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पर्यावरण को बचाने के लिए आगे आए दो दोस्त
ब्यूरो/अमर उजाला, बिजनौर
Updated Sun, 11 Sep 2016 01:14 AM IST
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बिजनौर में नाली के किनारे से पीपल के पौधे एकत्र करते रजनीश व दीपक।
- फोटो : अमर उजाला
बिजनौर में पर्यावरण संरक्षण का संदेश देने के लिए नारों की दुनिया से आगे निकलकर दो दोस्तों ने खुद ही पहल की है। दोनों खुद ही जाकर घरों की दीवारों, नालियों व कूड़ी पर खड़े पीपल के पौधे उखाड़कर उनकी नर्सरी तैयार करते हैं और स्कूलों, पंचायतों व सड़कों के किनारे पौधरोपण करते हैं।
एक दिन बेटे सार्थक को पढ़ाते समय राणा इंक्लेव सोसाइटी निवासी दीपक अग्रवाल ने पीपल की 24 घंटे ऑक्सीजन देने सहित अन्य विशेषताओं के बारे में पढ़ा। उन्होंने अपने दोस्त डीएम कंपाउंड निवासी रजनीश चौहान से पीपल का पौधरोपण अभियान चलाने का निर्णय लिया। वे एक नर्सरी पर गए तो पता चला कि वहां पीपल के तीन ही पौधे हैं। एक पौधे की कीमत 600 रुपये बताई। रजनीश ने पूछा कि इतनी कीमत क्यों है तो नर्सरी वाले ने बताया कि यह पेड़ केवल दीवारों, नाली के किनारों व कूड़ी पर ही उगता है। कोई भी खुद मेहनत करके वहां से पौधे नहीं लाता। इसलिए वे पौधे की मनमानी कीमत लेते हैं। नर्सरी वाले की बात सुनकर दीपक व रजनीश ने खुद ही पौधे एकत्र करने की ठान ली। दोनों मिलकर हर छुट्टी के दिन आसपास के गांवों व शहर की गलियों से पीपल के पौधे एकत्र करने शुरू कर दिए। उनके अभियान से प्रभावित होकर आसपास के लोगों ने भी उनको फोन पर बुलाकर पीपल के पौधे देने शुरू कर दिए। दो महीने में दोनों 200 से अधिक पौधे लगा चुके हैं। अब भी दोनों के पास 90 से अधिक पौधे जमा हैं।
अभियान को मिल रहा समर्थन
पौधे एकत्र करने के बाद रजनीश व दीपक उनको मिट्टी सहित किसी पॉलीथीन या गमले में लगाते हैं और कुछ दिनों तक घर पर ही रखते हैं। पौधे के संभलने के बाद ही उसे किसी गांव के प्राइमरी स्कूल, पंचायत घर या शहर की सड़क किनारे बोते हैं। दोनों पौधों को हर दूसरे तीसरे दिन पानी भी देते हैं। रजनीश के अनुसार पीपल सबसे पवित्र पेड़ है। 24 घंटे ऑक्सीजन देने के अलावा यह धार्मिक मान्यताओं से भी जुड़ा है। अभियान को मिल रहा समर्थन।
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एक दिन बेटे सार्थक को पढ़ाते समय राणा इंक्लेव सोसाइटी निवासी दीपक अग्रवाल ने पीपल की 24 घंटे ऑक्सीजन देने सहित अन्य विशेषताओं के बारे में पढ़ा। उन्होंने अपने दोस्त डीएम कंपाउंड निवासी रजनीश चौहान से पीपल का पौधरोपण अभियान चलाने का निर्णय लिया। वे एक नर्सरी पर गए तो पता चला कि वहां पीपल के तीन ही पौधे हैं। एक पौधे की कीमत 600 रुपये बताई। रजनीश ने पूछा कि इतनी कीमत क्यों है तो नर्सरी वाले ने बताया कि यह पेड़ केवल दीवारों, नाली के किनारों व कूड़ी पर ही उगता है। कोई भी खुद मेहनत करके वहां से पौधे नहीं लाता। इसलिए वे पौधे की मनमानी कीमत लेते हैं। नर्सरी वाले की बात सुनकर दीपक व रजनीश ने खुद ही पौधे एकत्र करने की ठान ली। दोनों मिलकर हर छुट्टी के दिन आसपास के गांवों व शहर की गलियों से पीपल के पौधे एकत्र करने शुरू कर दिए। उनके अभियान से प्रभावित होकर आसपास के लोगों ने भी उनको फोन पर बुलाकर पीपल के पौधे देने शुरू कर दिए। दो महीने में दोनों 200 से अधिक पौधे लगा चुके हैं। अब भी दोनों के पास 90 से अधिक पौधे जमा हैं।
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अभियान को मिल रहा समर्थन
पौधे एकत्र करने के बाद रजनीश व दीपक उनको मिट्टी सहित किसी पॉलीथीन या गमले में लगाते हैं और कुछ दिनों तक घर पर ही रखते हैं। पौधे के संभलने के बाद ही उसे किसी गांव के प्राइमरी स्कूल, पंचायत घर या शहर की सड़क किनारे बोते हैं। दोनों पौधों को हर दूसरे तीसरे दिन पानी भी देते हैं। रजनीश के अनुसार पीपल सबसे पवित्र पेड़ है। 24 घंटे ऑक्सीजन देने के अलावा यह धार्मिक मान्यताओं से भी जुड़ा है। अभियान को मिल रहा समर्थन।
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