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तीन माह से सरकारी अस्पतालों में नहीं है एंटी रेबिज वैक्सीन
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तीन माह से सरकारी अस्पतालों में नहीं है एंटी रेबीज वैक्सीन
बिजनौर। पिछले तीन माह से जिले के सरकारी अस्पतालों में एंटी रेबीज वैक्सीन (एआरवी) नहीं है। केवल जिला अस्पताल पर ही कुत्ते काटे के मरीजों को एआरवी लगाने की व्यवस्था टिकी है। जिला अस्पताल में प्रतिदिन 80 से 100 इंजेक्शन लगाए जाते हैं। इसके अलावा जिले में कुत्ता काटने वाले दूरदराज के क्षेत्रों के मरीजों को भी जिला अस्पताल आना पड़ता है या फिर प्राइवेट खरीदकर ही इंजेक्शन लगवाने पड़ते हैं।
तापमान बढ़ने पर कुत्ते और खूंखार हो जाते हैं। पिछले एक सप्ताह में जिला अस्पताल की ओपीडी में एंटी रेबीज इंजेक्शन लगवाने वाले मरीजों की संख्या फिर 100 के पार हो गई है। खास बात ये है कि अस्पताल में इंजेक्शनों की कमी से जूझ रहे सरकारी अस्पतालों के चिकित्सक और मरीज दोनों ही काफी परेेशान हैं। जिला अस्पताल के जनरल फिजीशियन डा. राधेश्याम वर्मा के अनुसार अप्रैल माह में जिला अस्पताल की ओपीडी में एंटी रेबीज इंजेक्शन लगवाने वाले मरीजों की संख्या काफी कम थी मगर अब रोजाना लगभग 100 से ज्यादा पहुंच रही है। हालांकि उसके बाद ओपीडी में कुुछ गिरावट आई थी। वर्तमान में 100 से 125 मरीज आ रहे हैैं।
गर्मी के साथ बढ़े मरीज
जिला अस्पताल के सीएमएस डा. ज्ञानचंद का कहना है कि एक सप्ताह में गर्मी बढ़ने के चलते ऐसे मरीजों की संख्या भी बढ़ गई है। ओपीडी 150 के पार जाने से अब फिर से 60-70 इंजेक्शन लगाने पड़ रहे हैं। ऐसे ग्रामीण क्षेत्र के मरीजों को भी उनके क्षेत्रों के सरकारी अस्पतालों में एआरवी न होने के कारण जिला अस्पताल आने को ही मजबूर होना पड़ रहा है।
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वैक्सीन की है कमी
सीएमओ डा. विजय कुमार यादव ने बताया कि मुख्यालय से ही वैक्सीन की कमी है, लेकिन कोशिश रहती है कि अधिकांश लोगों को इंजेक्शन लगा दिए जाएं। काउंसिलिंग में मरीज को कहा जाता है कि जिस कुत्ते ने काटा है, उसकी तीन से चार दिन तक निगरानी करो। इस अवधि में कुत्ता यदि पागल हो जाता है या मर जाता है तो वास्तव में मरीज को एंटी रेबीज इंजेक्शन की जरूरत है।
कैसा होता है रेबीज
सीएमओ डा. विजय कुमार यादव के अनुसार कुत्ता, बंदर, लंगूर आदि के काटने से जो लार व्यक्ति के खून में मिल जाती है, उससे रेबीज नामक बीमारी होने का खतरा रहता है। रेबीज रोग सीधे रोगी के मानसिक संतुुलन को खराब कर देता है।
रेबीज रोग से उपचार
रेबीज रोग की रोकथाम के लिए एंटी रेबीज वैक्सीन है। नियमानुसार पहला इंजेक्शन 72 घंटे के अंदर, दूसरा तीन दिन बाद, तीसरा सात दिन बाद, चौथा 14 दिन बाद और पांचवां 28 दिन के बाद लगाया जाता है। हालांकि एहतियात के तौर पर ऐसे मरीज को पहला इंजेक्शन तुरंत लगवा लेना चाहिए।
मेडिकल स्टोर पर 2100 मिलते हैं इंजेक्शन
खन्ना मेडिकल स्टोर स्वामी शरद खन्ना के मुताबिक एंटी रैबीज इंजेक्शन का पूरा कोर्स लगवाने के लिए करीब 2100 रुपये का है। उन्होंने बताया कि पूरा कोर्स छह इंजेक्शन का होता है। पहला टीका कुत्ता काटने वाले दिन, दूसरा सात, तीसरा 14, चौथा 28, पांचवां 30 और छठा तीन माह पर लगता है। छठा टीका वैकल्पिक होता है। यह टीका लगवाने पर व्यक्ति पूरे एक साल से रैबीज से मुक्त हो जाता है। यानी एक साल के भीतर उसे दोबारा से कुत्ता, बंदर, लंगूर काट ले तो उसे फिर से एआरवी लगवाने की आवश्यकता नहीं होती।
