Mahashivratri 2026: भक्तों की आस्था का केंद्र है बदायूं का बिरुआबाड़ी और नवाब नौबत राय मंदिर, जानिए इतिहास
बदायूं का बिरुआबाड़ी मंदिर अपने आप में अनूठा है। मान्यता है कि यहां खोदाई के दौरान शिवलिंग मिला था, जिसे मंदिर में स्थापित किया गया है। मंदिर परिसर में स्थापित देव प्रतिमाएं भक्तों के लिए आकर्षण का केंद्र हैं।
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बदायूं शहर में स्थित भगवान शिव का बिरुआबाड़ी मंदिर श्रद्धालुओं की आस्था का प्रमुख केंद्र है। 150 साल से अधिक पुराना यह मंदिर आस्था के साथ अपनी सुंदरता और भव्यता के लिए भी पहचाना जाता है। सावन माह और महाशिवरात्रि पर यहां रोजाना हजारों शिवभक्त जलाभिषेक कर मनौती मांगते हैं।
मंदिर के मुख्य पुजारी अभिन्यु पांडेय ने बताया कि इस जगह पर 150 साल से पहले बिरुआ नाम का एक माली खेती करता था। एक बार वह अपने खेत को जोत रहा था, तब उसका हल एक जगह अटक गया। कई बार हल अटका तो उसने सोचा कि देखा जाए अन्दर क्या है। उसने फावड़ा से खोदना शुरू किया। खोदाई करते समय फावड़ा शिवलिंग पर लगा, जिसका निशान आज भी शिवलिंग पर है। उसके बाद बिरुआ माली ने वहां पर मठिया बनाकर स्थानीय लोगों के साथ पूजा- अर्चना शुरू कर दी। पुजारी ने बताया कि बुजुर्गों के अनुसार साल 1932 में माली ने इस मठिया की जिम्मेदारी लाला हरसहायमल श्यामलाल सराफ को सौंप दी। इसके बाद 1984 में मंदिर को वृहद रूप देते हुए इसका जीर्णोद्धार शुरू कराया गया। तब से मंदिर को बिरुआ माली के नाम पर इसे बिरुआबाड़ी मंदिर कहा जाने लगा।
आकर्षण का केंद्र हैं मंदिर में स्थापित प्रतिमाएं
बिरुआबाड़ी मंदिर में श्री राम दरबार, शिव परिवार, कृष्ण, बाला जी दरबार, हनुमान जी, बांके बिहारी सहित 11 भव्य दरबार स्थापित हैं। इसके साथ ही मंदिर में ही गीता भवन बना हुआ है। वहां पर अर्जुन का गीता का उपदेश देते हुए भगवान श्रीकृष्ण की विशाल प्रतिमा भी स्थापित है। मंदिर के बीचोंबीच शिवलिंग स्थापित है, जिसमें रोजाना सैकड़ों लोग पूजा करने आते हैं। सावन के माह और महाशिवरात्रि में यहां पर जलाभिषेक करने के लिए लंबी- लबी कतारें लग जाती हैं। यहां प्रत्येक देवी- देवता के स्थापना को वार्षिकोत्सव मनाया जाता है। इसके साथ ही भाद्रपद माह में जन्माष्टमी पर मेला लगता है तब बाहर से बहुत लोग उसमें शामिल होते हैं।
बिरुआबाड़ी मंदिर काली सड़क पर स्थित है। रोडवेज बस अड्डे से मंदिर पहुंचने के लिए परशुराम चौक पर आना होगा। उसके बाद में गांधी ग्राउंड रोड होते हुए गद्दी चौक, नई सराय, शहबाजपुर, टिकटगंज फिर पथिक चौक तक जाना होगा। उसके बाद में दाएं हाथ पर मुड़कर नवादा रोड पर आगे बढ़ना होगा। करीब 400 मीटर की दूरी पर मंदिर स्थित है।
