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यूरिया के छिड़काव से जहर न बन जाए हरा चारा
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गाय।
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यूरिया के छिड़काव से जहर न बन जाए हरा चारा
बिजनौर। चारे की फसलों में अंधाधुंध डाला जा रहा यूरिया पशु चारा पशुओं का काल बन सकता है। इससे खेत में नाइट्रेट व नाइट्राइट तत्वों की अधिकता के कारण पशुओं की मौत हो सकती है। लेकिन किसान इससे अंजान हैं और हरे चारे में यूरिया का अंधाधुंध प्रयोग कर रहे हैं। बदायूं में गोशाला में 22 पशुओं की अचानक मौत होने पर जांच कराई गई तो उनकी मौत का कारण चारे में यूरिया का अधिक प्रयोग करना पाया गया। इससे पशुपालन विभाग सतर्क हो गया है। गोवंश को केवल 20 प्रतिशत हरा चारा देने के आदेश दिए गए हैं। किसानों को भी जागरूक किया जा रहा है।
पशुओं को स्वस्थ रखने के लिए हरा चारा बहुत लाभकारी माना जाता है। हरे चारे में मौजूद पोषक तत्वों से पशुओं की अच्छी सेहत बनती है व दुधारू पशु दूध भी अधिक देते हैं, लेकिन फसल की पैदावार बढ़ाने के लिए किसान हरे चारे में यूरिया का अंधाधुंध प्रयोग कर रहे हैं। इससे खेत में विषाक्त पदार्थ बढ़ जाते हैं। यह फसल के जरिये पशुओं में भी जाते हैं। कई बार विषाक्त पदार्थों की अधिकता की वजह से पशुओं की मौत भी हो जाती है। बदायूं जिले में गोशालाओं में 22 गोवंश की मौत के मामले में यह तथ्य सामने आया है। वहां पशुओं को दिए गए हरे चारे में यह विषाक्त पदार्थ पाए गए थे। इस घटना के बाद से पशुपालन विभाग सतर्क हो गया है। जिले में भी गोशालाओं में गोवंश रखे गए हैं। पशुपालन विभाग ने नगर पालिका, पंचायत ईओ व बीडीओ को पशुओं को दिए जा रहे चारे में केवल 20 प्रतिशत हरा चारा देने को कहा है। बाकी भूसा दिया जाएगा।
नाइट्रेट और नाइट्राइट बन जाते हैं जहर
यूरिया में नाइट्रेट और नाइट्राइट पदार्थ होते हैं। खेतों में यूरिया का प्रयोग अधिक होने से यह खेत में बने रहते हैं और फसलों में चले जाते हैं। इनकी अधिकता से चारा जहरीला हो जाता है और इसे खाने से पशु की मौत भी हो सकती है। ऐसे दुधारू पशु का दूध पीना मनुष्यों के लिए भी हानिकारक हो सकता है।
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जिले में भी हो चुकी हैं तीन मौत
जिले में भी करीब डेढ़ साल पहले यूरिया से विषाक्त हुए चारे से तीन पशुओं की मौत हो चुकी है। ब्लॉक जलीलपुर के गांव खानपुर में पशुओं की मौत हुई थी। तब छोईया नदी के पानी को पशुओं की मौत का कारण बताया गया था, लेकिन जब पशुपालन विभाग ने पशुओं के बिसरा की लैब में जांच कराई तो चारे में नाइट्रेट व नाइट्राइट मिलने से पशुओं की मौत होने का पता चला।
हरे चारे को यूरिया की जरूरत नहीं
हरे चारे में यूरिया की जरूरत नहीं होती है। खेत में गोबर का खाद डालकर व जैविक दवाइयों का प्रयोग करके भी चारे की पैदावार बढ़ाई जा सकती है। लेकिन किसान फसल को एकदम से बढ़ाने के लिए यूरिया का प्रयोग जरूरत से ज्यादा कर रहे हैं।
यूरिया के हो सकते हैं दूसरे विकल्प
मुख्य पशुधन चिकित्साधिकारी डा.भूपेेंद्र सिंह के अनुसार गोशालाओं में पशुओं को केवल 20 प्रतिशत हरा चारा देने को कहा गया है। किसान भी खेतों में चारे में यूरिया का प्रयोग न करें। चारे की फसल को यूरिया की ज्यादा जरूरत नहीं होती है। इसके दूसरे भी विकल्प हो सकते हैं। पशुओं के स्वास्थ्य के लिए किसानों को हरे चारे में यूरिया का प्रयोग बंद करना चाहिए।