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बिजनौर। पिछले तीन माह से जिले के सरकारी अस्पतालों में एंटी रेबीज वैक्सीन (एआरवी) नहीं है। केवल जिला अस्पताल पर ही कुत्ते काटे के मरीजों को एआरवी लगाने की व्यवस्था टिकी है। जिला अस्पताल में प्रतिदिन 80 से 100 इंजेक्शन लगाए जाते हैं। इसके अलावा जिले में कुत्ता काटने वाले दूरदराज के क्षेत्रों के मरीजों को भी जिला अस्पताल आना पड़ता है या फिर प्राइवेट खरीदकर ही इंजेक्शन लगवाने पड़ते हैं।
तापमान बढ़ने पर कुत्ते और खूंखार हो जाते हैं। पिछले एक सप्ताह में जिला अस्पताल की ओपीडी में एंटी रेबीज इंजेक्शन लगवाने वाले मरीजों की संख्या फिर 100 के पार हो गई है। खास बात ये है कि अस्पताल में इंजेक्शनों की कमी से जूझ रहे सरकारी अस्पतालों के चिकित्सक और मरीज दोनों ही काफी परेेशान हैं। जिला अस्पताल के जनरल फिजीशियन डा. राधेश्याम वर्मा के अनुसार अप्रैल माह में जिला अस्पताल की ओपीडी में एंटी रेबीज इंजेक्शन लगवाने वाले मरीजों की संख्या काफी कम थी मगर अब रोजाना लगभग 100 से ज्यादा पहुंच रही है। हालांकि उसके बाद ओपीडी में कुुछ गिरावट आई थी। वर्तमान में 100 से 125 मरीज आ रहे हैैं।
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गर्मी के साथ बढ़े मरीज
जिला अस्पताल के सीएमएस डा. ज्ञानचंद का कहना है कि एक सप्ताह में गर्मी बढ़ने के चलते ऐसे मरीजों की संख्या भी बढ़ गई है। ओपीडी 150 के पार जाने से अब फिर से 60-70 इंजेक्शन लगाने पड़ रहे हैं। ऐसे ग्रामीण क्षेत्र के मरीजों को भी उनके क्षेत्रों के सरकारी अस्पतालों में एआरवी न होने के कारण जिला अस्पताल आने को ही मजबूर होना पड़ रहा है।
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वैक्सीन की है कमी
सीएमओ डा. विजय कुमार यादव ने बताया कि मुख्यालय से ही वैक्सीन की कमी है, लेकिन कोशिश रहती है कि अधिकांश लोगों को इंजेक्शन लगा दिए जाएं। काउंसिलिंग में मरीज को कहा जाता है कि जिस कुत्ते ने काटा है, उसकी तीन से चार दिन तक निगरानी करो। इस अवधि में कुत्ता यदि पागल हो जाता है या मर जाता है तो वास्तव में मरीज को एंटी रेबीज इंजेक्शन की जरूरत है।
कैसा होता है रेबीज
सीएमओ डा. विजय कुमार यादव के अनुसार कुत्ता, बंदर, लंगूर आदि के काटने से जो लार व्यक्ति के खून में मिल जाती है, उससे रेबीज नामक बीमारी होने का खतरा रहता है। रेबीज रोग सीधे रोगी के मानसिक संतुुलन को खराब कर देता है।
रेबीज रोग से उपचार
रेबीज रोग की रोकथाम के लिए एंटी रेबीज वैक्सीन है। नियमानुसार पहला इंजेक्शन 72 घंटे के अंदर, दूसरा तीन दिन बाद, तीसरा सात दिन बाद, चौथा 14 दिन बाद और पांचवां 28 दिन के बाद लगाया जाता है। हालांकि एहतियात के तौर पर ऐसे मरीज को पहला इंजेक्शन तुरंत लगवा लेना चाहिए।
मेडिकल स्टोर पर 2100 मिलते हैं इंजेक्शन
खन्ना मेडिकल स्टोर स्वामी शरद खन्ना के मुताबिक एंटी रैबीज इंजेक्शन का पूरा कोर्स लगवाने के लिए करीब 2100 रुपये का है। उन्होंने बताया कि पूरा कोर्स छह इंजेक्शन का होता है। पहला टीका कुत्ता काटने वाले दिन, दूसरा सात, तीसरा 14, चौथा 28, पांचवां 30 और छठा तीन माह पर लगता है। छठा टीका वैकल्पिक होता है। यह टीका लगवाने पर व्यक्ति पूरे एक साल से रैबीज से मुक्त हो जाता है। यानी एक साल के भीतर उसे दोबारा से कुत्ता, बंदर, लंगूर काट ले तो उसे फिर से एआरवी लगवाने की आवश्यकता नहीं होती।