रेलवे स्टेशन से मंदिर जाने के लिए इंदिरा चौक आना होगा। वहां से दो रूट मंदिर जाने के है। पहला रूट जो शहर के अंदर होकर है, जिसमें इंदिरा चौक से श्रीकृष्णा इंटर कॉलेज के सामने होते हुए गांधी ग्राउंड पहुंचना होगा। वहां से गद्दी चौक वाला रूट मंदिर तक जाता है। दूसरा रूट इंदिरा चौक से दातागंज तिराहा होते हुए नवादा (शहीद भगत सिंह चौक) तक का है। शहीद भगत सिंह चौक के पास से शहर के अंदर काली सड़क से होते हुए मंदिर तक पहुंच सकते हैं।
शहर के ही नवाब नौबत राय ने पटियाली सराय में करीब 250 साल पहले एक मंदिर का निर्माण का कराया था। यह मंदिर अपने आप में अद्भुत है। मंदिर में दो जगह पर शिवलिंग की स्थापना है। इसके साथ ही मंदिर में राधा, कृष्ण, चित्रगुप्त जी आदि देवी- देवताओं की मूर्ति स्थापित हैं।
वर्तमान में आशीष कुमार सक्सेना मंदिर की देखभाल कर रहे हैं। वह बताते हैं कि उनकी पत्नी के पर बाबा नौबतराय ने यह मंदिर बनवाया था। उन्होंने बताया कि नौबत राय ककोड़ा मेला जाते थे। वहां से उन्हें मंदिर बनवाने के बारे में विचार में आया। इसके बाद उन्होंने शहर पटियाली सराय काफी बड़ा और अद्भुत मंदिर का निर्माण कराया। मंदिर निर्माण में प्रयोग किए गए पत्थर पारदर्शी है। इसमें रोशनी पड़ने पर आर पार दिखाई देती है। मंदिर में स्थापित शिवलिंग पर रोशनी पड़ने पर उसका रंग मूंगिया हो जाता है।
साल में एक बार खोला जाता है विशेष मंदिर
नवाब नौबत राय मंदिर घर में बना हुआ है। जिसे साल में एक बार ही खोला जाता है। आशीष ने बताया कि महाशिवरात्रि के दिन इस मंदिर के दरवाजे भक्तों के लिए खोले जाते हैं। इस मंदिर में आठ मंत्र लिखे हुए जो आंग ऋषि ने भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए बोला था। इन मंत्रों को पढ़ सभी लेते हैं लेकिन अर्थ कोई नहीं बता पाता है। इसी मंदिर को देखने लिए भक्त भी पूरी साल खुलने का इंतजार करते हैं। महशिवरात्रि को सुबह 9 बजे से 1 बजे तक भक्तों के लिए खोला जाएगा।
ऐतिहासिक और पौराणिक बरौलिया की गुफा और मंदिर
उघैती में सहसवान रोड पर स्थित सिद्ध बरौलिया का ऐतिहासिक व पौराणिक प्राचीन शिव मंदिर वर्षों पुराना है। यहां का शिवमंदिर आस्था और विश्वास का ऐसा अनूठा केंद्र है, जहां हिंदू-मुसलमान दोनों ही यहां लगने वाले मेला की तैयारी में जुटते हैं। मंदिर के महंत ने सोहनदास ने बताया कि यह मंदिर अत्यंत प्राचीन है। स्थानीय लोग और मंदिर के महंत का मानना है कि भगवान परशुराम के पिता ऋषि जमदग्नि ने यहां तपस्या की थी। मंदिर में एक प्राचीन गुफा भी है।
इस गुफा में ऋषि तपस्या करके सिद्धियां प्राप्त करते थे। गुफा कहां खुलती है। इसके बारे में आज तक कोई नहीं जान सका। बताते हैं कि शिवालय पर जलाभिषेक को गुफा के रास्ते ही तपस्वी गंगा तक जाते और जल लेकर आते थे। भक्तों की यह धार्मिक स्थल अगाध श्रद्धा का केंद्र है। महाशिवरात्रि और सावन माह में मेला जैसा माहौल रहता है। भक्तों की भारी भीड़ लगती है। महाशिवरात्रि पर यहां प्रतिवर्ष भक्तों का जमावाड़ा होता है। मेला लगता है। लोग मनोकामना मांगने पहुंचते हैं। महंत ने बताया कि भोलेनाथ के सामने मांगी हुई हर मनोकामना पूरी होती है।