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कम अंक आने पर इंटर की छात्रा ने फंदे से लटककर दे दी जान
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बदायूं। फैजगंज बेहटा थाना क्षेत्र के गांव में इंटर में कम अंक आने पर बुधवार को 19 वर्षीय छात्रा ने फंदे से लटककर जान दे दी। उस वक्त घर पर कोई नहीं था। ताऊ ने बिना पुलिस को सूचना दिए ही शव का अंतिम संस्कार कर दिया।
थाना क्षेत्र के एक गांव निवासी 19 वर्षीय युवती एक इंटर कॉलेज में इंटर की छात्रा थी। उसके माता-पिता चंडीगढ़ में रहकर मजदूरी करते हैं। वह यहां ताऊ के यहां पढ़ाई कर रही थी। बुधवार को वह घर पर अकेली थी। उसका भाई कहीं बाहर खेलने गया था। इसी दौरान उसने फंदे से लटककर जान दे दी। कुछ देर बाद ताऊ को जानकारी हुई तो उन्होंने कुछ लोगों को बुलाकर शव फंदे से उतार लिया। इस संबंध में पुलिस को जानकारी देना भी जरूरी नहीं समझा। बताया जा रहा है कि ताऊ ने छात्रा के माता-पिता से बात करके दो घंटे बाद ही दोपहर में उसके शव का अंतिम संस्कार भी कर दिया।
ग्रामीणों के मुताबिक 18 जून को छात्रा का परीक्षा परिणाम आया था। उसमें वह द्वितीय श्रेणी में पास हुई थी। जिससे वह काफी दुखी थी, यहां तक कि काफी रोई भी थी।
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छात्रा के आत्महत्या करने की सूचना नहीं दी गई। अगर इसकी जानकारी मिलती तो शव का पोस्टमार्टम कराया जाता। परिवार वाले नहीं चाहते तो कम से कम पंचायतनामा भरा जाता। अगर इस संबंध में कोई तहरीर आएगी तो जांच के बाद कार्रवाई होगी।
- शक्ति सिंह, सीओ बिसौली
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प्रथम श्रेणी में चार नंबरों से चूकी, घरवालों ने कहा था- दोबारा चेक करा देंगे कॉपी
बदायूं। फैजगंज बेहटा इलाके में फंदे से लटककर जान देने वाली छात्रा के केवल चार नंबर कम आए थे, इससे उसकी प्रथम श्रेणी नहीं आ सकी। वह अपने गांव में सबसे होशियार थी। एक निजी स्कूल में पढ़ाती थी और कुछ बच्चों को ट्यूशन भी देती थी। परिवार वालों ने उसे आश्वासन दिया था कि उसकी कॉपी दोबारा चेक कराएंगे पर उसका अवसाद कम नहीं हुआ।
करीब 19 वर्षीय छात्रा के चार भाई और पांच बहनें हैं। छात्रा अपने भाइयों से छोटी और बहनों से बड़ी थी। उसके माता-पिता चंडीगढ़ में रहकर मजदूरी करते हैं जबकि तीन भाई दिल्ली में रहकर मजदूरी करते हैं। इसके बावजूद परिवार वाले छात्रा को पढ़ा रहे थे। छात्रा के हाईस्कूल में 86 प्रतिशत नंबर आए थे। वह पढ़ने में होशियार थी। गांव के एक निजी स्कूल में पढ़ाने जाती थी। इसके अलावा गांव के बच्चों को ट्यूशन भी देती थी। परिवार वालों के मुताबिक हर समय उसका पढ़ाई में ध्यान रहता था। इससे परिवार वाले उस पर भरोसा करते थे कि वह आगे चलकर कुछ कर सकती है।
18 जून को जब उसका रिजल्ट आया तो वह परेशान हो गई। हिंदी में उसके 54 नंबर थे, गणित में 54, अंग्रेजी में 68, फिजिक्स में 58 और कैमिस्ट्री में 62 नंबर आए थे। कुल 296 नंबर आने से फर्स्ट डिवीजन में उसके केवल चार नंबर कम रह गए थे। इतनी पढ़ाई के बावजूद नंबर कम आने पर उसको काफी दुख पहुंचा था। परिवार वालों ने उसकी हालत देखकर यह आश्वासन भी दिया था कि उसकी कॉपी दोबारा चेक कराएंगे, अंतत: उसने फंदा लगाकर जान देदी
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प्यार करता था परिवार, इसलिए नहीं कराया पोस्टमार्टम
परिवार वाले छात्रा से बहुत प्यार करते थे। छात्रा सबका ध्यान रखती थी। घरेलू काम के बाद वह केवल पढ़ाई करती थी। इससे परिवार वालों को उससे कोई शिकायत नहीं थी। परिजन के अनुसार उसकी मौत के बाद वे पोस्टमार्टम से उसकी शरीर की दुर्गति नहीं चाहते थे। इसलिए उन्होंने पोस्टमार्टम नहीं कराया और न ही पुलिस को इसकी सूचना दी।
