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सावधान! ये रोडवेज की बसें नहीं हैं
अमर उजाला ब्यूरो बदायूं।
Updated Fri, 31 Mar 2017 12:15 AM IST
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- फोटो : amar ujala
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रसूखदारों की बसों का बदायूं डिपो गेट से होता है संचालन, अधिकारी खामोश
सरकार किसी की रहे, रसूखदार अपना काम निकाल ही लेते हैं। बदायूं डिपो की बसों के मामले में भी कुछ ऐसा ही हैं। यहां डिपो के गेट से बरेली दिशा में करीब दो दर्जन ऐसी बसें संचालित की जा रही हैं जो काफी हद तक परिवहन निगम की बसों की तरह लगती हैं। तमाम मुसाफिर गलतफहमी में इन बसों में बैठ जाते हैं और बाद में पछताते हैं। रोक लगाने के लिए जिम्मेदार अधिकारी इस ओर गौर नहीं कर रहे। इससे रोडवेज को राजस्व का भी काफी नुकसान हो रहा है।
बदायूं डिपो के बाहर अजंता होटल के नीचे खड़ी होने वाली यह बसें बिना किसी परमिट या मानक के चलाई जा रही हैं। बताते हैं कि इनमें से अधिकतर बसें एक ऐसे शख्स की हैं जिसका निवर्तमान सपा सरकार में खासा दबदबा था। उस समय कार्रवाई के लिए अफसरों के हाथ बंधे थे पर सरकार जाने के बाद भी बसों के मनमाफिक संचालन से साफ होता है कि सेटिंग कितनी जबर्दस्त है। अधिकतर बसें या तो रोडवेज की तरह हैं या फिर सफेद रंग की हैं। कुछ बसों के आगे उत्तर प्रदेश भी मोटे अक्षरों में लिखा रहता है। शीशे के पास बरेली या बदायूं लिखकर प्लेट ठीक उसी तरह लगाई जाती है जैसे सरकारी बसों में होती है। बस संचालक कोशिश करते हैं कि सीधे बरेली के लिए मुसाफिर बैठाए जाएं, हालांकि ऐसा न होने पर वे बिनावर, भमोरा आदि स्थानों के मुसाफिरों को भी बैठा लेते हैं। इस तरह बसें रास्ते में कई जगह रुकती हैं जिससे मुसाफिरों को दिक्कत होती है। बरेली में बसें मुसाफिरों को उनकी सुविधा के अनुसार चौकी चौराहा, अय्यूब खां चौराहा या फिर बरेली कॉलेज के पास उतार देती हैं।
पीओएस मशीन से भी दे रहे टिकट
फर्जी रोडवेज बसों में मुसाफिरों को गड्डी से फाड़कर लगभग वैसा ही टिकट दिया जाता है जैसा ईटीएम चलन से पहले रोडवेज स्टाफ देता था। बताते हैं कि ऐसी कुछ बसों में कंडक्टरों के पास पीओएस मशीन भी है। इसमें मुसाफिरों का एटीएम कार्ड लगाकर वह किराया राशि अपने मालिक के एकाउंट में डाल देते हैं। गनीमत ये है कि रोडवेज बस में बरेली से बदायूं तक किराया 55 रुपये है पर ये लोग 50 रुपये ही वसूलते हैं।
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जान जोखिम में डाल रहे मुसाफिर
कुछ रोडवेज बस के धोखे में तो कुछ कम किराये के चक्कर में इन बसों में बैठ जाते हैं। जाहिर है कि रोडवेज बस में टिकट लेकर बैठने वाले हर मुसाफिर का बीमा होता है और किसी हादसे की स्थिति में संबंधित रकम मुसाफिर या उसके आश्रितों को मिलती है। बिना परमिट की इन बसों में सफर करने वाले मुसाफिरों को ऐसी कोई सहूलियत नहीं मिल पाती। इसलिए ये सफर सीधे तौर पर जान जोखिम में डालने जैसा है।
क्या कहते हैं अधिकारी
हां, इस तरह की बसों से राजस्व का नुकसान तो है ही। हमने इस संदर्भ में एसपी सिटी और एआरटीओ के साथ रणनीति बनाई है। ऐसे सभी वाहनों के खिलाफ अभियान छेड़ा जा रहा है।
-राजेश सिंह, एआरएम बदायूं डिपो
हमारी जानकारी में ऐसी कोई गाड़ी रोडवेज स्टैंड के आसपास से संचालित नहीं हो रही है। हां, कुछ डग्गामार वाहन जरूर संचालित हो रहे हैं। बदायूं डिपो प्रबंधन से बातचीत करके इनके विरुद्ध संयुक्त कार्रवाई की जाएगी।
