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नगला मंदिर में बनती थी अंग्रेजों से मुचैटा की रणनीति
Updated Sun, 13 Aug 2017 07:19 PM IST
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बदायूं। जिले में स्वतंत्रता आंदोलन का अपना अनूठा इतिहास है। इस इतिहास में अगर प्रसिद्ध देवी शक्ति पीठ नगला मंदिर का जिक्र न किया जाए तो इतिहास अधूरा ही रहेगा। स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान शहर के पूरब नगला शर्की गांव में स्थित नगला मंदिर केंद्र बिंदु बन गया था। मंदिर में कीर्तन के दौरान क्रांतिकारियों की टोलियां जुटती थीं। यहीं अंग्रेजों से मुचैटा लेने की रणनीति बनती थी।
स्वतंत्रता संग्राम के दौरान 1921 और 1929 में महात्मा गांधी के बदायूं दौरे के बाद 1942 में नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने बदायूं का दौरा किया इसके बाद आंदोलन ने और रफ्तार पकड़ ली। खासकर युवा वर्ग अंग्रेजों के जुल्मों को लेकर आक्रोशित था। नगला शर्की के एक बाग में क्रांतिकारी बैठकें किया करते थे। अंग्रेज हुकूमत आंदोलन को हर स्तर पर कुचलना चाहती थी। क्रांतिकारियों की बैठकों के बारे में अंग्रेजों को पता न लगे इसके लिए बाग के पास ही माता काली की मिट्टी की प्रतिमा बनाकर यहां कीर्तन आदि किया जाने लगा। कीर्तन के दौरान यहां क्रांतिकारी जुटते थे। इससे अंग्रेजों को शक भी नहीं होता था और क्रांतिकारी अंग्रेजों से मुचैटा करने की अपनी रणनीति भी तैयार कर लेते थे। मिट्टी की यह प्रतिमा ईसापुर के चरनलाल ने बनाई थी। इस पर काला रंग कर दिया गया। नगला मंदिर कई साल तक स्वतंत्रता आंदोलन का केंद्र बिंदु बना रहा।
क्रांतिकारियों पर थी देवी की कृपा
बदायूं। माना जाता है कि नगला शर्की में कीर्तन के दौरान स्वतंत्रता आंदोलन की रणनीति बनाने वाले क्रांतिकारियों पर देवी की कृपा थी। एक बार मुखबिर की सूचना पर क्रांतिकारियों की धर-पकड़ को अंग्रेज पुलिस नगला मंदिर पहुंची। यहां क्रांतिकारी कीर्तन के दौरान रणनीति बना रहे थे। उनको पुलिस के आने की खबर नहीं थी। पुलिस के वहां पहुंचते ही भयंकर ओलावृष्टि शुरू हो गई। ऐसे में अंग्रेज पुलिस को वापस लौटना पड़ा।
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रियासत का महामंत्री पद छोड़ आंदोलन में कूदे रुकुम सिंह
बदायूं। कुंवर रुकुम सिंह राठौर देवास रियासत में महामंत्री थे। 1913 में हुए जलियावाला बाग कांड के बाद वह देवास रियासत के महामंत्री का पद छोड़कर स्वतंत्रता संग्राम में कूदे थे। स्वतंत्रता संग्राम में कुंवर रुकुम सिंह का अहम योगदान रहा था। उन्होंने काफी समय महात्मा गांधी, पंडित मदन मोहन मालवीय और नेताजी सुभाष चंद्र बोस के साथ भी बिताया था।
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स्वतंत्रता संग्राम के दौरान 1921 और 1929 में महात्मा गांधी के बदायूं दौरे के बाद 1942 में नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने बदायूं का दौरा किया इसके बाद आंदोलन ने और रफ्तार पकड़ ली। खासकर युवा वर्ग अंग्रेजों के जुल्मों को लेकर आक्रोशित था। नगला शर्की के एक बाग में क्रांतिकारी बैठकें किया करते थे। अंग्रेज हुकूमत आंदोलन को हर स्तर पर कुचलना चाहती थी। क्रांतिकारियों की बैठकों के बारे में अंग्रेजों को पता न लगे इसके लिए बाग के पास ही माता काली की मिट्टी की प्रतिमा बनाकर यहां कीर्तन आदि किया जाने लगा। कीर्तन के दौरान यहां क्रांतिकारी जुटते थे। इससे अंग्रेजों को शक भी नहीं होता था और क्रांतिकारी अंग्रेजों से मुचैटा करने की अपनी रणनीति भी तैयार कर लेते थे। मिट्टी की यह प्रतिमा ईसापुर के चरनलाल ने बनाई थी। इस पर काला रंग कर दिया गया। नगला मंदिर कई साल तक स्वतंत्रता आंदोलन का केंद्र बिंदु बना रहा।
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क्रांतिकारियों पर थी देवी की कृपा
बदायूं। माना जाता है कि नगला शर्की में कीर्तन के दौरान स्वतंत्रता आंदोलन की रणनीति बनाने वाले क्रांतिकारियों पर देवी की कृपा थी। एक बार मुखबिर की सूचना पर क्रांतिकारियों की धर-पकड़ को अंग्रेज पुलिस नगला मंदिर पहुंची। यहां क्रांतिकारी कीर्तन के दौरान रणनीति बना रहे थे। उनको पुलिस के आने की खबर नहीं थी। पुलिस के वहां पहुंचते ही भयंकर ओलावृष्टि शुरू हो गई। ऐसे में अंग्रेज पुलिस को वापस लौटना पड़ा।
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रियासत का महामंत्री पद छोड़ आंदोलन में कूदे रुकुम सिंह
बदायूं। कुंवर रुकुम सिंह राठौर देवास रियासत में महामंत्री थे। 1913 में हुए जलियावाला बाग कांड के बाद वह देवास रियासत के महामंत्री का पद छोड़कर स्वतंत्रता संग्राम में कूदे थे। स्वतंत्रता संग्राम में कुंवर रुकुम सिंह का अहम योगदान रहा था। उन्होंने काफी समय महात्मा गांधी, पंडित मदन मोहन मालवीय और नेताजी सुभाष चंद्र बोस के साथ भी बिताया था।