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कोरोना के कारण भी मानसिक बीमारियां बढ़ीं
बीते दो सालों में कोरोना काल के चलते मानसिक बीमारियों का प्रभाव कई गुना बढ़ गया है। इसका प्रमुख प्रभाव नौकरीपेशा लोगों और विद्यार्थियों पर हुआ है। स्कूल बंद होने के कारण उनकी पढ़ाई वैसे ही नहीं सुचारु रूप से नहीं चल पाई ऐसे में वे अभिभावकों के डर, साथियों के दबाव और भविष्य की अनिश्चितता के कारण अवसाद का शिकार हो गए। इसके साथ ही कम नंबर आने पर कई बच्चों के आत्मसम्मान को भी ठेस पहुंची है। उस पर भी यदि घर में अनुकूल वातावरण न हो तो और ज्यादा मुश्किल हो जाती है। इस घटना में भी संभवत: यही बात है। चार नंबर कम आने के कारण अवसाद में आकर छात्रा ने ऐसा कदम उठाया होगा।
-डॉ. नरवीर यादव, वरिष्ठ मनोचिकित्सक व असिस्टेंट प्रोफेसर, राजकीय मेडिकल कॉलेज
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अवसाद के चरम पर पहुंचने से दी जान
कम उम्र में बच्चों का आत्महत्या करना, कहीं न कहीं सामाजिक व्यवस्था पर भी एक प्रश्नचिह्न है क्योंकि यह उम्र नासमझी की होती है। हाईस्कूल, इंटर का बच्चा मानसिक रूप से इतना परिपक्व नहीं होता कि वह सही और गलत का भेद कर सके और ऐसे में वह आत्महत्या जैसा गलत कदम भी उठा लेता है। वर्तमान परिप्रेक्ष्य की बात करें तो परिवार और समाज दोनों की भूमिका शिथिल हुई हैं। जहां सामाजिक नियंत्रण में परिवार की भूमिका महत्वपूर्ण थी वही आज इसमें कमी दिखाई देने लगी है जिसका सीधा सा असर बच्चों की मानसिकता पर भी पड़ रहा है। दरअसल, आत्महत्या एक क्षणिक आवेग होता है, जिसमें उठाया गया कदम व्यक्ति की जान ले लेता है। इस मामले में भी छात्रा नंबर कम होने के कारण अवसाद का शिकार हो गई, जिसके चरम पर पहुंचने के बाद उसने आत्मघाती कदम उठा लिया।
-डॉ. मनीषा भूषण, असिस्टेंट प्रोफेसर, समाजशास्त्र, राजकीय महिला डिग्री कॉलेज
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थाना क्षेत्र के एक गांव निवासी 19 वर्षीय युवती एक इंटर कॉलेज में इंटर की छात्रा थी। उसके माता-पिता चंडीगढ़ में रहकर मजदूरी करते हैं। वह यहां ताऊ के यहां पढ़ाई कर रही थी। बुधवार को वह घर पर अकेली थी। उसका भाई कहीं बाहर खेलने गया था। इसी दौरान उसने फंदे से लटककर जान दे दी। कुछ देर बाद ताऊ को जानकारी हुई तो उन्होंने कुछ लोगों को बुलाकर शव फंदे से उतार लिया। इस संबंध में पुलिस को जानकारी देना भी जरूरी नहीं समझा। बताया जा रहा है कि ताऊ ने छात्रा के माता-पिता से बात करके दो घंटे बाद ही दोपहर में उसके शव का अंतिम संस्कार भी कर दिया।
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ग्रामीणों के मुताबिक 18 जून को छात्रा का परीक्षा परिणाम आया था। उसमें वह द्वितीय श्रेणी में पास हुई थी। जिससे वह काफी दुखी थी, यहां तक कि काफी रोई भी थी।
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छात्रा के आत्महत्या करने की सूचना नहीं दी गई। अगर इसकी जानकारी मिलती तो शव का पोस्टमार्टम कराया जाता। परिवार वाले नहीं चाहते तो कम से कम पंचायतनामा भरा जाता। अगर इस संबंध में कोई तहरीर आएगी तो जांच के बाद कार्रवाई होगी।
- शक्ति सिंह, सीओ बिसौली
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प्रथम श्रेणी में चार नंबरों से चूकी, घरवालों ने कहा था- दोबारा चेक करा देंगे कॉपी
बदायूं। फैजगंज बेहटा इलाके में फंदे से लटककर जान देने वाली छात्रा के केवल चार नंबर कम आए थे, इससे उसकी प्रथम श्रेणी नहीं आ सकी। वह अपने गांव में सबसे होशियार थी। एक निजी स्कूल में पढ़ाती थी और कुछ बच्चों को ट्यूशन भी देती थी। परिवार वालों ने उसे आश्वासन दिया था कि उसकी कॉपी दोबारा चेक कराएंगे पर उसका अवसाद कम नहीं हुआ।