- अमिताभ राय, एआरटीओ
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सरकार किसी की रहे, रसूखदार अपना काम निकाल ही लेते हैं। बदायूं डिपो की बसों के मामले में भी कुछ ऐसा ही हैं। यहां डिपो के गेट से बरेली दिशा में करीब दो दर्जन ऐसी बसें संचालित की जा रही हैं जो काफी हद तक परिवहन निगम की बसों की तरह लगती हैं। तमाम मुसाफिर गलतफहमी में इन बसों में बैठ जाते हैं और बाद में पछताते हैं। रोक लगाने के लिए जिम्मेदार अधिकारी इस ओर गौर नहीं कर रहे। इससे रोडवेज को राजस्व का भी काफी नुकसान हो रहा है।
बदायूं डिपो के बाहर अजंता होटल के नीचे खड़ी होने वाली यह बसें बिना किसी परमिट या मानक के चलाई जा रही हैं। बताते हैं कि इनमें से अधिकतर बसें एक ऐसे शख्स की हैं जिसका निवर्तमान सपा सरकार में खासा दबदबा था। उस समय कार्रवाई के लिए अफसरों के हाथ बंधे थे पर सरकार जाने के बाद भी बसों के मनमाफिक संचालन से साफ होता है कि सेटिंग कितनी जबर्दस्त है। अधिकतर बसें या तो रोडवेज की तरह हैं या फिर सफेद रंग की हैं। कुछ बसों के आगे उत्तर प्रदेश भी मोटे अक्षरों में लिखा रहता है। शीशे के पास बरेली या बदायूं लिखकर प्लेट ठीक उसी तरह लगाई जाती है जैसे सरकारी बसों में होती है। बस संचालक कोशिश करते हैं कि सीधे बरेली के लिए मुसाफिर बैठाए जाएं, हालांकि ऐसा न होने पर वे बिनावर, भमोरा आदि स्थानों के मुसाफिरों को भी बैठा लेते हैं। इस तरह बसें रास्ते में कई जगह रुकती हैं जिससे मुसाफिरों को दिक्कत होती है। बरेली में बसें मुसाफिरों को उनकी सुविधा के अनुसार चौकी चौराहा, अय्यूब खां चौराहा या फिर बरेली कॉलेज के पास उतार देती हैं।
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पीओएस मशीन से भी दे रहे टिकट
फर्जी रोडवेज बसों में मुसाफिरों को गड्डी से फाड़कर लगभग वैसा ही टिकट दिया जाता है जैसा ईटीएम चलन से पहले रोडवेज स्टाफ देता था। बताते हैं कि ऐसी कुछ बसों में कंडक्टरों के पास पीओएस मशीन भी है। इसमें मुसाफिरों का एटीएम कार्ड लगाकर वह किराया राशि अपने मालिक के एकाउंट में डाल देते हैं। गनीमत ये है कि रोडवेज बस में बरेली से बदायूं तक किराया 55 रुपये है पर ये लोग 50 रुपये ही वसूलते हैं।
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जान जोखिम में डाल रहे मुसाफिर
कुछ रोडवेज बस के धोखे में तो कुछ कम किराये के चक्कर में इन बसों में बैठ जाते हैं। जाहिर है कि रोडवेज बस में टिकट लेकर बैठने वाले हर मुसाफिर का बीमा होता है और किसी हादसे की स्थिति में संबंधित रकम मुसाफिर या उसके आश्रितों को मिलती है। बिना परमिट की इन बसों में सफर करने वाले मुसाफिरों को ऐसी कोई सहूलियत नहीं मिल पाती। इसलिए ये सफर सीधे तौर पर जान जोखिम में डालने जैसा है।
क्या कहते हैं अधिकारी
हां, इस तरह की बसों से राजस्व का नुकसान तो है ही। हमने इस संदर्भ में एसपी सिटी और एआरटीओ के साथ रणनीति बनाई है। ऐसे सभी वाहनों के खिलाफ अभियान छेड़ा जा रहा है।
-राजेश सिंह, एआरएम बदायूं डिपो
हमारी जानकारी में ऐसी कोई गाड़ी रोडवेज स्टैंड के आसपास से संचालित नहीं हो रही है। हां, कुछ डग्गामार वाहन जरूर संचालित हो रहे हैं। बदायूं डिपो प्रबंधन से बातचीत करके इनके विरुद्ध संयुक्त कार्रवाई की जाएगी।
- अमिताभ राय, एआरटीओ