर उनमें भी समझ होती तो शायद अपने पराये की पहचान कर लेते। उनकी भी अलग दुनिया होती, घर होता और परिवार होता। उन्हें तो यह भी पता नहीं कि उन्हें क्यों बांधा गया है? कहां बांधा गया है? अगर इतनी समझदारी होती तो शायद परिवार का साथ होता या फिर परिवार वालों के वो साथ होते।
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शहर के एक धर्मस्थल में नौ लोग आज भी बेड़ियों से जकड़े पड़े हैं। किसी के पैर में जंजीर है तो किसी के हाथ में जंजीर पड़ी है। ऊपर से जंजीर पर ताला लगा दिया गया है। जिस जगह उन्हें बांधा गया है, वहीं खाना-पानी दे दिया जाता है। हालांकि उन्हें सर्दी-गर्मी का अहसास नहीं है। बावजूद इसके कमेटी के लोग उन्हें कंबल रजाई दे देते हैं। ऐसा नहीं कि इनके परिवार वाले नहीं हैं। यह लोग अपने परिवार वालों के साथ ही धर्मस्थल आए थे। उसके बाद एक-एक करके चले गए। रह गए तो अकेले बेड़ियों में जकड़े मनोरोगी। उनकी मानसिक दशा को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने सवाल उठाया था। साथ ही इस पर चिंता व्यक्त करते हुए, बेड़ियों से जकड़े जाने पर एतराज जताया था।
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लेकिन धर्मस्थल के हालात कुछ और हैं। कई बार सूचनाएं देने के बावजूद न तो मनोरोगियों के परिवार वाले आए और न ही उन्हें बेड़ियों से मुक्त किया गया। दो दिन पहले डीएम द्वारा गठित कमेटी में शामिल अधिकारी मौके पर पहुंचे थे। उन्होंने सभी मनोरोगियों को बेड़ियों से मुक्त करने का दावा किया था। कहा था कि जिनके परिवार वाले मौजूद थे, उन्हें परिवार वालों को सौंप दिया गया है। बाकी मनोरोगियों के परिवार वालों को सूचना दे दी गई है। परंतु अभी तक न तो उनके परिवार वाले आएं हैं और न मनोरोगियों को बेड़ियों से मुक्त किया गया है।
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