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‘जीवन को आनंदित बनाने के लिए भगवत्कृपा आवश्यक’
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‘जीवन को आनंदित बनाने के
लिए भगवत कृपा आवश्यक’
उझानी (बदायूं)। अहीरटोला मोहल्ले के शिवमंदिर परिसर में चल रही श्रीमद्भागवत कथा में दूसरे दिन कथावाचक निराला जी महाराज ने श्रद्धालुओं को भोग और विलास त्यागने का संदेश देते हुए ऐसे कार्य करने की सलाह दी जो समाज को भी नई दिशा प्रदान करें। उन्होंने कहा कि इसके लिए आवश्यक है कि भगवत्व का श्रवण करें, तभी जीवन आनंदमय होगा।
कथावाचक निराला जी महाराज ने कहा कि अच्छे विचारों को पाने के लिए सत्संग में पहुंचना जरूरी है। जब व्यक्ति भजन करेगा तो उसका मन निर्मल होगा। हरिकृपा होने पर ही जिज्ञासु इंसान महापुरुष की शरणागति प्राप्त करेगा। हरिनाम का जाप करने से ही भगवान उसे सत्संग में स्थान प्रदान करते हैं। अज्ञानता से मन में पैदा होने वाले मोह, मद और कामादि का अंधकार भी तभी मिटता है जब इंसान हरि के नाम का स्मरण करता है। इसके बाद जो सूर्य रूपी प्रकाश मिलता है, उससे जीवन आनंदित हो उठता है। धर्म के मार्ग पर चलने वाले व्यक्ति के मन में दुर्विचार नहीं आते। दूसरों में हमेशा ही दोष देखने वाले व्यक्ति का आत्मिक शांति नहीं मिलती। हमेशा ही अपने से नीचे स्तर के व्यक्ति को देखो तो खुद ही सुख और चैन की अनुभूति होने लगेगी। सच्चा धनवान ओर ज्ञानवान वही होता है जो दूसरे की अच्छाइयों का ग्रहण कर आगे बढ़ता चला जाता है। कथा के दौरान संकीर्तन भी हुआ।
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लिए भगवत कृपा आवश्यक’
उझानी (बदायूं)। अहीरटोला मोहल्ले के शिवमंदिर परिसर में चल रही श्रीमद्भागवत कथा में दूसरे दिन कथावाचक निराला जी महाराज ने श्रद्धालुओं को भोग और विलास त्यागने का संदेश देते हुए ऐसे कार्य करने की सलाह दी जो समाज को भी नई दिशा प्रदान करें। उन्होंने कहा कि इसके लिए आवश्यक है कि भगवत्व का श्रवण करें, तभी जीवन आनंदमय होगा।
कथावाचक निराला जी महाराज ने कहा कि अच्छे विचारों को पाने के लिए सत्संग में पहुंचना जरूरी है। जब व्यक्ति भजन करेगा तो उसका मन निर्मल होगा। हरिकृपा होने पर ही जिज्ञासु इंसान महापुरुष की शरणागति प्राप्त करेगा। हरिनाम का जाप करने से ही भगवान उसे सत्संग में स्थान प्रदान करते हैं। अज्ञानता से मन में पैदा होने वाले मोह, मद और कामादि का अंधकार भी तभी मिटता है जब इंसान हरि के नाम का स्मरण करता है। इसके बाद जो सूर्य रूपी प्रकाश मिलता है, उससे जीवन आनंदित हो उठता है। धर्म के मार्ग पर चलने वाले व्यक्ति के मन में दुर्विचार नहीं आते। दूसरों में हमेशा ही दोष देखने वाले व्यक्ति का आत्मिक शांति नहीं मिलती। हमेशा ही अपने से नीचे स्तर के व्यक्ति को देखो तो खुद ही सुख और चैन की अनुभूति होने लगेगी। सच्चा धनवान ओर ज्ञानवान वही होता है जो दूसरे की अच्छाइयों का ग्रहण कर आगे बढ़ता चला जाता है। कथा के दौरान संकीर्तन भी हुआ।
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