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जिले में भूगर्भ जल स्तर बढ़ाने पर काम शुरू
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जिले में भूगर्भ जल स्तर बढ़ाने पर काम शुरू
बिजनौर। जिले में भूगर्भ जल स्तर बढ़ाने के लिए काम शुरू हो गया है। बारिश के पानी की बर्बादी रोकने की कवायद हो रही है। इसके लिए कच्चे नालों, तालाबों, नदी की पानी की क्षमता बढ़ाने पर जोर है। ग्रामीणों को जल की बर्बादी रोकने के लिए वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम लगवाने के लिए जागरूक किया जा रहा।
बरसात शुरू हो गई है। वर्षा जल का प्राकृतिक श्रोत है। जल दोहन से भूगर्भ जल स्तर लगातार गिरा। जलीलपुर ब्लॉक डार्क जोन में आ गया। प्रशासन का घरेलू पानी समेत बारिश के जल की बर्बादी रोकना प्राथमिकता है। अभियान की कमान डीएम उमेश मिश्रा के निर्देशन में सीडीओ पूर्ण वोहरा ने संभाली है। अभियान गांव, कस्बों व शहरों में चल रहा है। जल संचयन के लिए शासन की योजनाओं की जानकारी दी जा रही। बरसाती पानी रोकने के सामान्य गुर बताए जा रहे हैं। अभियंता नितिन कुमार के अनुसार किसी ब्लॉक का डार्क जोन का निर्धारण भू गर्भ से निकलने वाले जल की प्रतिशत मात्रा पर निर्भर करता है। यदि भूगर्भ से जल की निकासी 91 प्रतिशत से 100 प्रतिशत है तो ब्लॉक डार्क जोन में आ जाता है। जलीलपुर ब्लॉक की भूगर्भ जल निकासी 92 प्रतिशत है। डार्क जोन से बाहर आने के लिए जल की बर्बादी रोकना व जल संचयन जरूरी है।
ये चल रहे हैं कार्यक्रम
बारिश के पानी की बर्बादी रोकने के लिए रेन वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम लगाने पर काम हो रहा। एपीओ दिनेश कुमार ने बताया कि जिले के सरकारी भवनों, स्कूलों, पंचायत भवनों में सिस्टम लगाए जा रहे हैं। खराब सिस्टम ठीक किए जा रहे हैं। लोगों को अपने घरों में वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम लगाने को प्रेरित किया जा रहा है। वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम में बरसाती पानी जमीन के नीचे पहुंचाया जाता है। इसके लिए 10-15 मीटर गहराई पर पाइप डाले जाते हैं। ग्रामीणों से मकानों की कच्ची छत को पक्का करने की सलाह दी जा रही। सोख पिट अर्थात पानी सोखने वाले गड्ढे बन रहे हैं। जिले के 11 ब्लॉकों में हजारों की संख्या में सोख पिट बने हैं। गांवों में कच्चे नालों, तालाबों व नदियों का जीर्णोद्धार करके वाटर क्षमता बढ़ाई जा रही है। पंचायतों में तालाबों का जीर्णोद्धार हुआ है।
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ग्रे वाटर सोल्यूशन का हो रहा प्रबंधन
एपीओ दिनेश कुमार के अनुसार रसोई तथा स्नानगृह के पानी को ग्रे वाटर सोल्यूशन कहा जाता है। गांवों में बड़ी मात्रा में रसोई व बाथ रूम का पानी नालियों में बहकर बर्बाद हो जाता है। रास्तों में कीचड़ हो जाती है। प्रशासन का ध्यान ग्रे वाटर सोल्यूशन को रोकने पर केंद्रित है। इसके लिए घरों में चैंबर बनाकर ट्रीटमेंट हो रहा है। स्वयं सहायता समूहों की महिलाएं कामकाजी महिलाओं को घरेलू पानी रोकने के लिए जागरूक कर रही हैं। जल संचयन के लिए पंचायतों में करीब 350 तालाबों का जीर्णोद्धार हुआ है। केंद्र सरकार के निर्देश पर हर लोकसभा क्षेत्र में 40 के लिहाज से 120 अमृत सरोवर के निर्माण पर काम चल रहा। राज्य सरकार ने हर पंचायत में दो दो अमृत सरोवर बनाने को कहा है। जिले की 1123 पंचायतों में 2246 सरोवरों का निर्माण हो रहा। जिले में करीब 3600 सरकारी भवन है। करीब 1000 में वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम लग गए हैं।
