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Bijnor News: गुजरे जमाने की बात हो गया नींदड़ू की होली का रोमांच

Tue, 03 Mar 2026 11:20 PM IST
Meerut Bureau मेरठ ब्यूरो
Updated Tue, 03 Mar 2026 11:20 PM IST
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The thrill of Nindadu's Holi has become a thing of the past.
नींदड़ू। करीब छह दशक पहले नींदड़ू में रंगों के त्योहार होली का विशेष रोमांच था। नींदड़ू खास से सटी ग्राम पंचायतों मोहम्मदपुर भिक्कन के हरिजनों और महाबतपुर-बीरू के बागवानों की होली के जुलूस नींदड़ू खास के रास्तों और गली-कूचों से गुजरते थे। लेकिन होली का रोमांच धीरे-धीरे खत्म हो गया। अब दोनों वर्ग के लोग अपने मोहल्लों में ही होली खेलते हैं।
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वयोवृद्ध डॉक्टर हामिद अकबर, अथर निशात और महबूब अहमद का कहना है कि जहां होली पर शहरों में रंग का जोर और हुड़दंग का शोर बढ़ा है, वहीं गांवों में होली का दायरा अभी भी सीमित है। नींदड़ू खास में जामा मस्जिद के सामने जमींदार फजलुर्रहमान सिद्दीकी का परिवार रहता है। कहा जाता है कि आजादी पूर्व इनके किसी पूर्वज ने अपने खेतों में कार्य करने के लिए कहीं से हरिजन परिवार लाकर ईदगाह के पास स्थित अपनी जमीन में बसाया था। परिवार बढ़ने के बाद उन्होंने पहली बार नींदड़ू खास में जमींदार की हवेली पर होली खेली थी। इसके बाद नींदड़ू खास में ढोल नगाड़ों के साथ होली के जुलूस और चौपी खेलने का दायरा बढ़ता गया। बंसी सिंह के नेतृत्व में हरिजनों की होली अपनी वेशभूषा, हुड़दंग, स्वांग और नाटक के लिए मशहूर थी। रोमांच का यह आलम था कि होली खेलने वाले लोग कम होते थे और उसे देखने व जुलूस के साथ चलने वाले मुसलमानों की तादाद सैकड़ों में होती थी। कभी-कभी मुस्लिम युवक भी हुड़दंग में शरीक देखे जाते थे। बागवान हुड़दंग के बिना शालीनता के साथ होली खेलते थे।
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अथर निशात बताते हैं कि तब मुस्लिम युवकों और बच्चों को हटाकर गीला रंग खेला जाता था। होली के बाद कई दिनों तक रात में हुरियारों की टोली आती और तरह-तरह के नाटक खेलकर व स्वांग रचकर लोगों का मन बहलाती थी। अब यह बीते दिनों की बात हो गई और होली का रोमांच समाप्त हो गया। डॉक्टर हामिद अकबर बताते हैं कि कभी होली का अपना रोमांच और धूम थी। हुरियारे होली खेलते और इनाम लिए बिना नहीं जाते थे। वाल्मीकि भी होली खेलते थे। अब हरिजनों और बागवानों की होली के जुलूस और चौपियां नहीं आतीं, लेकिन दशकों पुरानी होली का रोमांच अब भी याद आता है।
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