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Bijnor News: ग्रामीण दूध की धार से करते हैं पशुधन की सुरक्षा
Wed, 27 Aug 2025 01:32 AM IST
मेरठ ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, बिजनौर
संवाद न्यूज एजेंसी, बिजनौर
Updated Wed, 27 Aug 2025 01:32 AM IST
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चांदपुर क्षेत्र के गांव हिसामपुर में गांव की सीमा पर दूध की धार प्रभाव करने के लिए जाते ग्रामीण
- फोटो : स्वयं
चांदपुर। विज्ञान और चिकित्सा के युग में भी हिसामपुर समेत क्षेत्र के कई गांवों के ग्रामीण पुरानी परंपरा को संजोए हुए हैं। वे अपने पशुधन की बीमारी से सुरक्षा के लिए प्रतिवर्ष गांव के चामुंडा देवी मंदिर पर सामूहिक हवन-पूजन के बाद गांव के चारों ओर दूध की धार (दूध प्रवाहित करना) लगाते हैं।
भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की द्वितीय तिथि सोमवार को गांव हिसामपुर में इस परंपरा का पालन किया गया। इसके अलावा क्षेत्र के गांव मुस्तफाबाद, सराय, सैंदवार, मलेशिया आदि में अलग-अलग तिथियों को पूजन कर दूध की धार लगाई जाती है। हिसामपुर निवासी राजेश सिंह उर्फ खन्ना ने बताया की सोमवार को गांव स्थित मां चामुंडा मंदिर पर हवन व पूजन किया गया। इसके बाद देर शाम गांव की सीमा पर दूध की धार प्रवाहित गई। पंडित दुष्यंत कुमार ने बताया कि हर साल हवन कर गांव की सीमाओं को बीमारियों से सुरक्षित किया जाता है। पशुधन की बीमारी से रक्षा की जाती है।
गांव निवासी 86 वर्षीय किशोरी सिंह ने बताया कि यह परंपरा सौ साल से भी ज्यादा पुरानी है। ग्रामीण आज भी अपनी सांस्कृतिक पहचान और परंपरागत ज्ञान को संभाले हुए हैं। ग्रामीण धर्मेंद्र कुमार ने बताया कि यह परंपरा न केवल उनके पशुओं की सुरक्षा करती है, बल्कि गांव में शांति, समृद्धि और आपसी एकता भी बनाए रखती है। नई पीढ़ी भी इस परंपरा को अपनाकर अपनी जड़ों से जुड़ी हुई है।
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भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की द्वितीय तिथि सोमवार को गांव हिसामपुर में इस परंपरा का पालन किया गया। इसके अलावा क्षेत्र के गांव मुस्तफाबाद, सराय, सैंदवार, मलेशिया आदि में अलग-अलग तिथियों को पूजन कर दूध की धार लगाई जाती है। हिसामपुर निवासी राजेश सिंह उर्फ खन्ना ने बताया की सोमवार को गांव स्थित मां चामुंडा मंदिर पर हवन व पूजन किया गया। इसके बाद देर शाम गांव की सीमा पर दूध की धार प्रवाहित गई। पंडित दुष्यंत कुमार ने बताया कि हर साल हवन कर गांव की सीमाओं को बीमारियों से सुरक्षित किया जाता है। पशुधन की बीमारी से रक्षा की जाती है।
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गांव निवासी 86 वर्षीय किशोरी सिंह ने बताया कि यह परंपरा सौ साल से भी ज्यादा पुरानी है। ग्रामीण आज भी अपनी सांस्कृतिक पहचान और परंपरागत ज्ञान को संभाले हुए हैं। ग्रामीण धर्मेंद्र कुमार ने बताया कि यह परंपरा न केवल उनके पशुओं की सुरक्षा करती है, बल्कि गांव में शांति, समृद्धि और आपसी एकता भी बनाए रखती है। नई पीढ़ी भी इस परंपरा को अपनाकर अपनी जड़ों से जुड़ी हुई है।
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