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बिजनौर। चारे की फसलों में अंधाधुंध डाला जा रहा यूरिया पशु चारा पशुओं का काल बन सकता है। इससे खेत में नाइट्रेट व नाइट्राइट तत्वों की अधिकता के कारण पशुओं की मौत हो सकती है। लेकिन किसान इससे अंजान हैं और हरे चारे में यूरिया का अंधाधुंध प्रयोग कर रहे हैं। बदायूं में गोशाला में 22 पशुओं की अचानक मौत होने पर जांच कराई गई तो उनकी मौत का कारण चारे में यूरिया का अधिक प्रयोग करना पाया गया। इससे पशुपालन विभाग सतर्क हो गया है। गोवंश को केवल 20 प्रतिशत हरा चारा देने के आदेश दिए गए हैं। किसानों को भी जागरूक किया जा रहा है।
पशुओं को स्वस्थ रखने के लिए हरा चारा बहुत लाभकारी माना जाता है। हरे चारे में मौजूद पोषक तत्वों से पशुओं की अच्छी सेहत बनती है व दुधारू पशु दूध भी अधिक देते हैं, लेकिन फसल की पैदावार बढ़ाने के लिए किसान हरे चारे में यूरिया का अंधाधुंध प्रयोग कर रहे हैं। इससे खेत में विषाक्त पदार्थ बढ़ जाते हैं। यह फसल के जरिये पशुओं में भी जाते हैं। कई बार विषाक्त पदार्थों की अधिकता की वजह से पशुओं की मौत भी हो जाती है। बदायूं जिले में गोशालाओं में 22 गोवंश की मौत के मामले में यह तथ्य सामने आया है। वहां पशुओं को दिए गए हरे चारे में यह विषाक्त पदार्थ पाए गए थे। इस घटना के बाद से पशुपालन विभाग सतर्क हो गया है। जिले में भी गोशालाओं में गोवंश रखे गए हैं। पशुपालन विभाग ने नगर पालिका, पंचायत ईओ व बीडीओ को पशुओं को दिए जा रहे चारे में केवल 20 प्रतिशत हरा चारा देने को कहा है। बाकी भूसा दिया जाएगा।
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नाइट्रेट और नाइट्राइट बन जाते हैं जहर
यूरिया में नाइट्रेट और नाइट्राइट पदार्थ होते हैं। खेतों में यूरिया का प्रयोग अधिक होने से यह खेत में बने रहते हैं और फसलों में चले जाते हैं। इनकी अधिकता से चारा जहरीला हो जाता है और इसे खाने से पशु की मौत भी हो सकती है। ऐसे दुधारू पशु का दूध पीना मनुष्यों के लिए भी हानिकारक हो सकता है।
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जिले में भी हो चुकी हैं तीन मौत
जिले में भी करीब डेढ़ साल पहले यूरिया से विषाक्त हुए चारे से तीन पशुओं की मौत हो चुकी है। ब्लॉक जलीलपुर के गांव खानपुर में पशुओं की मौत हुई थी। तब छोईया नदी के पानी को पशुओं की मौत का कारण बताया गया था, लेकिन जब पशुपालन विभाग ने पशुओं के बिसरा की लैब में जांच कराई तो चारे में नाइट्रेट व नाइट्राइट मिलने से पशुओं की मौत होने का पता चला।
हरे चारे को यूरिया की जरूरत नहीं
हरे चारे में यूरिया की जरूरत नहीं होती है। खेत में गोबर का खाद डालकर व जैविक दवाइयों का प्रयोग करके भी चारे की पैदावार बढ़ाई जा सकती है। लेकिन किसान फसल को एकदम से बढ़ाने के लिए यूरिया का प्रयोग जरूरत से ज्यादा कर रहे हैं।
यूरिया के हो सकते हैं दूसरे विकल्प
मुख्य पशुधन चिकित्साधिकारी डा.भूपेेंद्र सिंह के अनुसार गोशालाओं में पशुओं को केवल 20 प्रतिशत हरा चारा देने को कहा गया है। किसान भी खेतों में चारे में यूरिया का प्रयोग न करें। चारे की फसल को यूरिया की ज्यादा जरूरत नहीं होती है। इसके दूसरे भी विकल्प हो सकते हैं। पशुओं के स्वास्थ्य के लिए किसानों को हरे चारे में यूरिया का प्रयोग बंद करना चाहिए।