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शहीद का समाधि स्थल उपेक्षा का शिकार
ब्यूरो/अमर उजाला, बिजनौर
Updated Tue, 25 Jul 2017 11:59 PM IST
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शहीद भूदेव
- फोटो : अमर उजाला
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किरतपुर में आतंकियों से लोहा लेते शहीद हुए ग्राम सिसौना जट के भूदेव की गांव स्थित समाधि प्रशासन की उपेक्षा की गवाह है। प्रशासन की घोषणा के बावजूद वहां आज तक शहीद द्वार का निर्माण नहीं हो पाया है। गांव के किसान यशपाल सिंह का पुत्र भूदेव सेना में वर्ष 2000 में सिपाही भर्ती हुआ था।
चार जुलाई 2005 की रात जम्मू-कश्मीर के कुड़पाडा जिले के मच्छल सेक्टर में भूदेव (23) व उनके तीन सैनिक साथियों की आतंकियों से मुठभेड़ हुई। उनके साथी गाजियाबाद के अमित की गोली लगने से मौत हो गई थी, जबकि दो साथी घायल हो गए थे।
भूदेव ने तीस आतंकियों से लोहा लेते हुए पांच को मार गिराया था। इसी दौरान हाथ में गोली लग जाने से वे बेबस हो गए। भूदेव को आतंकियों ने चारों तरफ से घेरकर अंधाधुंध फायरिंग की। शरीर में 32 गोलियां लगने से भूदेव शहीद हो गए थे। उनका विवाह अप्रैल 2004 में नीतू देवी के साथ हुआ था। उनका बड़ा भाई अनिल उसके विवाह के कार्ड बांटने गया था तो कोतवाली-अकबराबाद के बीच सड़क दुर्घटना में उसकी मौत हो गई।
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भूदेव के अंतिम संस्कार के समय प्रशासन ने उनकी याद में गांव में प्रवेश द्वार बनाने तथा समाधि स्थल बनाने की घोषणा की थी। 12 साल बाद भी घोषणाओं पर कोई अमल नहीं हुआ। भूदेव के पिता यशपाल ने स्वयं ग्राम समाज की भूमि पर बने समाधि स्थल परिसर में मिट्टी का भराव कराया और चारदीवारी कराकर गेट लगवाया। शहीद भूदेव की मूर्ति भी उन्होंने स्वयं लगवाई है।
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चार जुलाई 2005 की रात जम्मू-कश्मीर के कुड़पाडा जिले के मच्छल सेक्टर में भूदेव (23) व उनके तीन सैनिक साथियों की आतंकियों से मुठभेड़ हुई। उनके साथी गाजियाबाद के अमित की गोली लगने से मौत हो गई थी, जबकि दो साथी घायल हो गए थे।
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भूदेव ने तीस आतंकियों से लोहा लेते हुए पांच को मार गिराया था। इसी दौरान हाथ में गोली लग जाने से वे बेबस हो गए। भूदेव को आतंकियों ने चारों तरफ से घेरकर अंधाधुंध फायरिंग की। शरीर में 32 गोलियां लगने से भूदेव शहीद हो गए थे। उनका विवाह अप्रैल 2004 में नीतू देवी के साथ हुआ था। उनका बड़ा भाई अनिल उसके विवाह के कार्ड बांटने गया था तो कोतवाली-अकबराबाद के बीच सड़क दुर्घटना में उसकी मौत हो गई।
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भूदेव के अंतिम संस्कार के समय प्रशासन ने उनकी याद में गांव में प्रवेश द्वार बनाने तथा समाधि स्थल बनाने की घोषणा की थी। 12 साल बाद भी घोषणाओं पर कोई अमल नहीं हुआ। भूदेव के पिता यशपाल ने स्वयं ग्राम समाज की भूमि पर बने समाधि स्थल परिसर में मिट्टी का भराव कराया और चारदीवारी कराकर गेट लगवाया। शहीद भूदेव की मूर्ति भी उन्होंने स्वयं लगवाई है।