करीब 19 वर्षीय छात्रा के चार भाई और पांच बहनें हैं। छात्रा अपने भाइयों से छोटी और बहनों से बड़ी थी। उसके माता-पिता चंडीगढ़ में रहकर मजदूरी करते हैं जबकि तीन भाई दिल्ली में रहकर मजदूरी करते हैं। इसके बावजूद परिवार वाले छात्रा को पढ़ा रहे थे। छात्रा के हाईस्कूल में 86 प्रतिशत नंबर आए थे। वह पढ़ने में होशियार थी। गांव के एक निजी स्कूल में पढ़ाने जाती थी। इसके अलावा गांव के बच्चों को ट्यूशन भी देती थी। परिवार वालों के मुताबिक हर समय उसका पढ़ाई में ध्यान रहता था। इससे परिवार वाले उस पर भरोसा करते थे कि वह आगे चलकर कुछ कर सकती है।
18 जून को जब उसका रिजल्ट आया तो वह परेशान हो गई। हिंदी में उसके 54 नंबर थे, गणित में 54, अंग्रेजी में 68, फिजिक्स में 58 और कैमिस्ट्री में 62 नंबर आए थे। कुल 296 नंबर आने से फर्स्ट डिवीजन में उसके केवल चार नंबर कम रह गए थे। इतनी पढ़ाई के बावजूद नंबर कम आने पर उसको काफी दुख पहुंचा था। परिवार वालों ने उसकी हालत देखकर यह आश्वासन भी दिया था कि उसकी कॉपी दोबारा चेक कराएंगे, अंतत: उसने फंदा लगाकर जान देदी
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प्यार करता था परिवार, इसलिए नहीं कराया पोस्टमार्टम
परिवार वाले छात्रा से बहुत प्यार करते थे। छात्रा सबका ध्यान रखती थी। घरेलू काम के बाद वह केवल पढ़ाई करती थी। इससे परिवार वालों को उससे कोई शिकायत नहीं थी। परिजन के अनुसार उसकी मौत के बाद वे पोस्टमार्टम से उसकी शरीर की दुर्गति नहीं चाहते थे। इसलिए उन्होंने पोस्टमार्टम नहीं कराया और न ही पुलिस को इसकी सूचना दी।
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कोरोना के कारण भी मानसिक बीमारियां बढ़ीं
बीते दो सालों में कोरोना काल के चलते मानसिक बीमारियों का प्रभाव कई गुना बढ़ गया है। इसका प्रमुख प्रभाव नौकरीपेशा लोगों और विद्यार्थियों पर हुआ है। स्कूल बंद होने के कारण उनकी पढ़ाई वैसे ही नहीं सुचारु रूप से नहीं चल पाई ऐसे में वे अभिभावकों के डर, साथियों के दबाव और भविष्य की अनिश्चितता के कारण अवसाद का शिकार हो गए। इसके साथ ही कम नंबर आने पर कई बच्चों के आत्मसम्मान को भी ठेस पहुंची है। उस पर भी यदि घर में अनुकूल वातावरण न हो तो और ज्यादा मुश्किल हो जाती है। इस घटना में भी संभवत: यही बात है। चार नंबर कम आने के कारण अवसाद में आकर छात्रा ने ऐसा कदम उठाया होगा।
-डॉ. नरवीर यादव, वरिष्ठ मनोचिकित्सक व असिस्टेंट प्रोफेसर, राजकीय मेडिकल कॉलेज
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अवसाद के चरम पर पहुंचने से दी जान
कम उम्र में बच्चों का आत्महत्या करना, कहीं न कहीं सामाजिक व्यवस्था पर भी एक प्रश्नचिह्न है क्योंकि यह उम्र नासमझी की होती है। हाईस्कूल, इंटर का बच्चा मानसिक रूप से इतना परिपक्व नहीं होता कि वह सही और गलत का भेद कर सके और ऐसे में वह आत्महत्या जैसा गलत कदम भी उठा लेता है। वर्तमान परिप्रेक्ष्य की बात करें तो परिवार और समाज दोनों की भूमिका शिथिल हुई हैं। जहां सामाजिक नियंत्रण में परिवार की भूमिका महत्वपूर्ण थी वही आज इसमें कमी दिखाई देने लगी है जिसका सीधा सा असर बच्चों की मानसिकता पर भी पड़ रहा है। दरअसल, आत्महत्या एक क्षणिक आवेग होता है, जिसमें उठाया गया कदम व्यक्ति की जान ले लेता है। इस मामले में भी छात्रा नंबर कम होने के कारण अवसाद का शिकार हो गई, जिसके चरम पर पहुंचने के बाद उसने आत्मघाती कदम उठा लिया।
-डॉ. मनीषा भूषण, असिस्टेंट प्रोफेसर, समाजशास्त्र, राजकीय महिला डिग्री कॉलेज