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चक्रानुक्रम व्यवस्था से बदलेगी आरक्षण की तस्वीर
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चक्रानुक्रम व्यवस्था से बदलेगी आरक्षण की तस्वीर
बिजनौर। इस बार ग्राम पंचायत चुनाव में आरक्षण की तस्वीर बदली दिखाई देगी। वर्ष 2015 के चुनाव में आरक्षित होने वाली पंचायत को इस बार आरक्षण नहीं मिलेगा। चक्रानुक्रम में आरक्षण पंचायत की आबादी को ध्यान में रखकर होगा। दावेदारों की निगाह प्रस्तावित आरक्षण नीति की ओर लगी हैं।
पंचायत चुनाव में आरक्षण को लेकर स्थिति साफ हो गई है। आरक्षण चक्रानुक्रम में होगा। जिले में संक्षिप्त परिसीमन के कारण पंचायतों की संख्या 1128 की जगह 1123 रह गई है। इस कारण वर्ष 2021 के चुनाव में पंचायतों की संख्या व आरक्षण की तस्वीर बदली होगी। 2015 के पंचायत चुनाव में 1128 पंचायत थीं। पंचायतों में आरक्षण की संवैधानिक व्यवस्था है। पंचायत चुनाव में ओबीसी का आरक्षण 27 प्रतिशत, अनुसूचित जाति का आरक्षण 21 प्रतिशत तथा अनुसूचित जनजाति का आरक्षण दो प्रतिशत है। चुनाव में ओबीसी के लिए 305, एससी के लिए 259 तथा एसटी के लिए एक पंचायत आरक्षित थी। वर्ष 2021 का आरक्षण चक्रानुक्रम में होगा। इसलिए इस बार वे पंचायत आरक्षित नहीं होंगी जो 2015 में आरक्षित थीं। परिसीमन से आरक्षित पंचायतों की संख्या भी कम हो जाएगी।
यह है चक्रानुक्रम व्यवस्था
चक्रानुक्रम व्यवस्था में आरक्षण पंचायत की आबादी के अनुसार होता है। हर ब्लाक में जो पंचायत वर्ष 2015 में आरक्षित हो चुकी हैं उन्हें नीचे डाल दिया जाता है। बाकी पंचायत को आबादी के अनुसार व्यवस्थित किया जाता है। इसके बाद प्रत्येक ब्लॉक में सबसे पहले दो प्रतिशत पंचायत अनुसूचित जनजाति के लिए, इसके बाद 21 प्रतिशत पंचायत अनुसूचित जाति के लिए तथा आखिर में 27 प्रतिशत पंचायत पिछड़ा वर्ग के लिए आरक्षित की जाएंगी। बाकी पंचायत सामान्य जाति के लिए रहेंगी। पंचायत चुनाव में सामान्य जाति के लिए आरक्षित पंचायत पर किसी भी जाति का प्रत्याशी चुनाव मैदान में उतर सकता है। पंचायतराज अधिकारी के दफ्तर में सामान्य सीट पर अनेक एससी या ओबीसी प्रत्याशी चुनाव जीतकर आ जाते हैं। जीतने वाला प्रत्याशी भले ही आरक्षित जाति का हो परंतु उसकी गिनती सामान्य पंचायत में होगी।
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राजनीतिक नफा नुकसान का आंकलन
पंचायत लोकतंत्र की पहली सीढ़ी है। अनेक दावेदारों का राजनीतिक भविष्य पंचायतों से तय होता है। राजनेता राजनीति का ककहरा पंचायतों से ही सीखते हैं। माना जा रहा है सत्ता में बैठे राजनीतिक दल राजनीतिक नफा नुकसान का आंकलन करके आरक्षण नीति पर फैसला लेते हैं। सूबे में वर्ष 2010 के पंचायत चुनाव में बसपा सत्ता में थी। बसपा सोशल इंजीनियरिंग के बूते सत्ता में आई थी। इसलिए पंचायत चुनाव के आरक्षण में चक्रानुक्रम व्यवस्था लागू की गई थी। वर्ष 2015 के पंचायत चुनाव में सपा का शासन था। राजनीतिक पंडितों के मुताबिक उस समय पिछले आरक्षण को शून्य करके आरक्षण किया गया था।