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बिजनौर। जिले में भूगर्भ जल स्तर बढ़ाने के लिए काम शुरू हो गया है। बारिश के पानी की बर्बादी रोकने की कवायद हो रही है। इसके लिए कच्चे नालों, तालाबों, नदी की पानी की क्षमता बढ़ाने पर जोर है। ग्रामीणों को जल की बर्बादी रोकने के लिए वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम लगवाने के लिए जागरूक किया जा रहा।
बरसात शुरू हो गई है। वर्षा जल का प्राकृतिक श्रोत है। जल दोहन से भूगर्भ जल स्तर लगातार गिरा। जलीलपुर ब्लॉक डार्क जोन में आ गया। प्रशासन का घरेलू पानी समेत बारिश के जल की बर्बादी रोकना प्राथमिकता है। अभियान की कमान डीएम उमेश मिश्रा के निर्देशन में सीडीओ पूर्ण वोहरा ने संभाली है। अभियान गांव, कस्बों व शहरों में चल रहा है। जल संचयन के लिए शासन की योजनाओं की जानकारी दी जा रही। बरसाती पानी रोकने के सामान्य गुर बताए जा रहे हैं। अभियंता नितिन कुमार के अनुसार किसी ब्लॉक का डार्क जोन का निर्धारण भू गर्भ से निकलने वाले जल की प्रतिशत मात्रा पर निर्भर करता है। यदि भूगर्भ से जल की निकासी 91 प्रतिशत से 100 प्रतिशत है तो ब्लॉक डार्क जोन में आ जाता है। जलीलपुर ब्लॉक की भूगर्भ जल निकासी 92 प्रतिशत है। डार्क जोन से बाहर आने के लिए जल की बर्बादी रोकना व जल संचयन जरूरी है।
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ये चल रहे हैं कार्यक्रम
बारिश के पानी की बर्बादी रोकने के लिए रेन वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम लगाने पर काम हो रहा। एपीओ दिनेश कुमार ने बताया कि जिले के सरकारी भवनों, स्कूलों, पंचायत भवनों में सिस्टम लगाए जा रहे हैं। खराब सिस्टम ठीक किए जा रहे हैं। लोगों को अपने घरों में वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम लगाने को प्रेरित किया जा रहा है। वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम में बरसाती पानी जमीन के नीचे पहुंचाया जाता है। इसके लिए 10-15 मीटर गहराई पर पाइप डाले जाते हैं। ग्रामीणों से मकानों की कच्ची छत को पक्का करने की सलाह दी जा रही। सोख पिट अर्थात पानी सोखने वाले गड्ढे बन रहे हैं। जिले के 11 ब्लॉकों में हजारों की संख्या में सोख पिट बने हैं। गांवों में कच्चे नालों, तालाबों व नदियों का जीर्णोद्धार करके वाटर क्षमता बढ़ाई जा रही है। पंचायतों में तालाबों का जीर्णोद्धार हुआ है।
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ग्रे वाटर सोल्यूशन का हो रहा प्रबंधन
एपीओ दिनेश कुमार के अनुसार रसोई तथा स्नानगृह के पानी को ग्रे वाटर सोल्यूशन कहा जाता है। गांवों में बड़ी मात्रा में रसोई व बाथ रूम का पानी नालियों में बहकर बर्बाद हो जाता है। रास्तों में कीचड़ हो जाती है। प्रशासन का ध्यान ग्रे वाटर सोल्यूशन को रोकने पर केंद्रित है। इसके लिए घरों में चैंबर बनाकर ट्रीटमेंट हो रहा है। स्वयं सहायता समूहों की महिलाएं कामकाजी महिलाओं को घरेलू पानी रोकने के लिए जागरूक कर रही हैं। जल संचयन के लिए पंचायतों में करीब 350 तालाबों का जीर्णोद्धार हुआ है। केंद्र सरकार के निर्देश पर हर लोकसभा क्षेत्र में 40 के लिहाज से 120 अमृत सरोवर के निर्माण पर काम चल रहा। राज्य सरकार ने हर पंचायत में दो दो अमृत सरोवर बनाने को कहा है। जिले की 1123 पंचायतों में 2246 सरोवरों का निर्माण हो रहा। जिले में करीब 3600 सरकारी भवन है। करीब 1000 में वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम लग गए हैं।