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बिजनौर। इस बार ग्राम पंचायत चुनाव में आरक्षण की तस्वीर बदली दिखाई देगी। वर्ष 2015 के चुनाव में आरक्षित होने वाली पंचायत को इस बार आरक्षण नहीं मिलेगा। चक्रानुक्रम में आरक्षण पंचायत की आबादी को ध्यान में रखकर होगा। दावेदारों की निगाह प्रस्तावित आरक्षण नीति की ओर लगी हैं।
पंचायत चुनाव में आरक्षण को लेकर स्थिति साफ हो गई है। आरक्षण चक्रानुक्रम में होगा। जिले में संक्षिप्त परिसीमन के कारण पंचायतों की संख्या 1128 की जगह 1123 रह गई है। इस कारण वर्ष 2021 के चुनाव में पंचायतों की संख्या व आरक्षण की तस्वीर बदली होगी। 2015 के पंचायत चुनाव में 1128 पंचायत थीं। पंचायतों में आरक्षण की संवैधानिक व्यवस्था है। पंचायत चुनाव में ओबीसी का आरक्षण 27 प्रतिशत, अनुसूचित जाति का आरक्षण 21 प्रतिशत तथा अनुसूचित जनजाति का आरक्षण दो प्रतिशत है। चुनाव में ओबीसी के लिए 305, एससी के लिए 259 तथा एसटी के लिए एक पंचायत आरक्षित थी। वर्ष 2021 का आरक्षण चक्रानुक्रम में होगा। इसलिए इस बार वे पंचायत आरक्षित नहीं होंगी जो 2015 में आरक्षित थीं। परिसीमन से आरक्षित पंचायतों की संख्या भी कम हो जाएगी।
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यह है चक्रानुक्रम व्यवस्था
चक्रानुक्रम व्यवस्था में आरक्षण पंचायत की आबादी के अनुसार होता है। हर ब्लाक में जो पंचायत वर्ष 2015 में आरक्षित हो चुकी हैं उन्हें नीचे डाल दिया जाता है। बाकी पंचायत को आबादी के अनुसार व्यवस्थित किया जाता है। इसके बाद प्रत्येक ब्लॉक में सबसे पहले दो प्रतिशत पंचायत अनुसूचित जनजाति के लिए, इसके बाद 21 प्रतिशत पंचायत अनुसूचित जाति के लिए तथा आखिर में 27 प्रतिशत पंचायत पिछड़ा वर्ग के लिए आरक्षित की जाएंगी। बाकी पंचायत सामान्य जाति के लिए रहेंगी। पंचायत चुनाव में सामान्य जाति के लिए आरक्षित पंचायत पर किसी भी जाति का प्रत्याशी चुनाव मैदान में उतर सकता है। पंचायतराज अधिकारी के दफ्तर में सामान्य सीट पर अनेक एससी या ओबीसी प्रत्याशी चुनाव जीतकर आ जाते हैं। जीतने वाला प्रत्याशी भले ही आरक्षित जाति का हो परंतु उसकी गिनती सामान्य पंचायत में होगी।
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राजनीतिक नफा नुकसान का आंकलन
पंचायत लोकतंत्र की पहली सीढ़ी है। अनेक दावेदारों का राजनीतिक भविष्य पंचायतों से तय होता है। राजनेता राजनीति का ककहरा पंचायतों से ही सीखते हैं। माना जा रहा है सत्ता में बैठे राजनीतिक दल राजनीतिक नफा नुकसान का आंकलन करके आरक्षण नीति पर फैसला लेते हैं। सूबे में वर्ष 2010 के पंचायत चुनाव में बसपा सत्ता में थी। बसपा सोशल इंजीनियरिंग के बूते सत्ता में आई थी। इसलिए पंचायत चुनाव के आरक्षण में चक्रानुक्रम व्यवस्था लागू की गई थी। वर्ष 2015 के पंचायत चुनाव में सपा का शासन था। राजनीतिक पंडितों के मुताबिक उस समय पिछले आरक्षण को शून्य करके आरक्षण किया गया था।